Monday, August 26, 2019

Blog

कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...

माना जन्नत क़रीब है,पर गाँव  कष्ट में हैं

माना जन्नत क़रीब है,पर गाँव कष्ट में हैं

मीडियावाला.इन। यह बात निर्विवाद है कि भारत एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है,और दुनिया की सबसे तेज आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक है.लेकिन,टुकड़ों-टुकड़ों में कुछ चीजें ऐसी भी हैं,जो आईने की तरह हमें चेता रही हैं...

यह 'प्रलय'तो पानी का हमसे 'बदला'है

यह 'प्रलय'तो पानी का हमसे 'बदला'है

मीडियावाला.इन। भारत में इन दिनों आये जल-प्रलय ने अभी तक 200 जानें ले ली हैं.बेघर होने वाले लोगों की संख्या 10 लाख से थोड़ी ज्यादा ही है.प्रभावित 9 राज्यों में जिंदगी तहस-नहस हो चुकी है. केंद्र और राज्यों के...

गरीबी कलंक ही नहीं 'कोढ़ में खाज'भी है

मीडियावाला.इन। दुनिया का सभ्य समाज गरीबी को अपने ऊपर लगा सबसे बड़ा कलंक मानता है.आपको,यह आंकड़ा ढूंढने से कहीं भी मिल जाएगा कि 1960 के विश्व आर्थिक सर्वेक्षण में आय का अधिकतम अंतर 30 गुना था.उसके अगले...

अब होगी 'भूख' की लड़ाई 'प्यास'से...

अब होगी 'भूख' की लड़ाई 'प्यास'से...

मीडियावाला.इन। यह शीर्षक,या इस तरह का विचार मात्र आपको अटपटा और झूठा लगेगा.लेकिन,यदि कोई ऐसा कहे,तो थोड़ा रूककर,इस पर विचार जरूर कीजियेगा.देश भर को तर-बतर कर देने वाले इस मौसम में यह बात करना आपको मूर्खता भी...

गाय पर बात तो बहुत हुई काम कब होगा ?

गाय पर बात तो बहुत हुई काम कब होगा ?

मीडियावाला.इन। एक प्रदेश के मुख्यमंत्रीजी ने कहा है कि गाय सांस लेते समय तो ऑक्सीजन लेती ही है,सांस छोड़ते समय भी ऑक्सीजन ही छोड़ती है.इसकी निकटता से मनुष्य की कई शारीरिक व्याधियां भी दूर होती हैं. यह बात दिल्ली के...

बर्बादी पर चौंकना हमें क्यों नहीं आता ?

बर्बादी पर चौंकना हमें क्यों नहीं आता ?

मीडियावाला.इन। कितने सालों से बहस चल रही है कि मानवता का सबसे बड़ा शत्रु 'कुपोषण'है.वर्ष दो हज़ार के बाद शुरू हुई 'सहस्त्राब्दी'में,एक नई दुनिया बनाने का संकल्प सभी देशों ने लिया था.इसके तहत जीवन को बेहतर बनाने के लिए आठ...

'जीत के आगे ज़िन्दगी क्यों नहीं'?

मीडियावाला.इन। टीवी,अखबारों और रेडियो पर एक विज्ञापन खूब आता है कि 'डर के आगे जीत है'.यह वाक्य शायद हमारे अपने सपनों को छूता होगा,तभी तो सबकी ज़बान पर जल्दी से चढ़ा,और लगातार बहुत दिनों तक चला,या प्रभावी रूप से चल...

हक़ बनते ही क्यों शुरू होती है बर्बादी

मीडियावाला.इन। आप अपने आसपास खुद देखें.फिर बताएं कि शिक्षा पर दिए जाने वाले भाषणों या सुन्दर और रंग बिरंगे विज्ञापनों और संविधान से जनता को मिले 'शिक्षा के अधिकार' पर आपको भरोसा होता है ?   भारत में,शायद भगवान...

गलती सबकी है तो 'सफ़ेद कोट ही खून से लाल' क्यों ?

गलती सबकी है तो 'सफ़ेद कोट ही खून से लाल' क्यों ?

मीडियावाला.इन। मुजफ्फरपुर में डेढ़ सौ बच्चों का दिमागी बुखार से मरना,आजाद भारत और यहाँ के सभ्य समाज पर,एक बहुत बड़ा कलंक है.इस घटना के कवरेज के लिए एक-दो दिन पहले वहां गई एक टीवी एंकर लगभग दहाड़ते हुए,एक डाक्टर...

'ढब्बूजी'आप हर शहर में क्यों नहीं हैं

'ढब्बूजी'आप हर शहर में क्यों नहीं हैं

मीडियावाला.इन। पढ़े-लिखे लोगों की हर बस्ती में,यह आम दृश्य होता है कि नल के आते ही,कहीं पक्का आँगन धुल रहा है,कहीं कारें धुल रही हैं या कहीं पूरी तसल्ली से लॉन में पानी दिया जा रहा है,तो कहीं नल की...

अब तो देखें कि'कम्युनिकेशन गैप' है कहाँ 

अब तो देखें कि'कम्युनिकेशन गैप' है कहाँ 

मीडियावाला.इन।   अभी पिछले हफ्ते'विश्व पर्यावरण दिवस'था.उसके चार दिन पहले 'विश्व दूध दिवस'था.इसके पहले,लगे-लगे महीनों में 'विश्व पृथ्वी दिवस','विश्व पानी दिवस' और 'विश्व वन्य प्राणी दिवस'थे. साफ़ साफ़ कहें तो ये सब वार्षिक कर्मकांड से...

गंगोत्री से ही मैली होती आ रही दूध की गंगा

गंगोत्री से ही मैली होती आ रही दूध की गंगा

मीडियावाला.इन। पिछले हफ्ते,मध्यप्रदेश में किसानों की हड़ताल के दौरान,आंदोलनकारी किसानों द्वारा भोपाल के पास मिसरोद गाँव में किसी एक किसान को दूध से नहलाने का चित्र भी अखबारों में छपा था.उसके पहले,गाँवों से शहर की तरफ आ रहे दूध के...

अन्न सुरक्षा के आधे-अधूरे प्रयास और पूरे बेख़बर हम

अन्न सुरक्षा के आधे-अधूरे प्रयास और पूरे बेख़बर हम

इस शताब्दी के शुरू होते ही,सारी दुनिया ने अपनी सामूहिक बेहतरी के लिए सतत विकास के आठ लक्ष्य तय किये थे.इनमें गरीबी और भुखमरी से लगाकर विभीषिका की तरह फ़ैल रहे रोगों से मुक्ति तक के संकल्प थे....

मरती नदियां और संकट में आती ज़िन्दगी

मरती नदियां और संकट में आती ज़िन्दगी

मीडियावाला.इन। चौंकिए मत.मैंने सही शब्द इस्तेमाल किये हैं.हमारे देश की अधिकाँश नदियां,बीमार तो छोड़िये,मरणासन्न हैं.उदाहरण के बतौर,तमाम हल्ले,हंगामे और प्रचार के बावजूद,सच तो यह है कि गंगोत्री से डायमंड हार्बर तक,गंगा में प्रतिदिन जितना कचरा छोड़ा जाता है,वह गंगा-किनारे...

मुनाफे की आग जैसी हवस और उसमें झुलसता अपना दूध

मुनाफे की आग जैसी हवस और उसमें झुलसता अपना दूध

मीडियावाला.इन।   यूं ही याद आया,कि अगले महीने की पहली तारीख को 'विश्व दूध दिवस' है.भारत की सबसे बड़ी अदालत ने,पिछले तीन-चार सालों में अपने यहाँ बिकने वाले दूध और दूध से बने पदार्थों की बिक्री को लेकर अत्यधिक...

खेती का संकट:विकल्प तो अपने आसपास ही हैं 

खेती का संकट:विकल्प तो अपने आसपास ही हैं 

भारत में रोज गहरा रहा खेती का संकट,किसानों के कर्जे,उनका मजदूरी के लिए शहरों की तरफ भागना,खेतों का बंजर होते जाना,खेती में लगने वाली चीज़ों का रोज महंगा होना और बीमार मिट्टी से बीमार ही अन्न का उपजना...

अपनी मिट्टी से तिलक कीजिये पर उसकी तबियत भी तो देखिये

अपनी मिट्टी से तिलक कीजिये पर उसकी तबियत भी तो देखिये

रिवाज़ के तहत हर साल,हम अपने आसपास की हर चीज़ का एक दिन मनाते हैं.पानी से पेड़ और प्यार तक,या मां से मिट्टी तक,हरेक का साल में एक दिन होता है. अभी पिछले हफ्ते ही 'विश्व...

तेज चुनावी हवाओं में ओझल हुई हकीकत

तेज चुनावी हवाओं में ओझल हुई हकीकत

मीडियावाला.इन। मैनेजमेंट की किताबों में एक पाठ पढ़ाया जाता है 'ऑर्गनाइजेशनल कॉन्फ्लिक्ट'.किसी भी बड़े संस्थान को,अपने उद्देश्य तक पहुँचने और जरूरी कामों के लिए,बहुत सारे अलग-अलग योग्यता और क्षमता वाले विशेषज्ञ लगते हैं.लेकिन,सामान्यतः वहां हर व्यक्ति सिर्फ अपनी योग्यता,अपनी समझ...

चुनावी की चकल्लस में अनदेखा जलता-झुलसता ग्राम-समाज

चुनावी की चकल्लस में अनदेखा जलता-झुलसता ग्राम-समाज

मीडियावाला.इन। इन दिनों हम सब चुनाव के रोमांच में गाफिल है. वहीँ,भारत के ग्रामीण-समाज का एक बड़ा हिस्सा,इस डर में सो,जाग और जी रहा है कि किस क्षण,कोई आग उसके आसपास लगकर जान-माल के लिए  खतरा न बन जाय. जिसका...