Monday, April 22, 2019
अब जमीन पर आ जाओ प्यारे

अब जमीन पर आ जाओ प्यारे

हां तो हो गई ना वोटिंग। अंगुली पर नीले निशाने वाले फोटो डाल दिए फेसबुक पर। बता दिया ना कि कितने जिम्मेदार नागरिक हो। वाट्सएप के फैमिली ग्रुप में भी फोटो दौड़ा दिए ना। फिर क्या बाकी रह गया है, जो अब भी आंखें टिमटिमा रहे हो। हुजूर चार दिन की चांदनी खत्म हुई। जिस बादशाहत के पट्टे लिखने के वादे किए जा रहे थे, वह अंगुली नीली होते ही खत्म हो चुकी है। अब तो जमीन पर आ जाओ। 

क्या लगता है, वो जो गली-गली भोंगा बज रहा था, वह अब भी बजेगा। जो लोग सुबह-शाम तुम्हारे आगे-पीछे घूम रहे थे, वे अब भी नजर आएंगे। वो सभाएं, मन की बातें, परेशानियों का जिक्र। जात-समाज को आगे बढ़ाने की घोषणाएं सब वैसे ही होती रहेंगी। सुना है इस बार तो और भी बहुत कुछ हुआ है। पहले सर्वे कराया गया, तुम्हारे आसपास की सारी अच्छी-बुरी बातें पता की गईं। जरूरतें खंगाली गईं, फिर उनके आधार पर ही पूरा एजेंडा बनाया गया। प्रचार की रणनीति तय की गई। कितना खास लग रहा होगा ना। फुल कर कुप्पा ही हो गए होंगे कि कोई कितनी तवज्जो दे रहा है। सडक़ पर कदम पड़ रहे थे या हवा में ही उछलते रहे हो। 

फिर जब वे गली से गुजरे होंगे तो एक हार तुम्हारे हाथ में भी डाल दिया गया होगा। हार पहनाने के लिए बढ़ाया होगा तो वह पलटाकर उन्होंने तुम्हारे गले में ही डाल दिया होगा। तब कितना विशिष्ट अनुभव कर रहे होंगे ना तुम अपने आप को। फिर जब सभाओं में तालियां बज रही होंगी तो तुम जरूर हिसाब लगा रहे होंगे कि इतने लोगों को बात पसंद आ रही है, यानी बात में दम है। शहर यही चाहता है, तभी तो इतना समर्थन दे रहा है। झंडे, बैनर, पोस्टर, पेम्फ्लेट में लिखी बातें तुम्हारे जेहन में गूंज रही होंगी। क्या-क्या नहीं लिखा गया उनमें तुम्हारे लिए। 

ऐसा नहीं लगा कभी कि जैसे इधर, तुम ईवीएम का बटन दबाओगे और उधर, राम राज आ जाएगा। बटन दबाते ही फिल्मों की तरह तेज हवाएं चलने लगेंगी। धूल का गुबार उठेगा। बिजली कडक़ने लगेगी। मतदान केंद्र में लगे बल्ब और ट्यूबलाइट बंद-चालू होने लगेंगे। पास के मंदिर के सारे घंटे-घडिय़ाल बिना बजाए बजने लगेंगे। और अचानक से सबकुछ बदल जाएगा। मतदान केंद्र के कर्मचारी धर्मराज के सहचरों की तरह दिखाई देने लगेंगे। वे अच्छे और बुरे का हिसाब करेंगे और देखते ही देखते पूरा आलम बदल जाएगा। जैसे वनवास गए राम लौट आएंगे, भरत खड़ाऊ उतारकर उन्हें सिंहासन सौंप देंगे। 

लेकिन ऐसा हुआ नहीं ना, हुआ तो यह कि जैसे ही तुम वोट देकर निकले होंगे, कुछ कैमरे वालों ने घेर लिया होगा। तुम्हारी उम्र, जाति, काम पूछा होगा। धीरे से यह भी कि किसे वोट दिया है। जानते ही हो ना तुम्हारी इसी हां ना से उनका एक दिन का रोजगार चल जाएगा। वे चीख-चीख कर बताएंगे कि इस बार कौन आने वाला है। किसकी संभावना ज्यादा है, कौन सा मुद्दा सबसे अधिक असरदार रहा है। 

शाम को घर लौटते वक्त तुम्हे ऐसा नहीं लगा जैसे तुम कोई गन्ने हो, जिसे पांच साल रसभरने के लिए छोड़ दिया जाता है। जैसे रस भरता है वैसे ही चरखी में झोंक दिया जाता है। उगाने वाले से लेकर काटने वाला, बाजार तक पहुुचाने वाला और चरखी चलाने वाला तक तुम्हारे भीतर से अपना हिस्सा निकालते हैं। चरखी वाला तब तक तुम्हे घूमा-घूमा कर मशीन में घुसाता रहता है, जब तक कि तुम्हारे भीतर रस की एक बूंद भी बाकी है। और जब कुछ बाकी नहीं रहता तो तुम्हे मवेशियों के आगे डाल दिया जाएगा। अब वे मवेशी तुम्हे चरते रहेंगे और सही समझे गोबर करते रहेंगे। 

गुबार निकल गया। तुम्हारे हिस्से का लोकतंत्र तुमने निभा दिया। न इससे अधिक तुम्हारे बूते में है और न ही इससे ज्यादा की तुम्हे उम्मीद ही करना चाहिए। वोट डालो और आगे बढ़ो। समझ सकता हूं दुख होता है कि तुम्हारे वोट से बनी सरकार ही बाद में तुम्हारा कल्याण करेगी और तुम छटपटाते रह जाओगे। लोग कहते हैं चाय-पान के ठेले पर बहस करने वाले हजार मिल जाते हैं, लेकिन उनसे पूछो कि वह भी न करें तो क्या करें। लोकतंत्र ने इतनी आजादी तो बख्शी है कम से कम।

इसलिए बेहतर है जमीन पर आ जाओ। आ जाओ और फिर अगले चुनाव तक बहस करो। 

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अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.