Monday, April 22, 2019
चुनावी बॉण्ड: यह नरमी क्यों?

चुनावी बॉण्ड: यह नरमी क्यों?

मीडियावाला.इन

सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार और भाजपा को अब एक और झटका दे दिया है। उसने कहा है कि सभी राजनीतिक दल 15 मई तक मिलनेवाले सभी चुनावी बांडों का ब्यौरा चुनाव आयोग को 30 मई तक सौंप दें। ब्यौरा सौंपने का अर्थ यह हुआ कि किस पार्टी को किसने कितना चंदा दिया, यह चुनाव आयोग को बता दिया जाए। दूसरे शब्दों में चुनावी बांडों के जरिए मोदी सरकार ने काले धन को सफेद करने की जो कमाल की तरकीब निकाली थी, उसे अदालत ने पंचर कर दिया है। बांडों का सबसे तगड़ा प्रावधान यह था कि इन बांडों को बैंको से खरीदकर पार्टियों को देनेवालों का न तो नाम किसी को पता चलेगा और न ही राशि ! 20-20 हजार के कितने ही बांड खरीदकर आप किसी ही पार्टी के खाते में जमा कर दीजिए। आपसे कोई यह नहीं पूछेगा कि यह पैसा आप कहां से लाए ? यह काला है या सफेद ? यह देशी हैं या विदेशी ? यह कौनसी दलाली का पैसा है ? बोफोर्स का है, अगस्ता वेस्टलैंड का है या रफाल का है ? 2017 में लगाई गई इस तिकड़म का फायदा भाजपा और कांग्रेस ने पिछले दिनों हुए राज्यों के चुनाव में जमकर उठाया लेकिन कांग्रेस बहुत पिछड़ गई। 2017 में लगभग 220 करोड़ रु. के बांड खरीदे गए, जिनमें से 215 करोड़ पर भाजपा ने हाथ साफ किया और कांग्रेस के पल्ले सिर्फ 5 करोड़ रु. के बांड पड़े। अब तक 2000 करोड़ रु. के बांड खरीदे गए जिनमें से लगभग 95 प्रतिशत भाजपा ने बंटोरे हैं। कांग्रेस ने फिर भी इन बांडों का विरोध नहीं किया। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा सभी पार्टियां इस गाय को दुहने में लगी हुई हैं। माकपा और एक अन्य संस्था ने याचिका लगाकर भ्रष्टाचार के इस नए पैंतरे का विरोध किया है। ये बांड जब जारी हुए, तब ही मैंने इनका विरोध किया था। मुझे अफसोस है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इसके फैसले में इतनी देर क्यों लगाई ? इस मामले में दो-टूक सख्ती क्यों नहीं बरती ? अभी तक खरीदे गए बांडों की कलई आज ही क्यों नहीं खुलवाई गई ? यह ठीक है कि नाम उजागर होने के डर से अब इन बांडों को कौन खरीदेगा ? मैंने 4 जुलाई 2017 को ही लिखा था कि ‘चुनावी बांड जारी करना भ्रष्टाचार की जड़ों को सींचना होगा।’ यही बात मुख्य चुनाव आयुक्त ने उन्हीं दिनों कुछ नरम शब्दों में कही थी लेकिन यह सभी पार्टियों की मजबूरी है। वे क्या करें ? दुनिया का सबसे खर्चीला चुनाव भारत में होता है। यह चुनाव ही सारे भ्रष्टाचार की गंगोत्री है। इस गंगोत्री में डुबकी लगाए बिना भारत में कोई नेता कैसे बन सकता है ? चुनावों का खर्च कम से कम हो, चुनाव-पद्धति को बदला जाए और भारत की राजनीति को भ्रष्टाचार-मुक्त कैसे किया जाए, इस बारे में मेरे दिमाग में कई सुझाव हैं लेकिन उसकी चर्चा कभी बाद में करेंगे।

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

  • डॉ॰ वेद प्रताप वैदिक (जन्म: 30 दिसम्बर 1944, इंदौर, मध्य प्रदेश) भारतवर्ष के वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, पटु वक्ता एवं हिन्दी प्रेमी हैं। हिन्दी को भारत और विश्व मंच पर स्थापित करने की दिशा में सदा प्रयत्नशील रहते हैं। भाषा के सवाल पर स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी और डॉ॰ राममनोहर लोहिया की परम्परा को आगे बढ़ाने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है।
  • वैदिक जी अनेक भारतीय व विदेशी शोध-संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ रहे हैं। भारतीय विदेश नीति के चिन्तन और संचालन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय है। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने लगभग 80 देशों की यात्रायें की हैं।
  • अंग्रेजी पत्रकारिता के मुकाबले हिन्दी में बेहतर पत्रकारिता का युग आरम्भ करने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है। उन्होंने सन् 1958 से ही पत्रकारिता प्रारम्भ कर दी थी। नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक, बाद में विचार विभाग के सम्पादक भी रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। सम्प्रति भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।