Wednesday, December 12, 2018

कविता

खांटी घरेलू औरत

खांटी घरेलू औरत

मीडियावाला.इन। देश की ख्यातनाम साहित्यकार ममता कालियाजी के जन्मदिन पर  विशेष  कभी कोई ऊंची बात नहीं सोचती खांटी घरेलू औरत उसका दिन कतर-ब्योंत में बीत जाता है और रात उधेड़बुन में बची दाल के मैं पराठे बना लूं खट्टे...

कुछ अनकहे अलफ़ाज़.

कुछ अनकहे अलफ़ाज़.

मीडियावाला.इन।आज साहित्य के कविता की कड़ी में एक युवा वैज्ञानिक डॉ पल्लवी तिवारी की कवितायें लेकर आयें है ,मध्यप्रदेश की रहनेवाली पल्लवी विगत दस वर्षों से यू एस ए के ओहायो स्टेट मे रह रही है ,वे वहाँ क्लीवलैंड...

अमृता प्रीतम की  कविताएं 

अमृता प्रीतम की  कविताएं 

मीडियावाला.इन। मीडियावाला.इन।अमृता प्रीतम को याद  करते हुए -- अमृता प्रीतम देश की उन कवियित्रियों में से एक हैं जिनकी मोहब्बत की कहानी आज भी मशहूर है। 31 अगस्त 1919 को पंजाब के गुंजरावाला में जन्मीं अमृता का बचपन लाहौर में...

हिरोशिमा

हिरोशिमा

  मैंने   हाँथ  बढ़ाया ही था खिड़की  खोल  तुम्हे टाटा करने  मानव  दानव का फूट पड़ा  प्रकाश  पुन्ज तुम  देखते  ही देखते  वाष्पित हो गये  और मैं  जीवित  ...

। विजय-पथ ।।

। विजय-पथ ।।

मीडियावाला.इन। । विजय-पथ ।। कभी लिखता हूँ, कभी बुनता हूं, अपने पसीने से माथे की लकीरें बदलता हूं कभी रूखी-सुखी खाकर, तो कभी थोड़े में गुजारा करता हूं मैं अपने हाथों की लकीरो को अपने श्रम से बदलता हूं...

कालिदास की शेषकथा के अमर गायक

कालिदास की शेषकथा के अमर गायक

आज राष्ट्रकवि डा.शिवमंगल सिंह सुमनजी की जयंती है। सुमनजी, दिनकरजी की तरह ऐसे यशस्वी कवि थे जिनकी हुंकार से राष्ट्रअभिमान की धारा फूटती थी। संसद में अटलजी ने स्वयं की कविता से ज्यादा सुमनजी की कविताएँ उद्धृत की।...

कविता : पचास पार की औरतों

कविता : पचास पार की औरतों

पचास पार की औरतों थोड़ी सी आंच अपने लिए बचा कर रखो  राख़ के ढेर मे बदलने से पहले  अपनी पसंद का कोई तंदूर चुन कर रख दो अपनी थोड़ी सी आंच  खुद को भस्म करने...

कविता : सादर श्रद्धांजलि आ. परम पूज्य नर्मदा पुत्र श्री वेगड़ जी को

कविता : सादर श्रद्धांजलि आ. परम पूज्य नर्मदा पुत्र श्री वेगड़ जी को

आज मै दुःखी हूँ उदास हूँ  मेरा पुत्र प्रस्थान कर गया  महा लोक को देव लोक को अंजुली की रेत बिखर गई  महा शून्य शेष रहा मै उसमे नहीँ रची बसी वह मेरी बूँद बूँद मे...

कविता : एब्स्ट्रैक्ट

कविता : एब्स्ट्रैक्ट

तुम्हें लगता है मेरा अक्स - एब्स्ट्रैक्ट लगना भी चाहिए - तुम्हें ! एब्स्ट्रैक्ट हूँ मैं - झूठ और  नाइंसाफ़ी के बीच इंसाफ़ में ... इंसानियत और नफ़रत की दीवारों पर ठुंकी कीलों से झूलती रस्सी की...

कविताएं - रीता दास राम

कविताएं - रीता दास राम

1  गीला मन  भीगी भीगी औरतें  भरी-भरी आँखें  पसीने से तर-बतर  संस्कृति की जुगाली पर  खींच रही जिंदगी  खोलते हुए बंधन  एक एक इंच गांठ  गर्भाशय को मशीन  शब्द...

कविता : आनंद कुमार शर्मा

कविता : आनंद कुमार शर्मा

साहित्य की लगभग सभी विधाओं में दखल रखने वाले श्री आनंद शर्माजी का आज जन्म दिन है और आज इस खास अवसर पर हम यहाँ उनकी एक खुबसूरत सी कविता प्रकाशित कर रहे है|  ...

कविताएँ : पंखुरी सिन्हा

कविताएँ : पंखुरी सिन्हा

खील बताशा कविता खील बताशे, कविता मेरी दोस्त, कविता कुल्हिया, चुकिया, कविता तीज त्यौहार, कविता गीत मल्हार, कविता गली नुक्कड़, कविता चौक चोराहा, कविता धरी बातें, कविता बातों में लौटना, कविता बातों का विसर्जन, कविता दराजों में...

कविता : सुन रही हो श्यामली - आरती तिवारी

कविता : सुन रही हो श्यामली - आरती तिवारी

|| सुन रही हो श्यामली  ||   तुम तो वही बेबाक बिंदास पारदर्शी लड़की हो न जिसे खरी बात मुंह पर कह देने से कोई रोक नहीं पाता था और सलीके से कही...

कविता - चालीस साला औरतें

कविता - चालीस साला औरतें

इन अलसाई आँखों ने रात भर जाग कर खरीदे हैं कुछ बंजारा सपने सालों से पोस्टपोन की गई उम्मीदें उफान पर हैं कि पूरे होने का यही वक्त तय हुआ होगा शायद अभी नन्हीं उँगलियों से...

कविताएँ - रूचि बागड़देव

कविताएँ - रूचि बागड़देव

प्रेमगीत   मैं चाहती हूँ किसी नदी के निर्जन किनारे पर बैठी रही हूँ देर तक पानी में पैर डाले तट के सौन्दर्य को निहारती मैं चाहती हूँ किसी पत्थर...