Monday, October 14, 2019
काला धन खत्म यों होगा*

काला धन खत्म यों होगा*

मीडियावाला.इन।

स्विटजरलैंड ने भारत सरकार को उन सब खातों की जानकारी सौंप दी है, जो भारतीयों ने उसके बैंकों में खोल रखे हैं। ऐसा नहीं है कि वे सभी खाते काले धन के होंगे या आतंकी धन या ठगी-धन के होंगे लेकिन विदेशों में खुलनेवाले भारतीय नागरिकों के खातों के जरिए अक्सर भारी हेरा-फेरी की जाती है। इस तरह के खाते स्विटजरलैंड के अलावा सिंगापुर, मोरीशस और करेबियाई क्षेत्र के छोटे-मोटे देशों में खोल दिए जाते हैं। भारत के लोग अपने कालेधन की रक्षा के लिए भारत की नागरिकता तक छोड़ देते हैं और ऐसे देशों की नागरिकता पैसे देकर खरीद लेते हैं, जिनकी हैसियत भारत के किसी जिले के बराबर भी नहीं है। विदेशों में छिपाया धन सिर्फ वही नहीं होता, जो बाकायदा कमाया हुआ होता है बल्कि वह भी होता है, जो रिश्वत, ब्लेकमेल, आतंक, डकैती, चोरी आदि कुकर्मों से जमा किया जाता है। ऐसा धन जमा करनेवालों में कौन नहीं हैं ? उद्योगपति और व्यापारी तो हैं ही, हमारे नेता हैं, उनके नौकरशाह हैं, आतंकवादी हैं, डाॅक्टर हैं, वकील हैं। भारत सरकार ने 2016 में जबसे स्विस सरकार से इन लोगों के खातों की जानकारी के आदान-प्रदान का समझौता किया है, उन लोगों ने जिनीवा में अपने खाते बंद करने शुरु कर दिए हैं या वहां से अपना धन निकालकर कहीं और छिपाना शुरु कर दिया है। उसका नतीजा यह हुआ है कि अब स्विस बैंकों में भारतीयों के खातों में सिर्फ 6757 करोड़ रु. की राशि रहने का अनुमान है। यह राशि तो ऊंट के मुंह में जीरा भी नहीं है। माना कि यह सारी की सारी राशि सरकार ने जब्त कर ली तो वह कौनसा किला फतह कर लेगी ? जो सरकार रिजर्व बैंक से पौने दो लाख करोड़ रु. उधार ले रही है, उसे ‘काले धन’ की यह राशि कितना टेका लगा सकेगी ? नोटबंदी के वक्त कितना काला धन पकड़ा गया? लोगों ने सरकार को पटकनी मार दी। तू डाल-डाल तो मैं पात-पात ! नोटबंदी के बाद काला धन बनने की रफ्तार तेज हुई है। दो हजार के नोटों और नकली नोटों ने नोटबंदी की कमर झुका दी है। बेहतर तो यह हो कि सरकार आयकर को ही खत्म कर दे और सिर्फ व्यय-कर लगाए। यदि खर्चे पर टैक्स लगेगा तो बचत बढ़ेगी और आय पर टैक्स नहीं लगेगा तो टैक्स-चोरी नहीं होगी। क्या भारत सरकार इतना क्रांतिकारी कदम उठा सकती है ? ऐसा कदम उठाने के पहले सरकार को अपने जी-हुजूर और विरोधी, दोनों अर्थशास्त्रियों से जमकर बात करनी चाहिए। यदि भारत सरकार ऐसी हिम्मत करेगी और उसे सफलता मिलेगी तो हमारे पड़ौसी देश भी खुशी-खुशी वैसा ही करना चाहेंगे।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

  • डॉ॰ वेद प्रताप वैदिक (जन्म: 30 दिसम्बर 1944, इंदौर, मध्य प्रदेश) भारतवर्ष के वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, पटु वक्ता एवं हिन्दी प्रेमी हैं। हिन्दी को भारत और विश्व मंच पर स्थापित करने की दिशा में सदा प्रयत्नशील रहते हैं। भाषा के सवाल पर स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी और डॉ॰ राममनोहर लोहिया की परम्परा को आगे बढ़ाने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है।
  • वैदिक जी अनेक भारतीय व विदेशी शोध-संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ रहे हैं। भारतीय विदेश नीति के चिन्तन और संचालन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय है। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने लगभग 80 देशों की यात्रायें की हैं।
  • अंग्रेजी पत्रकारिता के मुकाबले हिन्दी में बेहतर पत्रकारिता का युग आरम्भ करने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है। उन्होंने सन् 1958 से ही पत्रकारिता प्रारम्भ कर दी थी। नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक, बाद में विचार विभाग के सम्पादक भी रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। सम्प्रति भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।