Wednesday, July 24, 2019

साहित्य

कहानी : फ्रेम - प्रज्ञा

कहानी : फ्रेम - प्रज्ञा

फ्रेम “आज शाम पांच बजे आई. एन. ए…. दिल्ली हाट” “ओ.के.” “ठीक पांच” “ओ.के.” रावी और जतिन के बीच दिन भर में न जाने कितने मैसेजेस का आदान-प्रदान होता रहता है। कहने को...

व्यंग : चिंकारा होने की आज़ादी - प्रेम जन्मेजय

व्यंग : चिंकारा होने की आज़ादी - प्रेम जन्मेजय

मीडियावाला.इन। मेरे दांत में भयंकर दर्द था। जब दर्द भयंकर हो तो आप दर्द के अतिरिक्त और कुछ नहीं सोच पाते हैं। वह दर्द रोटी का हो, बेरोजगारी का हो, फसल बरबाद होने का हो...

कविता : सुन रही हो श्यामली - आरती तिवारी

कविता : सुन रही हो श्यामली - आरती तिवारी

|| सुन रही हो श्यामली  ||   तुम तो वही बेबाक बिंदास पारदर्शी लड़की हो न जिसे खरी बात मुंह पर कह देने से कोई रोक नहीं पाता था और सलीके से कही...

कहानी : मलाई - गीता श्री

कहानी : मलाई - गीता श्री

सब लोग हैरान, अचानक सुरीलिया को क्या हो गया है। सुरीलिया की ठसक देखते बन रही है। वह घर के बाहर चौकी पर धम्म से बैठ गई। घर के अंदर से उसका सारा संसार बाहर आ चुका था। मां...

कहानी - जो जी ना सके... - जयश्री रॉय

कहानी - जो जी ना सके... - जयश्री रॉय

मीडियावाला.इन। बहुत दिनों बाद घर लौटी हूँ, अच्छा लग रहा है। इस बार अस्पताल का चक्कर बहुत लंबा रहा। देवेश बिस्तर के बगल में बैठ कर फल छुड़ाते हुये मज़ाक में कहता था, गुस्सा हो कर मायके...

कहानी - कंट्रोल+अल्ट+शिफ्ट = डिलीट

कहानी - कंट्रोल+अल्ट+शिफ्ट = डिलीट

मीडियावाला.इन। मैंने कुछ नहीं किया। मैं बस गेम जीतने ही वाला था। काउंटर स्ट्राइ के तीन ग्रेड पूरे होने आए थे। मेरा कंसोल मेरे बस में नहीं था। लेफ्ट-राइट कीज मूव करते हुए मैं खुद भी उसी...

कविता - चालीस साला औरतें

कविता - चालीस साला औरतें

इन अलसाई आँखों ने रात भर जाग कर खरीदे हैं कुछ बंजारा सपने सालों से पोस्टपोन की गई उम्मीदें उफान पर हैं कि पूरे होने का यही वक्त तय हुआ होगा शायद अभी नन्हीं उँगलियों से...

कविताएँ - रूचि बागड़देव

कविताएँ - रूचि बागड़देव

प्रेमगीत   मैं चाहती हूँ किसी नदी के निर्जन किनारे पर बैठी रही हूँ देर तक पानी में पैर डाले तट के सौन्दर्य को निहारती मैं चाहती हूँ किसी पत्थर...

कहानी - ... कि हरदौल आते हैं

कहानी - ... कि हरदौल आते हैं

मीडियावाला.इन। कहानी। हम विस्मय से सुनते हैं सांस थामकर। रात की खामोशी को तोड़ते हुए दूर कहीं से मामी की आवाज़ गिरती है। वह कांच की तरह गिरती है और किरच–किरच पूरे कमरे में बिखर जाती है। चौदस...

आज से साहित्य की केटेगरी

आज से साहित्य की केटेगरी

मीडियावाला.इन। हमारे कई मित्रों और रीडर्स के विशेष आग्रह पर हम आज से साहित्य की केटेगरी शुरू कर रहे है| इस केटेगरी में कहानी, व्यंग, कविता, डायरी और अन्य विधाओं पर केन्द्रित सामग्री को शामिल...

व्यंग्य - कद की कवायद

व्यंग्य - कद की कवायद

मीडियावाला.इन। व्यंग्य विधा के जाने-माने साहित्यकार स्व. सुशील सिद्धार्थ  आज होते तो वे इस टीम का हिस्सा होते, अफ़सोस पोर्टल शुरू होने के पहले ही वे असमय चले गए | सुशील सिद्धार्थ का जाना दुखद, बेहद दुखद। अविश्वसनीय...