Saturday, December 15, 2018
क्योंकि नदी को मौत नहीं आती

क्योंकि नदी को मौत नहीं आती

यह उसकी नियती है या विवशता कि रोज मरकर भी नदी को मौत नहीं आती। न जाने कौन सी उम्मीद हर बूंद में बांध रखी है, जो उसे जिलाए रखती है। जिंदगी और मौत दोनों उसके आंचल में बंधे होते हैं। वह अपने तमाम दर्द समेटे अनवरत भागती रहती है। यह बेशक लाजमी है कि उस नदी के लिए कोई हठ करके बैठ जाए। आहार छोड़ दे और जब उम्मीद फिर भी पूरी न हो तो नदी के प्रतिनिधि जल का भी त्याग कर दे। आखिर में अपनी सांसें उसे सौंप दे। नदी और उसके बेटे पर निष्ठुर जिम्मेदारों की बेशर्मी हावी है, जिनके कलेजे हैं कि फिर भी नहीं फटते। 

यह खबर किसी के लिए कितनी महत्वपूर्ण होगी कहना मुश्किल है। गंगा के लिए मातृ सदन का एक और सपूत कुर्बान हो गया। 22 जून से अनशन कर रहे थे प्रो गुरुदास अग्रवाल यानी स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद। क्योंकि वे कई पत्र लिख चुके थे, प्रस्ताव दे चुके थे। दो बार पहले भी अनशन कर चुके थे। नदी के लिए कानून का मसौदा बनाकर रखा था। सरकार को तश्तरी में सजा कर दे रहे थे कि कानून बना लीजिए और बचा लीजिए उस मां को, जिसने आपको बनारस बुलाया था। जिसके लिए आप गर्व से कहते थे कि गंगा की सेवा मेरे सौभाग्य में है। लेकिन चि_ी का जवाब तक नहीं आया तो आगे की बात सोचना भी बेमानी है। 

हारकर विज्ञान और इंजीनियनिंग का प्रोफेसर भगीरथी का बेटा अपनी मां के लिए तीसरी बार हठ योग साधना करने लगा। स्वामी सानंद अनशन पर उतर आए। सरकार को 9 अक्टूबर तक का वक्त दिया था। कोई सुनवाई नहीं हुई तो 10 अक्टूबर से जल भी त्याग दिया। इस बीच दो बार उमा भारती आई भी, लेकिन उनके पास गंगा के बेटे के सवालों के जवाब नहीं थे। जुमलों से जनता के वोट तो जीते जा सकते हैं, लेकिन मां के अस्तित्व की रक्षा के लिए अनशन पर बैठे बेटे को बहलाया नहीं जा सकता। और वह भी तब जब वह अपना सर्वस्व अर्पित कर चुके हो। एक आखिरी साध बाकी हो कि मां का आंचल फिर उतना ही शुद्ध और पवित्र हो सके। 

देह का क्या था, उसे तो जाना ही था। आज वह भी चली गई, लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा। क्या हुआ, गंगा तो संस्कृति की प्रतिनिधि है, जिसके लिए आप हजारों करोड़ की योजना लेकर आए थे। क्या नमामि गंगे भी हिंदू संवेदनाएं जगाने और बंटोरने का स्वांगभर था। वरना क्या वजह है कि राष्ट्रीय नदी और विधिक व्यक्तित्व का दर्जा देकर भी गंगा की रक्षा नहीं कर पाए।  गंगा सिर्फ एक नदी नहीं है। हमारी संस्कृति और सभ्यता की प्रतिनिधि है। 2510 किमी की इस जल रेखा पर देश 40 फीसदी आबादी निर्भर करती है। 10 लाख वर्ग किमी की भूमि उसी से पोषित है। 

और उसी गंगा के लिए हमने अब तक किया क्या है। उसमें शव बहाए हैं, निर्माल्य उंडेले हैं, फैक्ट्रियों का अपशिष्ट छोड़ा है। यहां तक कि हमारे घरों से निकलने वाली गंदगी भी उसी के हवाले करते रहे हैं। यही सोचते होंगे कि गंगा तो पवित्र है, शुद्ध है, उस पर इस गंदगी का क्या असर होगा। ऐसा पाखंड सिर्फ हम ही कर सकते हैं, जिसका नतीजा है कि आज गंगा नहाने लायक नहीं रही। उसके जल का आचमन कर पाना मुश्किल है। कई इलाकों में सिंचाई के योग्य भी नहीं रहा उसका जल। 

जबकि गंगा सफाई के नाम पर वर्षों से नौटंकी कर रहे हैं। 1985 में पहली बार गंगा एक्शन प्लान बनाया गया। 15 वर्ष में इस पर 901 करोड़ रुपए खर्च हुए। 1993 में कुछ और नदियों को मिलाकर गंगा एक्शन प्लान-2 शुरू किया गया। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना बनी। 1995 से लेकर 2014 तक 4168 करोड़ रुपए खर्च करने का दावा है, लेकिन यदि सच में यह काम हुआ है तो वह गया कहां। एक रिसर्च के मुताबिक गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा गिर रहा है। यूपी में होने वाली 12 फीसदी बीमारियों की वजह गंगा का प्रदूषित जल है। 

आखिर कोई इतना उदासीन कैसे हो सकता है। हम अपनी आंखों के सामने अपनी मां को मरते देख रहे हैं और कुछ नहीं कर पा रहे हैं। औद्योगिक घरानों, धर्म के ठेकेदारों और गैर जिम्मेदार नगरीय निकायों के आगे घुटनों के बल बैठे हैं। आखिर कब तक भगीरथी इस तरह का मौत का तमाशा देखती रहेगी। क्या हम उस की इसी मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं कि सब सहकर भी वह जीवित रहने को अभिशप्त है। लेकिन कब तक कभी तो वह इस श्राप से मुक्त होगी, उस दिन खुद हमारा क्या होगा। तब कोई सानंद नहीं आएगा, हमें जगाने। अब भी वक्त है। 

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अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.