Tuesday, October 23, 2018
तनुश्री दत्ता के बहाने: दुनिया गोल है और कुछ लोग कभी ना बदलेंगे.

तनुश्री दत्ता के बहाने: दुनिया गोल है और कुछ लोग कभी ना बदलेंगे.

मीडियावाला.इन।

कहानी शुरू होती है 10 साल पहले एक फिल्म के सेट पर। अभिनेत्री युवा है...ब्यूटी कांटेस्ट की विजेता...इमेज हॉट हिरोइन की है, स्वतंत्र है ( पिंक फिल्म की अभिनेत्रियों की तरह लेकिन वह वास्तविक स्वतंत्र है)। उसका परिवार हमेशा साथ खड़ा रहता है। सेट पर अभिनेता का कद कुछ ज्यादा ही बड़ा है। नेशनल अवार्ड मिल चुका है। अपना नाम है...ये अलग है कि असल जिंदगी में अपनी प्रेमिकाओं को पीटने के लिए बदनाम हैं। वह डायरेक्टर से कहकर गाने के कुछ स्टेप्स बदलवाता है, डांस डायरेक्टर हां में हां मिलाता है। कुछ ज्यादा थोड़े ना करना है, बस युवा लड़की को छूकर देखना है। अपनी तरह से....गंदी-बजबजाती सोच। स्त्री को माल समझने की सोच। माल खरीदना थोड़े ही है, विंडो शॉपिंग करनी है। बस सामान को छूकर देखना है। खुश होना है...निकल जाना है। सारे पुरुषों को लगता है...इसमें स्त्री का क्या जाता है। कौन सी उसकी इज्जत पर डाका डाला है, बस छूकर देखा है, नयनसुख लिया है। उफ्फ...अपनी आंखों पर चढ़ा पुरुषत्व का चश्मा हटाईए...इसे यौन उत्पीड़न कहते हैं। इस उत्पीड़न से चोट पहुंचती है...गहरी चोट...यह चोट शरीर नहीं अंतरआत्मा को छलनी करती है।

'हार्न ओके प्लीज' फिल्म के सेट में नानापाटेकर तनुश्री से अभद्रता करते हैं। वह गुस्से से सेट छोड़ देती हैं। मना कर देती हैं...कुछ तो है, जो एक लड़की की इंद्रियों को लिजलिजा और गंदा लग रहा था। प्रोड्यूसर, डांस- डायरेक्टर, एक्टर के पक्ष में खड़े होते हैं। रात को अचानक कुछ गुंड़े तनुश्री की गाड़ी पर हमला कर देते हैं। टायर पंचर कर देते हैं। लड़की मानी नहीं...इसलिए धमकाया जाता है...डराया जाता है कि वह चुप रहे। युवा अभिनेत्री के माता-पिता उसे आकर अपने साथ ले जाते हैं। यहां टूटता है दंभ, एक पुरुष का। लड़की ने उसे मन की भी ना करने दी, और अंगूठा दिखाकर चल दी। वह हादसे के समय तो उसे बेटी जैसा कहता है। फिर एक प्रेस कांफ्रेंस में अनप्रोफेशनल बताता है। एक युवा अभिनेत्री पर इस तरह का ठप्पा...वह धीरे-धीरे बॉलीवुड से बाहर कर दी जाती है। बॉलीवुड से इतर तनुश्री आध्यात्म में लगी । वहां का शांत जीवन उनके अंदर चल रहे तूफान को शांत ना कर पाया...अब और नहीं कह तनुश्री ने #meetoo के जरिए नाना पाटेकर द्वारा की गई बदसलूकी सामने ला दी। पहले तो लगा सब शांत है, कुछ लोगों ने तनुश्री पर अंगुलियां उठाई। कहा, काम नहीं है, मोटी हो गई है, लाइमलाइट में आने का तरीका है। घटिया स्टंट है लेकिन यह सुन मन ने सिर्फ इतना कहा....जिस दिन वह नाराज हुई, शूटिंग से अलग हुई। उसी दिन उस पर हमला हुआ...दाल में काला है ...बहुत कुछ काला। ये अलग है नाना...कानूनी कदम उठाने का कह रहे हैं...इंतजार रहेगा।

एक पत्रकार ही सामने आई है....जैनिस सिकरिया जो किसी नेशनल टीवी के लिए गाने के पीछे की स्टोरी कवर करने गईं थीं और बन गईं गवाह इस चश्मदीदा घटना की। जेनिस ने तनुश्री का पक्ष लिया और कहा, हाँ उन्होंने देखा है यह सब उनके सामने ही हुआ है। इसी बची रेणुका शहाणे अपना स्टैंड तनुश्री के लिए ले चुकी थीं। इसके बाद एक-एक कर बॉलीवुड के एक पक्ष ने हाथ बढ़ाना शुरू कर दिया। फरहान अख्तर ने कहा, उस समय तनुश्री के लिए सच लाना मुश्किल था, अब समय बदल गया है। वह बोल रही हैं। बेहद अच्छा है। इसके बाद प्रियंका, ट्विकंल खन्ना, कंगना, सोनम, स्वरा....आदि नाम सामने आए। लेकिन अमिताभ यह कह बात टाल गए कि ना मैं 'नाना पाटेकर हूं ना ही तनुश्री दत्ता।' वैसे मुझे किसी महानायक से उम्मीद भी नहीं कि वे अपनी फिल्मों के डॉयलॉग को असली जिंदगी में बोलेंगे शायद वे सिर्फ इतना कह सकते थे "यदि तनुश्री ने नो बोला था...तो उसकी नो को नो ही सुनना था। भले ही वह नो किसी अश्लील डांस स्टैप के लिए हो।" कुछ यही हाल सत्यमेव जयते के आमिर खान के साथ था, वे यह कह बच गए कि उन्हें इस घटना की जानकारी नहीं। अब पब्लिक इतनी बुद्धू नहीं कि वे अभिनेताओं के पीछे काम करने वाली सोशलमीडिया और पीआर की टीम को नहीं जानती। सलमान से उम्मीद, बेमानी है।

वो क्या है "गलत के खिलाफ खड़े होने के लिए कलेजा चाहिए...वह कलेजा ना किसी नेता के पास है, ना अभिनेता ना ही समाज"...यह बोलने का कलेजा-साहस हर स्त्री को खुद अपने अंदर पैदा करना होगा। आपका संस्थान और यह समाज गूंगे बने बैठे रहेंगे। हां ये मुंह खोलेंगे, तब जब धारा 497 को हटाया जाए। इन्हें बुरा लगेगा...अरे महिला को यौन संबंध की सहमती का अधिकार क्यों। वह तो सपंत्ति है...दासी...मैं ही उपभोग कर सकता हूं...या मेरी मर्जी से किसी और को सौंप सकता हूं। देखिए...इस घृणित धारा को हटाने से कुछ पुरुषों का अहम कितना बिलबिला जाता है। सोशल मीडिया पर ही विषवमन देख लीजिए...आप स्त्री हैं तो कहां जाता है बदचलन होना मंजूर है। कुछ आगे बढ़कर कहते हैं...आपके बेटे की बहू किसी पराये मर्द के पास जाए तो या पुरुष हैं तो आपके घर की महिलाओं पर अंगुली उठाने से बाज ना आएंगें। फिर सबरीमला के संबंध में तो श्लोक और संस्कृति की अधकचरी दुहाई देने वालो की लाइन लग जाती है। फिर यहां तो मामला सिर्फ लजलिजे तरीके से छूने का है, जिससे एक युवा हॉट लड़की इंकार कर देती है। तो फिर संभल जाइए जनाब और संभाल लीजिए अपनी मानसिकता। ये संघाड़ मारती मानसिकता समाज को कुंठित कर रही है...कोढ़ की तरह कुंठा फैल रही है।

तनुश्री काmeetoo, धारा 497 और सबरीमला मंदिर कुछ फुसफुसा रहे हैं...कान धरकर सुन लीजिए यह फुसफुसाहट अन्यथा आने वाली पीढ़ियां आपको माफ ना करेंगीं।

पुरुषों के लिए- याद रखिए कानून बदल रहे हैं। स्त्री अब संपत्ति या दासी नहीं मुखर है। वह अपने हक जानती हैं। सिर्फ धाराएं ही नहीं बदल रहीं, वह सजग और संबंल भी हो रही है। यदि आप आज किसी युवा लड़की की तरफ यह सोचकर गलत दृष्टि डालते हैं, क्या कर रहा हूं, सिर्फ नैन सुख ही तो लिया है...जरा सा छुआ ही तो है....ये सब यौन उत्पीड़न में आता है। अपराध है...आप अपराध कर रहे हैं। दुनिया गोल है...तकनीक उन्नत...आपका थूंका आपके मुंह पर गिरेगा और आप मुंह दिखाने लायक ना बचेंगें।

स्त्रियों के लिए- बहुत समय पहले एक वीडियो डाला था, कोई अगर निर्वस्त्र करें तो कपड़े ढूंढने की जगह अपने कांधों पर पंख उगा लो। जी समय आ चुका है...पंख उगाने का। कोई आपके साथ गलत करे तो पहली ही बार में मुंहतोड़ जवाब दीजिए। किसी मजबूरी के कारण चुप रहना पड़े तो याद रखिए कभी भी देर नहीं होती। जब समय मिले अपना बदला जरूर लीजिए। जिंदगी भर उस नासूर को मत झेलिए कि अपना चेहरा ही आइने में देखने से कतराना पड़े।

समाज के लिए - हम आधी आाबादी हैं समझिए यौन उत्पीड़न बहुत गहरा घाव देता है। इसका वक्त पर इलाज नहीं किया गया तो नासूर बन जाता है। जिस स्त्री के साथ यह घटता है वह अवसाद में घिर जाती है। आपको मोटी और आध्यात्म की तरफ मुड़ चुकी तनुश्री दिख रही है। मुझे उसमें अभी भी अपमान का दंश झेल रही युवा सपनों से भरी अभिनेत्री। याद रखिए अवसाद पीड़ित को नहीं अपराधी को होना चाहिए....सजा किसी मासूम को नहीं अपराधी को मिलना चाहिए।

 

 

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श्रुति अग्रवाल

कई बार जीवन में ऐसे पल आते हैं जो सदियों तक किस्से के रूप में याद रहते हैं... उन्हीं किस्सों की किस्सागोई में गुम श्रुति अग्रवाल पत्रकारिता का चिरपरिचित चेहरा है। वे लम्बे समय तक राजस्थान पत्रिका और सहारा समय में पत्रकार रही है।

ट्वेल्व पाइंट ब्लॉग संचालित करते हुए श्रुति ने कई अनछुए पहलुओं पर कलम चलायी है।