Wednesday, February 20, 2019

Blog

कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...

ऊंट पर बैठकर हड़बड़ी में हो रही गौ-रक्षा

मीडियावाला.इन हमारे बच्चे अपनी किताब-कापियों में जरूर पढ़ते-लिखते हैं कि-गाय एक पालतू जानवर है.इसके पालतू और उपयोगी होने से भी बहुत-बहुत आगे तक की बातें,हमें सिखाई और पढ़ाई जाती रही हैं.लेकिन,पिछले लगभग ढाई सौ सालों से,अपने देश में,गाय बाकी सबके ...

बीमार धरती मां और इलाज में सुस्त हम

मीडियावाला.इन। प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 19 फरवरी,2015 के दिन,राजस्थान के सूरतगढ़ में कहा था कि अपनी धरती मां बीमार है.हम व्यवस्था कर रहे हैं कि अब किसान को भी पता चले,कि जिस मिट्टी पर वह मेहनत कर...

वापस पानी में न चली जाय ऋणमुक्ति की भैंस

वापस पानी में न चली जाय ऋणमुक्ति की भैंस

ऋणमुक्ति की घोषणा हुए पूरे डेढ़ माह हो चुके हैं.इसी के कारण तीन राज्यों में राजनीतिक'तख्ता पलट' हुआ था.लेकिन, इस डेढ़ महीने के बाद भी,घोषणा के क्रियान्वयन में सभी के हाथ-पाँव फूल गए हैं,और पाँव के नीचे की...

"दिस ब्लडी पॉलिटिक्स"

"दिस ब्लडी पॉलिटिक्स"

मीडियावाला.इन। समझ की भिन्नता के लिए अपने यहाँ एक मुहावरा लगभग हर भाषा में है कि'पसंद अपनी-अपनी,ख़याल अपना-अपना'.अपनी बात शुरू करने से पहले,मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि श्री अमिताभ बच्चन अभिनीत एक फिल्म आई थी'आखिरी रास्ता'.अमितजी इसमें दोहरी भूमिका...

वादों के साथ बेड़ियों की बातें भी कर लें

वादों के साथ बेड़ियों की बातें भी कर लें

अपने देश का कोई भी अखबार उठा लें,टीवी चैनल देख लें,संसदीय सदनों की कार्यवाही ही देख लें,हालांकि चुनावी घोषणापत्रों का अब काम नहीं रहा,इसलिए उनकी बात नहीं करते.आपको निश्चित रूप से लगेगा कि देश के गाँवों में तो...

यूरिया का संकट,जो न होकर भी हुआ

यूरिया का संकट,जो न होकर भी हुआ

शायद हममें से सब लोग भूले न हों. दिल्ली के एक रेस्तरां में दस-पच्चीस लोगों के सामने,जेसिका नाम की एक लड़की की किसी ने बंदूक से ह्त्या कर दी थी.तारीख और गवाहों की भूल-भुलैया में किसी पर भी...

ऋणमुक्ति, वोट का ईनाम नहीं, हक़ है

ऋणमुक्ति, वोट का ईनाम नहीं, हक़ है

यदि आप सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं,चाव से टीवी की ख़बरें देखते रहते हैं या 'दिल लगाकर'अखबार ही पढ़ते हैं,तो किसानों की ऋण मुक्ति पर अपनी एक निश्चित राय बना चुके होंगे.वह भी यह कि यदि ऐसा है,तो...

चुनाव में अंदाज़ों के 'अबूझमाड़' बने हमारे गाँव

चुनाव में अंदाज़ों के 'अबूझमाड़' बने हमारे गाँव

मैनेजमेंट वाले कहते हैं कि यदि आपने आपको मिला लक्ष्य पूरा कर लिया है,तो आप अपने बॉस की टेबल पर टांग रखकर भी बात कर सकते हैं,और थोड़ा भी चूक गए हैं,तो आप कितनी भी अच्छी या भरोसा...

खतरे में खेती और अविश्वसनीय बीमा योजना 

खतरे में खेती और अविश्वसनीय बीमा योजना 

भारतीय ग्राम-समाज को बहुत ध्यान से देखें,तो लगेगा कि वहां एक बड़े प्रतिशत में ऐसे लोग हैं,जो अपने जायज़ हक़ों और सुविधाओं के बारे में जानते ही नहीं,और,कोई उन्हें बताने के लिए ज्यादा गंभीर भी नहीं है.दूसरे वे...

पार्टियों के घोषणा-पत्र और दिल टूटने का डर 

पार्टियों के घोषणा-पत्र और दिल टूटने का डर 

नई सरकार का इंतज़ार अब बस एक हफ्ते का ही बचा है.चुनाव की घोषणा और परिणामों के बीच हुए राजनैतिक वादों और जारी हुए घोषणापत्रों ने कुछ ऐसे प्रश्न खड़े कर दिए हैं जिनके जवाब या तो बहुत...

'सहकारी-साख'की मौत से ही बीमार है खेती

'सहकारी-साख'की मौत से ही बीमार है खेती

मैदानी पत्रकार और चुनावी गणित के पंडित शायद मुझसे सहमत हों,कि जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावों के परिणाम गन्ने के दामों से तय होते हैं,वैसे ही मध्य प्रदेश के एक बड़े ग्रामीण इलाक़े में ये सोयाबीन के...

मौत के इंतज़ार में 'बेसहारा' सहकारिता 

मौत के इंतज़ार में 'बेसहारा' सहकारिता 

आजादी के बाद से,आज तक,देश के विकास हेतु अपनाये गए 'मॉडल' से हमें सहमति या असहमति हो सकती है,पर हजारों साल से चले आ रहे,जांचे,परखे और जिए गए रास्ते को बदलने,बिगाड़ने या अपनी सुविधा से बदल देने से...

'असफलता का मक़बरा'है तो गले का हार क्यों ?

'असफलता का मक़बरा'है तो गले का हार क्यों ?

वैसे तो सौ प्रतिशत अनिश्चितता सिर्फ खेलों में ही होती है,किन्तु,भारत में अब खेती,खेलों से ज्यादा अनिश्चितता भरा काम हो गया है.ऊपर से,हमने अपनी ही व्यवस्थाओं के कारण,इस अनिश्चितता को हानिकारक,कष्टकारी और दर्दनाक भी बना दिया है.आजकल किसी...

हम नहीं,तो कौन फ़िक़र करेगा अपने ही पानी की ?

हम नहीं,तो कौन फ़िक़र करेगा अपने ही पानी की ?

अभी तो नवम्बर ही आया है,और प्रदेश में पानी का संकट,अपने पैर पसारते हुए दिखने लगने लगा है.मध्यप्रदेश में कुल लगभग 241 मध्यम या बड़े जलाशय हैं,जिनमें से 35 जलाशय अपनी क्षमता के 25 प्रतिशत या कुछ तो...

क्या मालूम दालों का जहर अपने कितने पास है

क्या मालूम दालों का जहर अपने कितने पास है

न्याय यदि विलम्ब से मिले,तो वह अन्याय के समान है.लेकिन,न्याय के रास्ते में जान-बूझकर बाधा बनना एक पाप है,और मिले हुए न्याय को मानने में देर करना शायद महापाप है. आज आपको यह कहा जाय...

दूध में दृष्टिदोष अच्छी बात नहीं है 

परिवर्तन जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा है.लेकिन,जीवन की अगली व्यवस्था और उसका अस्तित्व बने रहें,इसलिए आ रहे परिवर्तन के स्वभाव और परिणामों को,ठीक समय पर,और ठीक ढंग से देख पाना,किसी न किसी के जिम्मे तो आता ही होगा...

'अन्न-स्वराज'की हानि तो 'जीवन की हानि'है

'अन्न-स्वराज'की हानि तो 'जीवन की हानि'है

मीडियावाला.इन। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में अभी-अभी,6 अक्टूबर से गांधी जी की 150 वीं जयंती की शुरुवात में 'स्वराज-यात्रा'निकाली गई.जिले के यशस्वी पूर्वज स्व.माखनलालजी चतुर्वेदी की जन्मस्थली से निकली यह यात्रा,स्व.भवानी प्रसादजी मिश्र,स्व.डॉ.आर एच रिछारिया,स्व.हरिशंकर परसाई और...

अंधों का हाथी हो गई है खेती-बाड़ी

अपने देश की एक पुरानी बोधकथा है कि कुछ अंधों को हाथी का वर्णन करना था.सबने अपने अपने हाथ में आये उसके अंगों को ही पूरा हाथी समझकर अपना अंतिम निर्णय दे दिया. समझ की इस दर्दनाक कमी...

अपने लिए ही,अपन कब जागेंगे ?

मीडियावाला.इन।  मेरे कई मित्र,मेरा लिखा हुआ पढ़कर,पहला सवाल यही करते हैं कि जो भी समस्या मैंने बताई है,उसका हल या निदान कहाँ है ? मैं कहता हूँ कि पहले हम इन समस्याओं को अपनी रोज की चर्चाओं...

'हरी' और 'पीली'के बाद अब 'सफ़ेद' क्रान्ति का संकट 

'हरी' और 'पीली'के बाद अब 'सफ़ेद' क्रान्ति का संकट 

हमारे देश में जब भी आम-आदमी के जीवन सुधारने का कोई भी सरकारी कार्यक्रम शुरू होता है,तो उसे 'क्रांति'का नाम दिया जाता है.कृषि उत्पादन बढाकर,देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्म-निर्भर बनाने के उद्देश्य से,पहले आई थी 'हरित क्रांति'.यह अलग-अलग...