Wednesday, June 19, 2019

Blog

कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...

'ढब्बूजी'आप हर शहर में क्यों नहीं हैं

'ढब्बूजी'आप हर शहर में क्यों नहीं हैं

मीडियावाला.इन। पढ़े-लिखे लोगों की हर बस्ती में,यह आम दृश्य होता है कि नल के आते ही,कहीं पक्का आँगन धुल रहा है,कहीं कारें धुल रही हैं या कहीं पूरी तसल्ली से लॉन में पानी दिया जा रहा है,तो कहीं नल की...

अब तो देखें कि'कम्युनिकेशन गैप' है कहाँ 

अब तो देखें कि'कम्युनिकेशन गैप' है कहाँ 

मीडियावाला.इन।   अभी पिछले हफ्ते'विश्व पर्यावरण दिवस'था.उसके चार दिन पहले 'विश्व दूध दिवस'था.इसके पहले,लगे-लगे महीनों में 'विश्व पृथ्वी दिवस','विश्व पानी दिवस' और 'विश्व वन्य प्राणी दिवस'थे. साफ़ साफ़ कहें तो ये सब वार्षिक कर्मकांड से...

गंगोत्री से ही मैली होती आ रही दूध की गंगा

गंगोत्री से ही मैली होती आ रही दूध की गंगा

मीडियावाला.इन। पिछले हफ्ते,मध्यप्रदेश में किसानों की हड़ताल के दौरान,आंदोलनकारी किसानों द्वारा भोपाल के पास मिसरोद गाँव में किसी एक किसान को दूध से नहलाने का चित्र भी अखबारों में छपा था.उसके पहले,गाँवों से शहर की तरफ आ रहे दूध के...

अन्न सुरक्षा के आधे-अधूरे प्रयास और पूरे बेख़बर हम

अन्न सुरक्षा के आधे-अधूरे प्रयास और पूरे बेख़बर हम

इस शताब्दी के शुरू होते ही,सारी दुनिया ने अपनी सामूहिक बेहतरी के लिए सतत विकास के आठ लक्ष्य तय किये थे.इनमें गरीबी और भुखमरी से लगाकर विभीषिका की तरह फ़ैल रहे रोगों से मुक्ति तक के संकल्प थे....

मरती नदियां और संकट में आती ज़िन्दगी

मरती नदियां और संकट में आती ज़िन्दगी

मीडियावाला.इन। चौंकिए मत.मैंने सही शब्द इस्तेमाल किये हैं.हमारे देश की अधिकाँश नदियां,बीमार तो छोड़िये,मरणासन्न हैं.उदाहरण के बतौर,तमाम हल्ले,हंगामे और प्रचार के बावजूद,सच तो यह है कि गंगोत्री से डायमंड हार्बर तक,गंगा में प्रतिदिन जितना कचरा छोड़ा जाता है,वह गंगा-किनारे...

मुनाफे की आग जैसी हवस और उसमें झुलसता अपना दूध

मुनाफे की आग जैसी हवस और उसमें झुलसता अपना दूध

मीडियावाला.इन।   यूं ही याद आया,कि अगले महीने की पहली तारीख को 'विश्व दूध दिवस' है.भारत की सबसे बड़ी अदालत ने,पिछले तीन-चार सालों में अपने यहाँ बिकने वाले दूध और दूध से बने पदार्थों की बिक्री को लेकर अत्यधिक...

खेती का संकट:विकल्प तो अपने आसपास ही हैं 

खेती का संकट:विकल्प तो अपने आसपास ही हैं 

भारत में रोज गहरा रहा खेती का संकट,किसानों के कर्जे,उनका मजदूरी के लिए शहरों की तरफ भागना,खेतों का बंजर होते जाना,खेती में लगने वाली चीज़ों का रोज महंगा होना और बीमार मिट्टी से बीमार ही अन्न का उपजना...

अपनी मिट्टी से तिलक कीजिये पर उसकी तबियत भी तो देखिये

अपनी मिट्टी से तिलक कीजिये पर उसकी तबियत भी तो देखिये

रिवाज़ के तहत हर साल,हम अपने आसपास की हर चीज़ का एक दिन मनाते हैं.पानी से पेड़ और प्यार तक,या मां से मिट्टी तक,हरेक का साल में एक दिन होता है. अभी पिछले हफ्ते ही 'विश्व...

तेज चुनावी हवाओं में ओझल हुई हकीकत

तेज चुनावी हवाओं में ओझल हुई हकीकत

मीडियावाला.इन। मैनेजमेंट की किताबों में एक पाठ पढ़ाया जाता है 'ऑर्गनाइजेशनल कॉन्फ्लिक्ट'.किसी भी बड़े संस्थान को,अपने उद्देश्य तक पहुँचने और जरूरी कामों के लिए,बहुत सारे अलग-अलग योग्यता और क्षमता वाले विशेषज्ञ लगते हैं.लेकिन,सामान्यतः वहां हर व्यक्ति सिर्फ अपनी योग्यता,अपनी समझ...

चुनावी की चकल्लस में अनदेखा जलता-झुलसता ग्राम-समाज

चुनावी की चकल्लस में अनदेखा जलता-झुलसता ग्राम-समाज

मीडियावाला.इन। इन दिनों हम सब चुनाव के रोमांच में गाफिल है. वहीँ,भारत के ग्रामीण-समाज का एक बड़ा हिस्सा,इस डर में सो,जाग और जी रहा है कि किस क्षण,कोई आग उसके आसपास लगकर जान-माल के लिए  खतरा न बन जाय. जिसका...

मुद्दे बालाकोट और बहत्तर हजार ही क्यों, किसानी क्यों नहीं?

मुद्दे बालाकोट और बहत्तर हजार ही क्यों, किसानी क्यों नहीं?

अपने देश-प्रदेश ने पिछले दो-ढाई साल में,चार पांच तो बड़े-बड़े और कई छोटे-मोटे स्थानीय किसान आंदोलन देखे हैं.ये आंदोलन इतने प्रभावी तो थे ही,कि पूरे देश का ध्यान उन पर गया था. मध्यप्रदेश के मंदसौर में गोली चली,जानें...

'नरवई'की आग नीति से नहीं अच्छी नीयत से बुझेगी

'नरवई'की आग नीति से नहीं अच्छी नीयत से बुझेगी

मीडियावाला.इन। अनिश्चितताओं के,दुनिया में जितने भी खेल होते होंगे,या विरोधाभासों के जितने भी मुहावरे सभी भाषाओँ में होंगे,वे सब भारत की खेती-बाड़ी पर लागू होते हैं.सांप,छछूंदर,नेवले,कुँओं-खाइयों आदि वाले सारे मुहावरों का सच या सांप-सीढ़ी के खेल की अनिश्चितता आदि सब...

'नरवई'की आग नीति से नहीं अच्छी नीयत से बुझेगी

'नरवई'की आग नीति से नहीं अच्छी नीयत से बुझेगी

अनिश्चितताओं के,दुनिया में जितने भी खेल होते होंगे,या विरोधाभासों के जितने भी मुहावरे सभी भाषाओँ में होंगे,वे सब भारत की खेती-बाड़ी पर लागू होते हैं.सांप,छछूंदर,नेवले,कुँओं-खाइयों आदि वाले सारे मुहावरों का सच या सांप-सीढ़ी के खेल की अनिश्चितता आदि ...

बेरोजगारी की अंधी गली और आँखें मूँदे हम

बेरोजगारी की अंधी गली और आँखें मूँदे हम

मीडियावाला.इन। डॉ.राही मासूम रज़ा का एक कालजयी उपन्यास है 'आधा गाँव'.इस उपन्यास की एक पंक्ति हर संवेदनशील व्यक्ति की छाती फाड़कर रख देती है कि "गाँव जब चौड़ी-चौड़ी छातियों वाले जवानों की पीठ देखता है,तो कलेजा मुंह में आ जाता...

सरकार नहीं, पानी पर ज्यादा लापरवाह है हम

मीडियावाला.इन।   जल,जंगल,जमीन के साथ जीवन का चतुर्भुज कुछ ऐसा है,कि इनमें से एक भी तत्त्व गड़बड़ाने से चतुर्भुज तो बिगड़ता ही है,शेष तत्त्व भी अपने आप ही बिगड़ जाते हैं.इस बिगाड़...

ग्रामीण बेरोजगारी का जिन्न और अँधा मशीनीकरण

मीडियावाला.इन। अपनी तरह के अकेले पत्रकार श्री पी.साईंनाथ ने तीन-चार दिन पहले ही भोपाल में कहा था कि-"अपने देश में कृषि का संकट,अब कृषि से काफी आगे जाकर,पूरे समाज का संकट बन गया है.यह इंसानियत का संकट भी बन...

जमीन का जादू मंडी और मौसम की मार से ज्यादा घातक है

मीडियावाला.इन। भारतीय किसानों की मुश्किलें मौसम की मार,या मंडी और बाज़ार की बेरुखी पर ही शुरू या ख़तम नहीं होती.सरकारों में रखे जाने वाले जमीनों के हिसाब-किताब का मामला और इससे जुड़े सरकारी ...

ऊंट पर बैठकर हड़बड़ी में हो रही गौ-रक्षा

मीडियावाला.इन हमारे बच्चे अपनी किताब-कापियों में जरूर पढ़ते-लिखते हैं कि-गाय एक पालतू जानवर है.इसके पालतू और उपयोगी होने से भी बहुत-बहुत आगे तक की बातें,हमें सिखाई और पढ़ाई जाती रही हैं.लेकिन,पिछले लगभग ढाई सौ सालों से,अपने देश में,गाय बाकी सबके ...

बीमार धरती मां और इलाज में सुस्त हम

मीडियावाला.इन। प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 19 फरवरी,2015 के दिन,राजस्थान के सूरतगढ़ में कहा था कि अपनी धरती मां बीमार है.हम व्यवस्था कर रहे हैं कि अब किसान को भी पता चले,कि जिस मिट्टी पर वह मेहनत कर...

वापस पानी में न चली जाय ऋणमुक्ति की भैंस

वापस पानी में न चली जाय ऋणमुक्ति की भैंस

ऋणमुक्ति की घोषणा हुए पूरे डेढ़ माह हो चुके हैं.इसी के कारण तीन राज्यों में राजनीतिक'तख्ता पलट' हुआ था.लेकिन, इस डेढ़ महीने के बाद भी,घोषणा के क्रियान्वयन में सभी के हाथ-पाँव फूल गए हैं,और पाँव के नीचे की...