Sunday, April 21, 2019

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कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...

चुनावी की चकल्लस में अनदेखा जलता-झुलसता ग्राम-समाज

चुनावी की चकल्लस में अनदेखा जलता-झुलसता ग्राम-समाज

मीडियावाला.इन। इन दिनों हम सब चुनाव के रोमांच में गाफिल है. वहीँ,भारत के ग्रामीण-समाज का एक बड़ा हिस्सा,इस डर में सो,जाग और जी रहा है कि किस क्षण,कोई आग उसके आसपास लगकर जान-माल के लिए  खतरा न बन जाय. जिसका...

मुद्दे बालाकोट और बहत्तर हजार ही क्यों, किसानी क्यों नहीं?

मुद्दे बालाकोट और बहत्तर हजार ही क्यों, किसानी क्यों नहीं?

अपने देश-प्रदेश ने पिछले दो-ढाई साल में,चार पांच तो बड़े-बड़े और कई छोटे-मोटे स्थानीय किसान आंदोलन देखे हैं.ये आंदोलन इतने प्रभावी तो थे ही,कि पूरे देश का ध्यान उन पर गया था. मध्यप्रदेश के मंदसौर में गोली चली,जानें...

'नरवई'की आग नीति से नहीं अच्छी नीयत से बुझेगी

'नरवई'की आग नीति से नहीं अच्छी नीयत से बुझेगी

मीडियावाला.इन। अनिश्चितताओं के,दुनिया में जितने भी खेल होते होंगे,या विरोधाभासों के जितने भी मुहावरे सभी भाषाओँ में होंगे,वे सब भारत की खेती-बाड़ी पर लागू होते हैं.सांप,छछूंदर,नेवले,कुँओं-खाइयों आदि वाले सारे मुहावरों का सच या सांप-सीढ़ी के खेल की अनिश्चितता आदि सब...

'नरवई'की आग नीति से नहीं अच्छी नीयत से बुझेगी

'नरवई'की आग नीति से नहीं अच्छी नीयत से बुझेगी

अनिश्चितताओं के,दुनिया में जितने भी खेल होते होंगे,या विरोधाभासों के जितने भी मुहावरे सभी भाषाओँ में होंगे,वे सब भारत की खेती-बाड़ी पर लागू होते हैं.सांप,छछूंदर,नेवले,कुँओं-खाइयों आदि वाले सारे मुहावरों का सच या सांप-सीढ़ी के खेल की अनिश्चितता आदि ...

बेरोजगारी की अंधी गली और आँखें मूँदे हम

बेरोजगारी की अंधी गली और आँखें मूँदे हम

मीडियावाला.इन। डॉ.राही मासूम रज़ा का एक कालजयी उपन्यास है 'आधा गाँव'.इस उपन्यास की एक पंक्ति हर संवेदनशील व्यक्ति की छाती फाड़कर रख देती है कि "गाँव जब चौड़ी-चौड़ी छातियों वाले जवानों की पीठ देखता है,तो कलेजा मुंह में आ जाता...

सरकार नहीं, पानी पर ज्यादा लापरवाह है हम

मीडियावाला.इन।   जल,जंगल,जमीन के साथ जीवन का चतुर्भुज कुछ ऐसा है,कि इनमें से एक भी तत्त्व गड़बड़ाने से चतुर्भुज तो बिगड़ता ही है,शेष तत्त्व भी अपने आप ही बिगड़ जाते हैं.इस बिगाड़...

ग्रामीण बेरोजगारी का जिन्न और अँधा मशीनीकरण

मीडियावाला.इन। अपनी तरह के अकेले पत्रकार श्री पी.साईंनाथ ने तीन-चार दिन पहले ही भोपाल में कहा था कि-"अपने देश में कृषि का संकट,अब कृषि से काफी आगे जाकर,पूरे समाज का संकट बन गया है.यह इंसानियत का संकट भी बन...

जमीन का जादू मंडी और मौसम की मार से ज्यादा घातक है

मीडियावाला.इन। भारतीय किसानों की मुश्किलें मौसम की मार,या मंडी और बाज़ार की बेरुखी पर ही शुरू या ख़तम नहीं होती.सरकारों में रखे जाने वाले जमीनों के हिसाब-किताब का मामला और इससे जुड़े सरकारी ...

ऊंट पर बैठकर हड़बड़ी में हो रही गौ-रक्षा

मीडियावाला.इन हमारे बच्चे अपनी किताब-कापियों में जरूर पढ़ते-लिखते हैं कि-गाय एक पालतू जानवर है.इसके पालतू और उपयोगी होने से भी बहुत-बहुत आगे तक की बातें,हमें सिखाई और पढ़ाई जाती रही हैं.लेकिन,पिछले लगभग ढाई सौ सालों से,अपने देश में,गाय बाकी सबके ...

बीमार धरती मां और इलाज में सुस्त हम

मीडियावाला.इन। प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 19 फरवरी,2015 के दिन,राजस्थान के सूरतगढ़ में कहा था कि अपनी धरती मां बीमार है.हम व्यवस्था कर रहे हैं कि अब किसान को भी पता चले,कि जिस मिट्टी पर वह मेहनत कर...

वापस पानी में न चली जाय ऋणमुक्ति की भैंस

वापस पानी में न चली जाय ऋणमुक्ति की भैंस

ऋणमुक्ति की घोषणा हुए पूरे डेढ़ माह हो चुके हैं.इसी के कारण तीन राज्यों में राजनीतिक'तख्ता पलट' हुआ था.लेकिन, इस डेढ़ महीने के बाद भी,घोषणा के क्रियान्वयन में सभी के हाथ-पाँव फूल गए हैं,और पाँव के नीचे की...

"दिस ब्लडी पॉलिटिक्स"

"दिस ब्लडी पॉलिटिक्स"

मीडियावाला.इन। समझ की भिन्नता के लिए अपने यहाँ एक मुहावरा लगभग हर भाषा में है कि'पसंद अपनी-अपनी,ख़याल अपना-अपना'.अपनी बात शुरू करने से पहले,मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि श्री अमिताभ बच्चन अभिनीत एक फिल्म आई थी'आखिरी रास्ता'.अमितजी इसमें दोहरी भूमिका...

वादों के साथ बेड़ियों की बातें भी कर लें

वादों के साथ बेड़ियों की बातें भी कर लें

अपने देश का कोई भी अखबार उठा लें,टीवी चैनल देख लें,संसदीय सदनों की कार्यवाही ही देख लें,हालांकि चुनावी घोषणापत्रों का अब काम नहीं रहा,इसलिए उनकी बात नहीं करते.आपको निश्चित रूप से लगेगा कि देश के गाँवों में तो...

यूरिया का संकट,जो न होकर भी हुआ

यूरिया का संकट,जो न होकर भी हुआ

शायद हममें से सब लोग भूले न हों. दिल्ली के एक रेस्तरां में दस-पच्चीस लोगों के सामने,जेसिका नाम की एक लड़की की किसी ने बंदूक से ह्त्या कर दी थी.तारीख और गवाहों की भूल-भुलैया में किसी पर भी...

ऋणमुक्ति, वोट का ईनाम नहीं, हक़ है

ऋणमुक्ति, वोट का ईनाम नहीं, हक़ है

यदि आप सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं,चाव से टीवी की ख़बरें देखते रहते हैं या 'दिल लगाकर'अखबार ही पढ़ते हैं,तो किसानों की ऋण मुक्ति पर अपनी एक निश्चित राय बना चुके होंगे.वह भी यह कि यदि ऐसा है,तो...

चुनाव में अंदाज़ों के 'अबूझमाड़' बने हमारे गाँव

चुनाव में अंदाज़ों के 'अबूझमाड़' बने हमारे गाँव

मैनेजमेंट वाले कहते हैं कि यदि आपने आपको मिला लक्ष्य पूरा कर लिया है,तो आप अपने बॉस की टेबल पर टांग रखकर भी बात कर सकते हैं,और थोड़ा भी चूक गए हैं,तो आप कितनी भी अच्छी या भरोसा...

खतरे में खेती और अविश्वसनीय बीमा योजना 

खतरे में खेती और अविश्वसनीय बीमा योजना 

भारतीय ग्राम-समाज को बहुत ध्यान से देखें,तो लगेगा कि वहां एक बड़े प्रतिशत में ऐसे लोग हैं,जो अपने जायज़ हक़ों और सुविधाओं के बारे में जानते ही नहीं,और,कोई उन्हें बताने के लिए ज्यादा गंभीर भी नहीं है.दूसरे वे...

पार्टियों के घोषणा-पत्र और दिल टूटने का डर 

पार्टियों के घोषणा-पत्र और दिल टूटने का डर 

नई सरकार का इंतज़ार अब बस एक हफ्ते का ही बचा है.चुनाव की घोषणा और परिणामों के बीच हुए राजनैतिक वादों और जारी हुए घोषणापत्रों ने कुछ ऐसे प्रश्न खड़े कर दिए हैं जिनके जवाब या तो बहुत...

'सहकारी-साख'की मौत से ही बीमार है खेती

'सहकारी-साख'की मौत से ही बीमार है खेती

मैदानी पत्रकार और चुनावी गणित के पंडित शायद मुझसे सहमत हों,कि जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावों के परिणाम गन्ने के दामों से तय होते हैं,वैसे ही मध्य प्रदेश के एक बड़े ग्रामीण इलाक़े में ये सोयाबीन के...

मौत के इंतज़ार में 'बेसहारा' सहकारिता 

मौत के इंतज़ार में 'बेसहारा' सहकारिता 

आजादी के बाद से,आज तक,देश के विकास हेतु अपनाये गए 'मॉडल' से हमें सहमति या असहमति हो सकती है,पर हजारों साल से चले आ रहे,जांचे,परखे और जिए गए रास्ते को बदलने,बिगाड़ने या अपनी सुविधा से बदल देने से...