Thursday, October 17, 2019

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कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...

'सांप-सीढ़ी'की 'गोटी'बन गया है गरीब किसान

'सांप-सीढ़ी'की 'गोटी'बन गया है गरीब किसान

मीडियावाला.इन। अभी तक हम सबने पढ़ रखा था कि महाभारत में अभिमन्यु के लिए एक 'चक्रव्यूह' बनाया गया था,जिसमें फंसकर वह मारा गया था.वास्तव में चक्रव्यूह सिर्फ दुश्मन ही नहीं बनाते.परिस्थितियां भी बनाती हैं.जिनमें फंसकर कोई भी वैसे ही...

क़र्ज़दार किसान देश की सेहत के लिए ख़राब है

क़र्ज़दार किसान देश की सेहत के लिए ख़राब है

मीडियावाला.इन। आप सबसे माफ़ी मांगते हुए,यदि मैं कहूँ कि - भारत एक 'कृषि-प्रधान'नहीं,'राजनीति प्रधान' देश है,व इसके लोगों का आम शगल मनोरंजन और सनसनी ही है.वे इसके लिए क़र्ज़ में भी जीना पसंद कर लेते हैं.इस पर बेशक आप...

आसमानी आफत के पीड़ित तो हम हैं,पर अपराधी भी हैं

आसमानी आफत के पीड़ित तो हम हैं,पर अपराधी भी हैं

मीडियावाला.इन। इस साल का सितम्बर भी गया और अपने देश में बारिश और बाढ़ का सितम अभी भी जारी है.इसके पहले की वर्षा याद करें,तो एक दो बार को छोड़कर,शायद ही कभी देखा हो कि आसमान से आफत और...

'कुमाता' न होने की विनती के पहले मां को जीने तो दें

'कुमाता' न होने की विनती के पहले मां को जीने तो दें

मीडियावाला.इन। श्रीदुर्गासप्तशती के पाठ करने के बाद आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'क्षमा याचना'में हम देवी से निवेदन करते हैं कि "संसार में पुत्र का कुपुत्र होना संभव है,पर माता का कुमाता होना कदापि संभव नहीं है". यह इसलिए याद...

इंसानियत के संकट की आपराधिक अनदेखी

मीडियावाला.इन। हमारे समाज की एक अजीब आदत है,कि हम जिंदगी के लिए जरूरी कई बातों को बड़े आराम से कालीन के नीचे सरका देते हैं,और गैर-जरूरी चीजों से खिलौनों की तरह झूम-झूम कर खेलने लगते हैं.इस खेल में,कई बार...

'खतरे की घंटी है'खेतों में जवानों की कमी

मीडियावाला.इन। अपने देश में कई समस्याएं जानते-बूझते और साफ़ साफ़ देखते हुए आती हैं.हम भी बड़ी मासूमियत और सहूलियत से उनकी तरफ से आँखें फेर लेते हैं. ऐसी ही एक समस्या है खेती से नौजवानों का...

कैसे होगी गफलत में भविष्य की तैयारी

कैसे होगी गफलत में भविष्य की तैयारी

मीडियावाला.इन। सितम्बर का महीना आते ही हम पूरी शिद्दत से अपने देश की शिक्षा व्यवस्था,शिक्षकों की जिम्मेदारियों और उनके प्रति हमारे व्यवहार और दायित्वों की चर्चा करने लगते हैं . जो बरसों से होता चला आ रहा है,वही इस...

माना जन्नत क़रीब है,पर गाँव  कष्ट में हैं

माना जन्नत क़रीब है,पर गाँव कष्ट में हैं

मीडियावाला.इन। यह बात निर्विवाद है कि भारत एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है,और दुनिया की सबसे तेज आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक है.लेकिन,टुकड़ों-टुकड़ों में कुछ चीजें ऐसी भी हैं,जो आईने की तरह हमें चेता रही हैं...

यह 'प्रलय'तो पानी का हमसे 'बदला'है

यह 'प्रलय'तो पानी का हमसे 'बदला'है

मीडियावाला.इन। भारत में इन दिनों आये जल-प्रलय ने अभी तक 200 जानें ले ली हैं.बेघर होने वाले लोगों की संख्या 10 लाख से थोड़ी ज्यादा ही है.प्रभावित 9 राज्यों में जिंदगी तहस-नहस हो चुकी है. केंद्र और राज्यों के...

गरीबी कलंक ही नहीं 'कोढ़ में खाज'भी है

मीडियावाला.इन। दुनिया का सभ्य समाज गरीबी को अपने ऊपर लगा सबसे बड़ा कलंक मानता है.आपको,यह आंकड़ा ढूंढने से कहीं भी मिल जाएगा कि 1960 के विश्व आर्थिक सर्वेक्षण में आय का अधिकतम अंतर 30 गुना था.उसके अगले...

अब होगी 'भूख' की लड़ाई 'प्यास'से...

अब होगी 'भूख' की लड़ाई 'प्यास'से...

मीडियावाला.इन। यह शीर्षक,या इस तरह का विचार मात्र आपको अटपटा और झूठा लगेगा.लेकिन,यदि कोई ऐसा कहे,तो थोड़ा रूककर,इस पर विचार जरूर कीजियेगा.देश भर को तर-बतर कर देने वाले इस मौसम में यह बात करना आपको मूर्खता भी...

गाय पर बात तो बहुत हुई काम कब होगा ?

गाय पर बात तो बहुत हुई काम कब होगा ?

मीडियावाला.इन। एक प्रदेश के मुख्यमंत्रीजी ने कहा है कि गाय सांस लेते समय तो ऑक्सीजन लेती ही है,सांस छोड़ते समय भी ऑक्सीजन ही छोड़ती है.इसकी निकटता से मनुष्य की कई शारीरिक व्याधियां भी दूर होती हैं. यह बात दिल्ली के...

बर्बादी पर चौंकना हमें क्यों नहीं आता ?

बर्बादी पर चौंकना हमें क्यों नहीं आता ?

मीडियावाला.इन। कितने सालों से बहस चल रही है कि मानवता का सबसे बड़ा शत्रु 'कुपोषण'है.वर्ष दो हज़ार के बाद शुरू हुई 'सहस्त्राब्दी'में,एक नई दुनिया बनाने का संकल्प सभी देशों ने लिया था.इसके तहत जीवन को बेहतर बनाने के लिए आठ...

'जीत के आगे ज़िन्दगी क्यों नहीं'?

मीडियावाला.इन। टीवी,अखबारों और रेडियो पर एक विज्ञापन खूब आता है कि 'डर के आगे जीत है'.यह वाक्य शायद हमारे अपने सपनों को छूता होगा,तभी तो सबकी ज़बान पर जल्दी से चढ़ा,और लगातार बहुत दिनों तक चला,या प्रभावी रूप से चल...

हक़ बनते ही क्यों शुरू होती है बर्बादी

मीडियावाला.इन। आप अपने आसपास खुद देखें.फिर बताएं कि शिक्षा पर दिए जाने वाले भाषणों या सुन्दर और रंग बिरंगे विज्ञापनों और संविधान से जनता को मिले 'शिक्षा के अधिकार' पर आपको भरोसा होता है ?   भारत में,शायद भगवान...

गलती सबकी है तो 'सफ़ेद कोट ही खून से लाल' क्यों ?

गलती सबकी है तो 'सफ़ेद कोट ही खून से लाल' क्यों ?

मीडियावाला.इन। मुजफ्फरपुर में डेढ़ सौ बच्चों का दिमागी बुखार से मरना,आजाद भारत और यहाँ के सभ्य समाज पर,एक बहुत बड़ा कलंक है.इस घटना के कवरेज के लिए एक-दो दिन पहले वहां गई एक टीवी एंकर लगभग दहाड़ते हुए,एक डाक्टर...

'ढब्बूजी'आप हर शहर में क्यों नहीं हैं

'ढब्बूजी'आप हर शहर में क्यों नहीं हैं

मीडियावाला.इन। पढ़े-लिखे लोगों की हर बस्ती में,यह आम दृश्य होता है कि नल के आते ही,कहीं पक्का आँगन धुल रहा है,कहीं कारें धुल रही हैं या कहीं पूरी तसल्ली से लॉन में पानी दिया जा रहा है,तो कहीं नल की...

अब तो देखें कि'कम्युनिकेशन गैप' है कहाँ 

अब तो देखें कि'कम्युनिकेशन गैप' है कहाँ 

मीडियावाला.इन।   अभी पिछले हफ्ते'विश्व पर्यावरण दिवस'था.उसके चार दिन पहले 'विश्व दूध दिवस'था.इसके पहले,लगे-लगे महीनों में 'विश्व पृथ्वी दिवस','विश्व पानी दिवस' और 'विश्व वन्य प्राणी दिवस'थे. साफ़ साफ़ कहें तो ये सब वार्षिक कर्मकांड से...

गंगोत्री से ही मैली होती आ रही दूध की गंगा

गंगोत्री से ही मैली होती आ रही दूध की गंगा

मीडियावाला.इन। पिछले हफ्ते,मध्यप्रदेश में किसानों की हड़ताल के दौरान,आंदोलनकारी किसानों द्वारा भोपाल के पास मिसरोद गाँव में किसी एक किसान को दूध से नहलाने का चित्र भी अखबारों में छपा था.उसके पहले,गाँवों से शहर की तरफ आ रहे दूध के...