Monday, March 25, 2019
मिल मर गयी ,महल ज़िंदा है

मिल मर गयी ,महल ज़िंदा है

मध्य प्रदेश की राजनीति में आजादी से लेकर बीस साल पहले तक 'मिल' और 'महल' का दखल चला करता था .समय की मार मिलों को निगल गयी लेकिन मौन का वजूद आज भी जस का तस है .अब भी अलग-अलग हिस्सों में मौजूद छोटे-बड़े महल सूबे की सियासत की दशा और दिशा तय करते हैं,इस लोकसभा चुनाव में महल जहाँ-तहाँ अलग-अलग भूमिका में खड़े नजर आएंगे .

मध्यप्रदेश के ग्वालियर-चंबल और मालवा अंचल में एक ज़माना था जब कपड़ा मिलों का राजनीति में सीधा दखल था,चूंकि उस समय कोई मजबूत राजनितिक विपक्ष नहीं था इसलिए सत्तारूढ़ कांग्रेस हरदम इन मिलों की मुठ्ठी में रहती थी बीसवीं सदी के अंत तक पूरे देश में कपड़ा उद्योग का समापन हुआ तो मध्यप्रदेश की कपड़ा मिलों ने भी दम तोड़ना शुरू कर दिया और आज सियासत में इन मिलों का कोई दखल बाक़ी नहीं रह गया है. सूबे की सियासत को प्रभावित करने वाली दूसरी ताकत के रूप में महल थे.इन महलों का अपने-अपने इलाके में खासा वजूद था.महाराजा ही नहीं छोटे-छोटे राजा तक आसपास की राजनीति और चुनावी नतीजों को प्रभावित करते थे .

ग्वालियर-चंबल के सिंधिया घराने का असर विदिशा,उज्जैन से लेकर नीमच तक था,मालवा में होल्कर थे ,बुंदेलखंड में तो कदम-कदम पर राजा थे ही,बघेलखण्ड में भी अनेक छोटे बड़े महल राजनीति को प्रभावित करने का माद्दा रखते थे .और अनेक महलों ने तो सत्ता में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया .ग्वालियर का महल इनमें आज तक अपना वजूद बनाये हुए है ,,हालांकि दूसरे महलों का असर अब धीरे-धीरे काम हो रहा है .

आजादी के फौरन बाद और मध्यप्रदेश का गठन होने से लेकर 1980 तक इन महलों ने प्रदेश की राजनीति में सीधा दखल रखा और जो चाहा सो किया. विधानसभा और लोकसभा के प्रत्याशियों का चयन इन महलों की सहमति के बिना शायद ही कभी हुए हों .महल जिस राजनीतिक दल के सर पर हाथ रख देते थे उसका सत्तारूढ़ होना आसान हो जाता था .महलों का रूठना राजनितिक दलों के लिए आफत जैसा था. पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र ने महलों को नाराजगी का खामियाजा खूब भुगता था .

लोकचेतना और कानूनों में लगातार संशोधनों के बाद महलों का प्रभाव क्षेत्र लगातार सिकुड़ता गया फिर भी समाप्त नहीं हुआ .मौजूदा परिदृश्य में भी महल हर दल की सियासत के लिए महत्वपूर्ण हैं. लोकतांत्रिक होने का दम्भ पालने वाले सभी राजनितिक दल भले ही सामंतवाद का विरोध करते हों किन्तु किसी का भी काम इनके बिना नहीं चलता .कांग्रेस हो या भाजपा सभी को महल का आसरा चाहिए .पिछले साल यानि तीन माह पूर्व हुए विधानसभा चुनाव में तो ग्वालियर के महल का चेहरा ही सबसे आगे था ,और माना जाता है की सूबे में कांग्रेस की सरकार बनवाने में ग्वालियर के महल की भूमिका प्रमुख रही .

अब मई में होने वाले लोकसभा चुनाव में महलों का प्रतिनिधित्व करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया,दिग्विजय सिंह और अजय सिंह के अलावा अनेक छोटे-बड़े राजा कस-बल लगा रहे हैं ताकि नतीजे प्रभावित कर सकें. भाजपा को भी इन्हीं राजघरानों का सहारा है ,लेकिन दुर्भाग्य से भाजपा के पास महल का कोई नामचीन्ह चेहरा नहीं है .सिंधिया और दिग्विजय सिंह तो सीधे चुनावी समर में उतरते ही आये हैं .दिग्विजय सिंह की लम्बे समय बाद वापसी होने की उम्मीद है ,लेकिन उन्होंने अपने परिवार के दो सदस्यों को सियासत में स्थापित कर ही दिया है .

प्रदेश की सियासत को मिलों से मुक्ति के बाद महलों से मुक्ति दिलाने के बारे में न कोई सोचता है और न साहस करता है,क्योंकि सब जानते हैं की अब मिलों में सियासत को प्रभावित करने की ताकत नहीं रही .मिलें न अब अपने प्रत्याशी मैदान में उतारतीं है और न ही किसी विशेष राजनितिक दल के साथ खड़ी होती हैं,उनके लिए तो सत्तारूढ़ दल ही महत्वपूर्ण होते हैं,जो सत्ता में होता है मिलों का सलाम उनके लिए होता है .वैसे आप चाहें तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ को ही मिलों का प्रतिनिधि मान सकते हैं लेकिन वे हैं नहीं 

मुझे लगता है की मिलों के खात्मे के बाद महल भी समाप्त हो गए होते तो सूबे की सियासत का चेहरा शायद अधिक निखर जाता लेकिन ऐसा हुआ नहीं और हो भी नहीं सकता ,अब महल ही हैं जो इस सूबे की सियासत को देश की मुख्यधारा से जोड़े रख सकते हैं ,क्योंकि आम आदमी का प्रतिनिधित्व कर चुके प्रदेश के आधा दर्जन मंत्री केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहकर भी सूबे की पहचान नहीं बन पाए .उनके नाम से सूबे को पहचान नहीं मिली.ये हालांकि दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन है तो है .
 

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राकेश अचल

राकेश अचल ग्वालियर - चंबल क्षेत्र के वरिष्ठ और जाने माने पत्रकार है। वर्तमान वे फ्री लांस पत्रकार है। वे आज तक के ग्वालियर के रिपोर्टर रहे है।