Tuesday, October 23, 2018

Blog

कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...

दूध में दृष्टिदोष अच्छी बात नहीं है 

परिवर्तन जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा है.लेकिन,जीवन की अगली व्यवस्था और उसका अस्तित्व बने रहें,इसलिए आ रहे परिवर्तन के स्वभाव और परिणामों को,ठीक समय पर,और ठीक ढंग से देख पाना,किसी न किसी के जिम्मे तो आता ही होगा...

'अन्न-स्वराज'की हानि तो 'जीवन की हानि'है

'अन्न-स्वराज'की हानि तो 'जीवन की हानि'है

मीडियावाला.इन। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में अभी-अभी,6 अक्टूबर से गांधी जी की 150 वीं जयंती की शुरुवात में 'स्वराज-यात्रा'निकाली गई.जिले के यशस्वी पूर्वज स्व.माखनलालजी चतुर्वेदी की जन्मस्थली से निकली यह यात्रा,स्व.भवानी प्रसादजी मिश्र,स्व.डॉ.आर एच रिछारिया,स्व.हरिशंकर परसाई और...

अंधों का हाथी हो गई है खेती-बाड़ी

अपने देश की एक पुरानी बोधकथा है कि कुछ अंधों को हाथी का वर्णन करना था.सबने अपने अपने हाथ में आये उसके अंगों को ही पूरा हाथी समझकर अपना अंतिम निर्णय दे दिया. समझ की इस दर्दनाक कमी...

अपने लिए ही,अपन कब जागेंगे ?

मीडियावाला.इन।  मेरे कई मित्र,मेरा लिखा हुआ पढ़कर,पहला सवाल यही करते हैं कि जो भी समस्या मैंने बताई है,उसका हल या निदान कहाँ है ? मैं कहता हूँ कि पहले हम इन समस्याओं को अपनी रोज की चर्चाओं...

'हरी' और 'पीली'के बाद अब 'सफ़ेद' क्रान्ति का संकट 

'हरी' और 'पीली'के बाद अब 'सफ़ेद' क्रान्ति का संकट 

हमारे देश में जब भी आम-आदमी के जीवन सुधारने का कोई भी सरकारी कार्यक्रम शुरू होता है,तो उसे 'क्रांति'का नाम दिया जाता है.कृषि उत्पादन बढाकर,देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्म-निर्भर बनाने के उद्देश्य से,पहले आई थी 'हरित क्रांति'.यह अलग-अलग...

अब तो जानलेवा हो गए ये लालसा,स्वार्थ और असंयम

मीडियावाला.इन। ज्ञात मानव इतिहास में,कुछ वाक्य तो ऐसे कहे या लिखे गए हैं कि वे कभी भी  संदर्भहीन नहीं होंगे.क़यामत तक ये एक समान अर्थवान और नित्य-नए सन्दर्भों में उपयुक्त ही बने रहेंगे.इन्हीं कई सर्वकालिक वाक्यों में से...

'नयी दुनिया'के लिए 'अंधी-गुफा'है भ्रष्टाचार 

'नयी दुनिया'के लिए 'अंधी-गुफा'है भ्रष्टाचार 

गरीबी और असमानता के बिना,इस सदी की नयी दुनिया कैसी होगी ? यह सपना वर्ष 2000 की समाप्ति पर संयुक्त राष्ट्र संघ में बैठकर उसके सभी सदस्य देशों ने पूरी सहमति से देखा था.उसके लिए गरीबी,भुखमरी,कुपोषण,असमानता,अज्ञान,अशिक्षा...

'गुलाबी गाल और लाल खून' वाली अर्थव्यवस्था हमारी तो नहीं हैं

'गुलाबी गाल और लाल खून' वाली अर्थव्यवस्था हमारी तो नहीं हैं

वर्ष 2000 में जब दूसरी सहस्त्राब्दि समाप्त होकर,तीसरी सहस्त्राब्दि शुरू हुई थी,तब संयुक्त राष्ट्र संघ में 189 देशों ने एक मसौदे पर बाक़ायदा दस्तखत कर 'सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य' निर्धारित किये थे,व इन्हें अपने सभी कामों में सर्वोच्च प्राथमिकता...

बिकता विज्ञान और बिखरती इंसानियत

बिकता विज्ञान और बिखरती इंसानियत

दुःख,निराशा और गुस्सा अपनी जगह जरूर हैं,पर उसका कारण बने,आँखों देखे तत्वों को पूरे समाज द्वारा न देखना,या उनके प्रति बेपरवाह रहना और अपने ही 'आज'में मस्त रहकर, दूसरे छोटे-मोटे मुद्दों पर ही बहस करते रहना,दुःख,निराशा व गुस्से...

जान से खेलती खेती और बेफिकर बैठे हम

जान से खेलती खेती और बेफिकर बैठे हम

पूरी दुनिया में,शायद हम भारतीय ही,समाज के रूप में अकेले होंगे,जो अपने खुद के तन-मन और धन की जरूरी बातें,अपनी रोजमर्रा की बहस में शामिल नहीं करते.इन पर बात करना पिछड़ापन भी समझा जाता है. हमने,हमारे जनप्रतिनिधियों ने,सामाजिक,आर्थिक,शैक्षणिक या...

बेहतर बातें और बेमेल हकीकत

बेहतर बातें और बेमेल हकीकत

पता नहीं,हममें से ज्यादातर लोग अखबार पढ़कर आखिर क्या करते हैं.किसने,कब और क्या कहा था,व उस पर क्या हुआ,जैसे प्रश्न पूछने की बात तो अब रह ही नहीं गई है.इसीलिए,जिसकी जो मर्ज़ी पड़ती है,वह कह और करके भाग...

'सैंयाओं' के सहारे 'छा' गए 'मानवता के दुश्मन'

'सैंयाओं' के सहारे 'छा' गए 'मानवता के दुश्मन'

मुझे मालूम है कि अपनी कोई भी गंभीर बात मज़ाक से शुरू नहीं की जाती. लेकिन,आज माफ़ी के साथ निवेदन है कि हमारे यहाँ एक पुरानी कहावत है कि 'सैंयां भये कोतवाल तो डर किस बात का'.यदि इस...

सभ्यता और धर्म के नाम पर असभ्यता व अधर्म है 'लिंचिंग'

यह वाक्य मेरा नहीं है कि "कालजयी व्यंग्यकार स्व.हरिशंकर परसाई यदि आज जिन्दा होते,तो इसी अगस्त महीने में,वे पिच्यानबे वर्ष के हो जाते.और,हम उनसे पूछते कि हमारी आज की परिस्थितियों पर आप क्या लिखेंगे ? तो उनका सीधा सा...

चुनावी हल्ले में बीमार पड़ीं स्वास्थ्य सेवाएं 

चुनावी हल्ले में बीमार पड़ीं स्वास्थ्य सेवाएं 

बड़ी अजीब बात है कि हमारी सरकारें पूरे समय चुनावी 'मोड' में ही रहती हैं,जैसे उनका काम सिर्फ चुनाव लड़ना और हम जनता का काम सिर्फ वोट देना ही है.इसी के रहते हल्ला-गुल्ला,यात्रा-उत्सव,जुलुस-रैलियां और संपर्क अभियान चलते ही रहते...

छोड़िये न "को नृप होय,हमहुँ का हानि"

हम सबको अपनी सरकारों से बहुत सी शिकायतें हैं.भ्रष्टाचार और निकम्मेपन से शुरू होकर,शायद शब्दों की यह सूचि इनसे मिलते जुलते सौ विशेषणों पर भी ख़तम नहीं होती होगी.लेकिन,यदि अलबर्ट आइंस्टीन लौटकर भी आएं,और हम ही पूंछें कि...

हरित-क्रांति में कीड़े पड़े

आज जब मैं अपनी यह बात लिख रहा हूँ,तब मुझे हिंदी के वरेण्य और कालजयी पत्रकार स्व.प्रभाष जोशी का लिखा एक वाक्य याद आ रहा है.क्योंकि आज,15 जुलाई को स्व.प्रभाष जी का जन्मदिन है.उन्होंने लिखा था कि भारत...

ऐसे कैसे, और क्यों आ जायेगी खाद्य सुरक्षा 

सुना और पढ़ा है कि पृथ्वी पर एक इतना विशालकाय प्राणी रहता है,जो अपने आकार के कारण उसके एक अंग में क्या हो रहा है, उसे वह दूसरे अंग में महसूस नहीं कर सकता.संभव यह भी है कि किसी...

गरीबी में हुई गीली आँखों पर भी तो सोचें

पिछले दो दिनों में आयी बारिश से कई शहरी इलाक़ों में कुछ घंटों के लिए जल भराव हो गया था,या अभी भी है,व सड़कों पर बह रहे पानी से कारों और मोटर साइकल सवारों को बहुत तकलीफ हुई...

दाल-रोटी या दाल-भात से दूर जाती दाल

दाल-रोटी या दाल-भात से दूर जाती दाल

देश के लिए चिंतित एक विद्वान ने हाल ही में कहा था कि हम बुरी तरह से भटक गए हैं. क्योंकि, दिशाओं को देखने का हमारा 'कम्पास' खो गया है. हम कहते जरूर हैं कि हम सवा सौ करोड़...

शिक्षा गुणवत्ता की योजनाओं का जमीन पर अमल शून्य, हां, वेबसाइट की शोभा जरूर बढ़ा रही है

शिक्षा और बेरोजगारी के अन्तर्सम्बन्धों को लेकर जितनी हमारी पिछली पीढ़ी चिंतित थी, उससे दुगुने चिंतित हम हैं, और हमारी अगली पीढ़ी तो हमसे भी कई गुना अधिक चिंतित तो है ही, बेचैन भी है. आजकल के स्कूलों,...