Thursday, October 17, 2019

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प्रश्न विरोध की मर्यादा और स्तर का भी..!

मीडियावाला.इन। डाक्टर राममनोहर लोहिया के व्यक्तित्व के इतने आयाम हैं जिनका कोई पारावार नहीं। उनसे जुडा़ एक प्रसंग प्राख्यात समाजवादी विचारक जगदीश जोशी ने बताया था, जो विपक्ष के विरोध की मर्यादा और उसके स्तर के भी उच्च आदर्श...

पर्वसंस्कृति का द्वंद्वात्मक बाजारवाद

पर्वसंस्कृति का द्वंद्वात्मक बाजारवाद

मीडियावाला.इन। बाजार के ढंग निराले होते हैं। वह हमारी जिंदगी को भी अपने हिसाब से हांकता है। कभी पंडिज्जी लोग तय करते थे कि किस त्योहार को कैसे मनाया जाय अब बाजार तय करता है।  शरद ऋतु के...

शिव परिवार का अनूठा  लोकतांत्रिक समाजवाद

शिव परिवार का अनूठा लोकतांत्रिक समाजवाद

मीडियावाला.इन। गणपत बप्पा घर-घर बिराज गए। क्या महाराष्ट्र, क्या गुजरात, समूचा देश गणपतिमय है। बडे़ गणेशजी, छोटे गणेशजी, मझले गणेशजी।  गणेशजी जैसा सरल और कठिन देवता और कौन? लालबाग के राजा के गल्ले में एक अरब का चढावा आया।...

शिक्षानीति को चौराहे की कुतिया बनाने वाले!

शिक्षानीति को चौराहे की कुतिया बनाने वाले!

मीडियावाला.इन। तीज त्योहारों की तरह हर साल शिक्षक दिवस भी आता है। पूजाआराधना में जैसे गोबर की पिंडी को गणेश मानकर पूज लिया जाता है वैसे ही एक दिन के लिए सभी गोबर गणेश बन जाते हैं। यह एक...

जादूगर नहीं, हाकी के वैज्ञानिक थे दद्दा

जादूगर नहीं, हाकी के वैज्ञानिक थे दद्दा

मीडियावाला.इन। खेल के प्रग्या पुरुष मेजर ध्यानचन्द हाकी के जादूगर नहीं.. हाकी के वैग्यानिक थे.. जादूगरी भ्रम में डालने की ट्रिक है..जबकि विज्ञान..यथार्थ ..।   -कैप्टन बजरंगी प्रसाद.. (देश के प्रथम अर्जुन अवार्डी) ने राष्ट्रीय खेल दिवस की...

राम, कृष्ण और स्वाधीनता के मायने

राम, कृष्ण और स्वाधीनता के मायने

मीडियावाला.इन। सावन और भादौं तिथि त्योहारों के महीने हैं। यह सिलसिला डिहठोन तक चलता है। इन्हीं महीनों में एक महान राष्ट्रीय पर्व पंद्रह अगस्त पड़ता है उसके आगे पीछे या कभी-कभी साथ में ही कृष्णजन्माष्टमी आती है।  मुझे...

गौर साहब जैसा कोई और नहीं..!

मीडियावाला.इन। बाबूलाल गौर खुद को कृष्ण का वंशज मानते थे। संयोग देखिए कि हलषष्ठी के दिन उनके जीवन का अंतिम संस्कार हुआ। जब वे मुख्यमंत्री थे तब बलदाऊ जयंती मनाने का कार्यक्रम शुरू किया था, हलषष्ठी को...

जिनके व्यक्तित्व की कोई थाह नहीं

मीडियावाला.इन। आज की उथली राजनीति और हल्के नेताओं के आचरण के बरक्स देखें तो अटलबिहारी बाजपेयी के व्यक्तित्व की थाह का आंकलन कर पाना बड़े से बड़े प्रेक्षक, विश्लेषक और समालोचक के बूते की बात नहीं। बाजपेयी...

ये कश्मीर के नवविहान का मंगलाचरण है

ये कश्मीर के नवविहान का मंगलाचरण है

मीडियावाला.इन।                                             आजादी के बाद कश्मीर का यह पहला पंद्रह अगस्त होगा जब वहां एक विधान और एक निशान की प्राणप्रतिष्ठा होगी। दो प्रधान की बात दशकों पहले से ही अप्रसांगिक है। यह वह सपना था जिसे डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने...

गांधी के सपनों का भारत..

मीडियावाला.इन। स्वतंत्रता दिवस मनाने से पहले पढ़ने और विचार करने के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का यह आलेख प्रस्तुत है जिसे उन्होंने 15  अगस्त 1947 से पहले लिखा था। लेख में परिकल्पना है कि स्वतंत्रता मिलने के...

कश्मीर: डर के आगे जीत है.!

मीडियावाला.इन। वाकई ये मोदी की अगस्त क्रांति है। 9 अगस्त को हम हर साल 'अँग्रेजों भारत छोड़ों' के आह्वान का स्मरण करते हैं। अगले साल के 5 अगस्त को 'कश्मीर दिवस' के रूप में मनाने लगेंगे। आजादी...

कश्मीरी अवाम नहीं, सियासत के हज्जाम है समस्या की जड़..!

कश्मीरी अवाम नहीं, सियासत के हज्जाम है समस्या की जड़..!

मीडियावाला.इन। क्या  कश्मीर  समस्या  का  हल सिर्फ  मिलेट्री  है..? नहीं ..कतई   नहीं...!  इसका  हल  कूटनीतिक तरीके से करना  होगा।   कश्मीर  की  तीन  चौथाई  अवाम,  जो ...

प्रपंच: 'आपरेशन कमल' विंध्य इसलिए सुभेद्य!

मीडियावाला.इन। सियासत के फलक पर विंध्य सुर्खियों में है। कांग्रेस के दो विधायकों को तोड़ने के कमलनाथ के इस कमाल के विश्लेषण हो रहे हैं। चूंकि ये दोनों विधायक उसी विंध्य के हैं जहां विधानसभा और फिर...

कर्नाटक के बाद अब मध्यप्रदेश में क्या..!

मीडियावाला.इन। क्रिकेट और राजनीति में कभी भी, कुछ भी संभव देखने वालों ने कर्नाटक के बाद राजस्थान व मध्यप्रदेश सरकार की उमर का हिसाब लगाना शुरू कर दिया है। हम मध्यप्रदेश की बात करेंगे जहाँ दलीय स्थित की तुला...

बजट मेरी नजर में

मीडियावाला.इन। बजट में कमलनाथ सरकार के चुनावपूर्व घोषित वचनपत्र के प्रति संकल्प साफ दिखता है। राइट-टु-वाटर निसंदेह एक क्रांतिकारी कदम है। नदियों के पुनर्जीवन की चिंता समय की माँग है। सरकार इस महत्वपूर्ण जनाधिकार को यथार्थ के धरातल पर...

चंद्रगुप्तों को अब चाणक्य नहीं चारण चाहिए!  

मीडियावाला.इन। अभी हाल ही में एक राष्ट्रीय सेमीेनार में भाग लेने का मौका मिला। विषय था..कुशल प्रशासनिक रणनीति बनाने में अकादमिक योगदान की जरूरत। इत्तेफाकन् मुझे ही मुख्य वक्ता की भूमिका निभानी पड़ी, वजह जिन कुलपति महोदय को उद्घाटन के...

"इमरजेन्सी के कंलक के काले धब्बे इतने गहरे हैं कि भारत में जब तक लोकतंत्र जिंदा बचा रहेगा तब तक वे बिजुरके की भाँति टँगे दिखाई देते रहेंगे"

मीडियावाला.इन। यादों में आपातकाल- समापन --चाटुकारिता भी कभी-कभी इतिहास में सम्मान योग्य बन जाती है। आपातकाल  के उत्तरार्ध में यही हुआ। पूरे देश भर से चाटुकार काँग्रेसियों और गुलाम सरकारी मशीनरी ने इंदिरा गांधी को जब यह फीडबैक दिया कि...

जब छात्रों की हुंकार से सिंहासन हिल उठे

मीडियावाला.इन। यादों में आपातकाल-दो कांग्रेस के अध्यक्ष देवकांत बरुआ का नारा इंदिरा इज इंडिया गली कूँचों तक गूँजने लगा। इसी बीच मध्यप्रदेश में पीसी सेठी को हटाकर श्यामाचरण शुक्ल को मुख्यमंत्री बनाया गया। अखबारों की हालत यह कि पहले पन्ने...

जबरिया नसबन्दी ने सारे किए धरे पर पानी फेर दिया..!

जबरिया नसबन्दी ने सारे किए धरे पर पानी फेर दिया..!

मीडियावाला.इन। यादों में आपातकाल.. एक   पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी यदि सरकारी आयोजन न होते तो पब्लिक इन्हें कब का भुला चुकी होती। लेकिन कुछ ऐसी तिथियां हैं जिन्हें राजनीति तब तक भूलने नहीं देगी जब तक...

क्यों न राष्ट्र को ही धर्म मानकर जिया जाए

क्यों न राष्ट्र को ही धर्म मानकर जिया जाए

मीडियावाला.इन।   श्रीमद्भागवत् गीता, योग, वन्दे मातरम् या राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़े इन्ही जैसे अन्य विषयों की चर्चा छिड़ती है तो अपने भैय्याजी  बेहद विचलित हो जाते हैं। कभी-कभी विचलन इस हद तक बढ़ जाता है कि वे पागलपन...