Monday, March 25, 2019
यहां व्यक्ति विशेष को नहीं बल्कि पूरे यूनिट को अतुल्य दक्षता,वीरता,साहस और कर्मण्यता की वजह से पुरस्कृत किया जाता है

यहां व्यक्ति विशेष को नहीं बल्कि पूरे यूनिट को अतुल्य दक्षता,वीरता,साहस और कर्मण्यता की वजह से पुरस्कृत किया जाता है

उधमपुर आए कोई 3 महीने हुए थे| अपार नैसर्गिक सौंदर्य, मां वैष्णो देवी के सानिध्य में एक अद्भुत शांति और आध्यात्मिक आनंद का अनुभव और कुछ पुराने- नए मित्रों से मेल-मिलाप में कुछ ऐसा सहज और अनुकूल वातावरण रहा कि यहां से जुड़े कुछ ऐसे मुद्दे जो महत्वपूर्ण तो थे पर शायद इतने सुंदर नहीं थे ,इन पर ध्यान नहीं गया| रेडअलर्ट, ऑरेंज अलर्ट या ऑरेंज प्लस अलर्ट जैसी टर्म्स कानों में पइती रही, हथियारों से लैस फौजी की अनिवार्य उपस्थिति में अपने रोजमर्रा के कामों के लिए आना जाना भी होता रहा… फिर जैसे यह सब भी दिनचर्या का हिस्सा बनते गए|

इस बीच पिछले हफ्ते उत्तरी कमान-अलंकरण समारोह में भाग लेने का अवसर मिला| उत्तरी कमान (लेह,कश्मीर,जम्मू) के कुछ चुनिंदा अफसरों और जवानों को उनके उत्कृष्ट कार्यो के लिए पुरस्कृत किया जाना था| भीषण सर्दी के बीच खराब मौसम की चेतावनी और सुबह से ही लगातार होती बारिश में कोई बहुत लुभावना माहौल नहीं था| पति की सेरीमोनियल वर्दी की अग्रिम तैयारी, सही औपचारिक परिधान में समय पर सुबह सुबह पहुंचने की चिंता और ठिठूरन की उलझन में अनमनि सी निर्धारित स्थान पर पहुंची| यहां भव्य ऑडिटोरियम में सुसज्जित मंच और बड़ी तादाद में मेडलौं से सजे फौजी और उनके परिवारजनों को देखकर अब स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगी थी| उत्तरी कमान के सर्वोच्च अधिकारी आर्मी कमांडर आज के मुख्य अतिथि थे|उनके आने से पहले कुछ जरूरी निर्देश देने के बाद मंच के आस पास लगे स्क्रिन्स पर फौज से संबंधित कुछ प्रेरणादायक फिल्में दिखाई जाने लगी|

यह वह फिल्में थी जो सियाचिन ,लाइन ऑफ कंट्रोल पर तैनात फौजियों के कठिन जीवन, उनके योगदान, बलिदान और आतंकवादियों के खिलाफ चल रहे‚ अवरित अघोषित युद्ध की झलकियों पर आधारित थी| जोश से भरी कवायद धूनों ने पूरा ध्यान जैसे वहीं पर केंद्रित कर दिया| सहसा साथ की पंक्ति में एक बहुत ही कम उम्र की महिला को विधवा के लिबास में देखा तो जैसे एक सिहरन सी शरीर में दौड़ गई| सब कुछ एक दूसरे से जूङने सा लगा| मुख्य अतिथि के आगमन के बाद पदकों का अलंकरण शुरू हुआ| सबसे पहले उस महान शहीद को पुरस्कृत किया गया जिसे गणतंत्र दिवस पर देश अशोकचक्र से नवाज चुका था| लांस नायक नाजीर अहमद वानी को मरणोपरांत अब उत्तरी कमान की ओर से सेना मेडल दिया गया,जो उनकि विधवा पत्नी ने ग्रहण किया|

सेना में रहकर जिस अदम्य साहस का परिचय देते हुए इनहोनें आतंकवादियों का सफाया किया ,सेना में भर्ती होने के पहले वे खुद भी एक आतंकवादी थे |दिल्ली में और अब उधमपुर में हजारों तालियों की गड़गड़ाहट के बीच जो श्रीमती वानी और उनकी माताजी मेडल के साथ सर उठाकर चल रही थी, वो कश्मीर के किसी गुमनाम गांव के कोने मैं छुपकर अपने आतंकवादी पति/बच्चे की मौत का मातम मना रही होती| हृदय परिवर्तन का कितना बड़ा पुरस्कार देकर गए वानी! फौज की परंपरांए हमारे जीवन मूल्यों से इस तरह जुड़ी हुई है कि बहुत कुछ सीखने को मिलताहै|

दिल्ली में जब देश ने उन्हें सम्मानित कर ही दिया था फिर भी जैसे अपने उत्तरी कमान परिवार में वापस पहुंचकर परिवारजनों के बीच फिर उन्हीं भावनाओं को जीने का मौका मिला|एक के बाद एक फौज के जांबाज अधिकारी और जवान मंच पर आते जा रहे थे और उनके साहसिकसक कार्यों के बारे में बताया जा रहा था| भारत के विभिन्न प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते हुए ,विभिन्न धर्मों से संबंधित ये लोग यहां ये एक ही बैनर से जुड़े थे – कर्तव्यपरायणता साहस और निस्वार्थ देश प्रेम| सेना मेडल अगर एक अधिकारी को दिया जा रहा था तो वहीं मेडल एक जवान के भी सीने पर सज रहा था| आखिर संकट के समय तो कंधे से कंधा मिलाकर ही दोनों ने मातृभूमि की रक्षा की थी| वीरता की कहानियों में किसी ने अपने साथी को बचाते हुए प्राणों की आहुति दी थी, तो किसी ने अपने सीनियर को| किसी ने अपने व्यक्तिगत वाहन से आतंकी का पीछा किया था तो किसी ने बाथरूम की खिड़की से लक्षित ग्रह में घुसकर आतंकवादियों को मारा था| कोई छड़ी का सहारा लेकर मंच पर चढ़ा तो किसी ने अपने बाएं हाथ से सैल्यूट किया |  एक बहादुर जवान को तो आतंकवादी को मारने के अलावा आतंकवादी के शव को बहती हुई नदी से पुनःसुरक्षित लेकर आने के लिए पुरस्कृत किया गया| आखिर कैसे यह वीर देश ,इंसानियत, संवेदनशीलता और जीवन मूल्यों की रक्षा करते हुए अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं? मै ये सोचने पर बाध्य हूं कि आखिर इन्हें फौज ने किस तरह तैयार कियाहै ? क्या कारण है की फौज की प्रशिक्षण प्रणाली अपने वांछित लक्ष्यों को पूर्णत: सफलता पूर्वक प्राप्त करने में सक्षम है| जैसे कि कहा जाता है कि युद्ध में उपविजेता नहीं होता| या तो विजेता या फिर शहीद|

वर्दी पहने हुए फौजियों को निहारने लगती की साथ के स्क्रीन पर शहीद हुए फौजियों में से किसी की तस्वीर आ जाती और मंच पर कभी एक 20- 22 साल की राजस्थानी पोशाक में मासूम सी बच्ची दिखाई देती, वो कभी आंसू में चेहरा छुपाए 50-55 वर्ष की मां| दक्षिण भारतीय ठंड में ठिठुरते तरुणी विधवा को देख कर तो मुझे लगा कि यह शायद ही कभी अपने जन्म स्थान,प्रांत को छोड़कर बाहर जा पाई होगी| पति सीमा पर तैनात रहते हुए शहीद हुआ था| बहादुरी का पदक लेने दक्षिण से उत्तर का सफर तय करना पड़ा| उसे मंच पर पहुंचाने के लिए एक युवा फौजी साथ में था, जो उसका हम भाषी प्रतीत हो रहा था| फौज में अलग-अलग भाषाओं को जानने की क्षमता का इस तरह से लाभ उठाया जाता है|

अब मंच पर यूनिट साइटेशन का क्रम शुरू हो गया था| यहां व्यक्ति विशेष को नहीं बल्कि पूरे यूनिट को अतुल्यदक्षता, वीरता, ,साहस और कर्मणयता की वजह से पुरस्कृत किया जाता है| यहां पुरस्कार लेने यूनिट के कमांडिंग ऑफिसर और सूबेदार मेजर एक साथ कदम से कदम मिलाकर मार्च करते हुए मंच पर जा रहे थे| मुझे लगा जैसे यूनिट एक परिवारहै और पूरे परिवार की तरफ से उनके मुखिया और बुजुर्ग को पुरस्कार ग्रहण करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है|

कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि महोदय ने उत्तरी कमान की कठिन चुनौतियों के बारे में बताया और किस तरह फौज और दूसरे संगठन मिलकर स्थिति को नियंत्रण कर रहे हैं, इसकी जानकारी दी| राष्ट्रगान के लिए गर्व से भरी हुई जब खड़ी हुई तो भावनाओं और विचारों का जैसे उफान आ रहा था| कार्यक्रम के बाद बाहर एक टी-पार्टि का आयोजन किया गया था|

बारिश ने सारी व्यवस्था हिला दी थी, इसके बावजूद सब कुछ सुसज्जित कर दिया गया था और पूर्व निर्धारित योजनाओं के तहत सुनियोजित तरीके से संपन्न किया जा रहा था| शायद विकल्पों का प्रावधान ना होना भी उत्कृष्टता की ओर ले जाता है |रंग-बिरंगे तंबू में अलग-अलग प्रकार के लोग जमा थे| आर्मी कमांडर की पत्नी अलग से वीर नारियों और पुरस्कृत फौजियों के परिवारजनों से मिलकर उन्हें टोकन स्वरूप उपहार दे रही थी| सभी लोग उत्साहपूर्वक पदक विजेताओं के साथ फोटो खिंचवा रहे थे, बधाई दे रहे थे| ऐसे सौहाद्पूर्ण वातावरण में मैं अपने आपको सौभाग्यशाली मानते हुए ईश्वर को धन्यवाद दे रही थी, कि मुझे ऐसे जीवन साथी का साथ मिला जो इस महान संगठन को जानने समझने का अवसर मिला| फिर भी कहीं ना कहीं एक प्रश्न था कि हाल के अंदर जिस गहराई से मैं भावनाओं को महसूस कर पा रही थी व अब कहीं खो तो नहीं गई?शायद इसी का नाम जीवनहै|
                                


 

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