Thursday, October 24, 2019
कहानी दो हुबहू जुडवां हमशक्लों की

कहानी दो हुबहू जुडवां हमशक्लों की

मीडियावाला.इन।

वैसे मैं गया तो था भोपाल कलेक्टर तरूण पिथोडे से मिलने जो किसी बैठक के सिलसिले में पुलिस कंटोल रूम आये हुये थे। वो सामने सोफे पर बैठे थे और मुझे बता रहे थे कि पटना और पुणे में पानी गिरा तो हाहाकार मचा मगर भोपाल में औसत से सत्तर फीसदी ज्यादा बारिश होने के बाद भी हल्ला नहीं हुआ। उनसे बात खत्म कर मैंने पीछे मुंह घुमाया था ही कि हैरान रह गया। एक जैसी शक्ल सूरत और कपडे वाले दो लोग एक ही सोफे पर अगल बगल में बैठे थे। पहले तो एक पल को झटका सा लगा कि सब कुछ सही देख रहा हूं या आंखों का ये धोखा हो रहा है। मगर अगले ही पल अपने को संभाला और फिर दोनों को गौर से उपर से नीचे तक देखने लगा तो मेरी हैरानी देखकर वहीं बैठे एसएसपी इरशाद वली बोले अरे परेशान मत हो ये भोपाल की बडी चर्चित जुडवां जोडी हैं। पहली बार इनको देखकर सबको झटके लगते हैं। 

अरे भैया झटके नहीं हमें देखकर कई दफा लोग सदमे में आ जाते हैं, एमपी नगर के अपने आफिस में अगल बगल में एक जैसे कपडे पहनकर बैठे गौरव शर्मा और सौरभ शर्मा ये हमें बता रहे थे। ये किस्सा सौरभ ने बताया कि एक बार वो किसी अफसर से मिलने सरकारी दफतर में पहुंचा उसी वक्त एक और व्यक्ति उसी अधिकारी से मिलने जा रहा था मैंने और उसने एक साथ रजिस्टर पर एंटी की, मैं सीढियों से दो मंजिल चढा मगर वो लिफट से उस अफसर के पास पहंुचा जहां पहले से ही गौरव मौजुद था कमरे में एंटी करते ही जैसे ही उस व्यक्ति ने गौरव को देखा तो सीना पकडकर धम्म से सोफे पर बैठ गया ओर जब तक सौरभ सीढियों से उस कमरे में आ नहीं गया उसकी सांस उपर नीचे होती रही। वो ये देखकर हैरान था कि जिस व्यक्ति को वो सीढियों पर छोडकर आ रहा है वो मुझसे पहले कैसे इस कमरे में मौजूद है। हंसते हंसते हुये गौरव सौरभ ने कहा कि वो बोल भर नहीं रहा था मगर उसके हाव भाव ऐसे ही थे जैस कोई जिंदा भूत देख लिया हो। ऐसे एक नहीं कई किस्से हैं। भिंड के बस स्टेंड मोहल्ले के अस्पताल वाले शर्मा जी के ये दोनों लडके गौरव शर्मा और सौरभ शर्मा बचपन से ही अपनी मिलती जुलती शक्ल सूरत और कपडों के कारण चर्चा में रहते आये हैं। सलमान खान की जुडवां फिल्म का ये असर रहा कि स्कूल में कितनी भी शरारत करो टीचर मारते नहीं थे क्योंकि उस फिल्म में बताया गया था कि एक जुडवां भाई को मारो तो दूसरे को भी चोट लगती है बस फिर क्या था खूब उधम करो। सारे शिक्षकों ने एक दूसरे को जुडवां फिल्म का किस्सा सुना दिया था ऐसे में अपना बचपन अच्छे से गुजरा, कक्षा के दूसरे दोस्तों की ठुकाई होती मगर अपन भिंड के स्कूल में पिटाई से बचते रहे।हां ये जरूर हुआ कि कभी सडक पर गौरव के हिस्से की पिटाई सौरभ को खानी पडी। गौरव के दोस्त का झगडा हुआ तो झगडा कर गौरव भाग गया रह गया मैं तो मुझे गौरव समझकर पीट दिया सौरभ ने हंसकर बताया। आमतौर पर जुडवां बच्चों को बचपन में ही एक जैसे कपडे पहनाये जाते हैं मगर बचपन की ये आदत गौरव सौरभ में बडे तक कायम हैं। दोनों एक जैसे ही हुबहू कपडे पहनकर निकलते हैं। शर्ट , पेंट, जूते, घडी, पेन और हाथों में पहनने वाली अंगूठियो के नग तक दोनों के एक जैसे हैं। चेहरा मोहरा और कद काठी तो भगवान ने दोनों को समान दी हुयी है साथ ही बालों में आ रही सफेदी भी तकरीबन एक जैसी है। इसका असर ये होता है कि इनको देखने वाला तुरंत धोखा खाकर सदमे में आने को उतावला हो जाता है। फर्क बस यही है कि एक भाई इंजीनियर तो एक डाक्टर है मगर कंपनी दोनों मिलकर आईटी साल्यूशन की चला रहे हैं। और एक साथ एक कंपनी में काम करना ही लोगों की उलझन का कारण बनता है। दफतर में काम करने वाले लोग तो चकित हो ही जाते हैं पहली या दूसरी बार में बडे अफसर भी नहीं मानते कि कोई दूसरा जुडवां भी होगा जब तक मिला ना दिया जाये और इस बीच में एक दो एपिसोड ऐसे हो जाते हैं कि सदमे की नौबत आ जाती हैं। 

एक जैसे दिखना और एक जैसे कपडे पहनना ही हमारी पहचान है ये कहते हैं इंजीनियर गौरव तो डाक्टर सौरभ कहते हैं कि यही हमारी टीआरपी है, यही हमारी सेलेब्रिटी हैं कि जहंा जाते हैं वहंा हमारी ही चर्चा होने लगती है सडक पर चलते कोई हमे राम श्याम कहता है तो कोई लव कुश मगर हमें सब अच्छा लगता है किसी बात का हम बुरा नहीं मानते क्योंकि चीन में जुडवां लोगों को भगवान के भेजे विशेष लोग माना जाता है तो हम भी मानते हैं कि हम सबसे अलग हैं विशेष हैं। मगर इन जुडवां भाइयों की कहानी में एक टिवस्ट और है कि उनकी बीबियां भी जुडवां हैं और वो भी हुबहू एक जैसा दिखती हैं। गौरव सौरभ ने बताया कि हमने अपनी जल्दी होने वाली शादी टालने के लिये किसी सजातीय जुडवां बहनों से ही शादी करने की अजीब सी शर्त रखी और शिवपुरी की सोनी मोनी से गौरव सौरभ की तीन साल पहले शादी भी हो गयी। ये जुडवां लडकियां भी बचपन से एक साथ ही रहीं हैं और एक साथ रहने के सपने देखती थीं इसलिये अब ये चारों रोहित नगर में एक साथ ही रहते हैं और जुडवां होने को एंजाय करते हैं। मगर जैसे सडक चलते लोग आपको देखकर चक्करघिन्नी होते हैं क्या आपकी पत्नियों को कभी सदमे की हालत नहीं बनी। नहीं कभी कभार हो जाता है मगर साथ साथ रहते रहते हम दोनों के फर्क समझ में आने लगते हैं मगर हां शुरूआत में थोडी दिक्कत आती थी। शर्माते हुये गौरव सौरभ ने बताया। मगर दिक्कत क्या आयी ? ये हमने जान बूझकर नहीं पूछा। 

0 comments      

Add Comment


ब्रजेश राजपूत

तकरीबन पच्चीस साल के पत्रकारिता करियर में अधिकतर वक्त टीवी चैनल की रिपोर्टिंग करते हुये गुजारा। सहारा टीवी से होते हुये स्टार न्यूज में जो अब एबीपी न्यूज के नाम से चल रहा है। इसी एबीपी न्यूज चैनल के लिये पंद्रह साल से भोपाल में विशेष संवाददाता। इस दौरान रोजमर्रा की खबरों के अलावा एमपी यूपी उत्तराखंड गुजरात और महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की रिपार्टिंग कर इन प्रदेशों के चुनावी रंग देखे और जाना कि चुनावी रिपोर्टिग नहीं आसान एक आग का दरिया सा है जिसमें डूब के जाना है। चुनावी रिपोर्टिंग में डूबते उतराने के दौरान मिले अनुभवों के आधार पर अखबारों में लिखे गये लेख, आंकडों और किस्सों के आधार पर किताब चुनाव राजनीति और रिपोर्टिंग मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव २०१३ लिखी है जिसमें देश के पहले आम चुनाव की रोचक जानकारियां भी है।

लेखक टीवी में प्रवेश के पहले दिल्ली और भोपाल के अखबारों में उप संपादक और रिपोर्टर रहे। जैसा कि होता है इस लंबे अंतराल में कुछ इनाम इकराम भी हिस्से आये जिनमें मुंबई प्रेस क्लब का रेड इंक अवार्ड, दिल्ली का मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड, देहरादून का यूथ आइकान अवार्ड, मध्यप्रदेश राष्टभाषा प्रचार समिति भोपाल का पत्रकारिता सम्मान, माधवराव सप्रे संग्रहालय का झाबरमल्ल शर्मा अवार्ड और शिवना सम्मान।

पढाई लिखाई एमपी के नरसिंहपुर जिले के करेली कस्बे के सरकारी स्कूल से करने के बाद सागर की डॉ हरिसिंह गौर विश्वविदयालय से बीएससी, एम ए, पत्रकारिता स्नातक और स्नातकोत्तर करने के बाद भोपाल की माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता विश्वविघालय से पीएचडी भी कर रखी है।