Wednesday, November 14, 2018
अब कैसे कहेंगे शो मस्ट गो ऑन

अब कैसे कहेंगे शो मस्ट गो ऑन

मीडियावाला.इन।  पीढिय़ों के बीच न जाने ये कैसा अंतरद्वंद्व है, जो खत्म होने का नाम नहीं लेता। पुरखों से बड़ी लकीर खींचने की जद्दोजहद पता नहीं कब तक हमें अपनी विरासतों से महरूम करती रहेगी। कोई वजह नजर नहीं आती कि क्यों अक्सर हमारे कांधे बुजुर्गों की थाती संभालने में कमजोर पड़ जाते हैं। क्यों हम धरोहर को भी हानि-लाभ के चश्मे से देखने लग जाते हैं? सवाल सिर्फ आरके स्टूडियो का नहीं, उन तमाम यादों का है, जो उस एक नाम में घुली हुई है। जब स्टूडियो का ही पर्दा गिर जाएगा तो कैसे कहेंगे शो मस्ट गो ऑन।

देश की आजादी के ठीक एक साल बाद 1948 में बना आरके स्टूडियो देश के स्वर्णिम सिनेमा इतिहास की जीती-जागती तस्वीर है। जिसका हर कोना यादों की संदूक की तरह है। झरोखे से आती हवाएं अपने साथ अनगिनत किस्से लेकर आती है। अहाते के इंच-इंच में न जाने कितनी कहानियां, किरदार अब भी अंगडाई लेते दिखाई देते हैं। स्टूडियो को बेचने की तैयारियों की खबर से स्टूडियो की दूसरी और पहली हिट फिल्म बरसात का वह दृश्य कितने गम में डूबा होगा, जो करीब 70 साल से आरके फिल्म्स का लोगो बना हुआ है। राज कपूर हाथ में वायलिन लिए हुए हैं और नरगिस उनके जिस्म से आधी सटी और आधी झुकी हुई हैं।

राज और नरगिस के उस प्रेम को उन दीवारों से कैसे अलग किया जाएगा। जिसके लिए राज खुद कहते थे कि कृष्णा मेरे बच्चों की मां है और तुम मेरी फिल्मों की। राज कपूर को पूरी दुनिया में शो मैन का तमगा दिलाने वाली उन तमाम फिल्मों में आरके स्टूडियो भी तो उतनी ही शिद्दत से शामिल था। क्या बारिश में रोमांस का आईकॉन बने प्यार हुआ इकरार हुआ गीत से आरके स्टूडियो को कभी दूर कर पाएंगे। एक काली छतरी के नीचे राज और नरगिस को यूं भीगते देख अब भी किस की आह न निकलती होगी।

दरअसल वे सिर्फ फिल्में नहीं थी, वे उस वक्त का जीता-जागता दस्तावेज थीं। किसी में अनाथ आश्रम से आया सीधा-सादा युवक ईमानदारी का तमगा बेचकर दुनियादारी सीखने की होड़ करता नजर आता था तो किसी में माता-पिता के रिश्तों की कड़वाहट से कसमसाता बचपन दिखाई देता था। सपनों और हकीकत की दुनिया का अंतर बताती, वे फिल्में आजादी की नई हवा में अंगडाई लेते भारतीय युवाओं के अहसासों की कहानी थीं। सामाजिक विद्रुपताओं और अमीर-गरीब की खाइयों पर कटाक्ष करतीं, महोब्बत का संदेश देती उन फिल्मों का सबसे बड़ा गवाह वही तो है।

कितने नाम याद रखेंगे। मेरा नाम जोकर, बूट पॉलिश, आवारा, श्री 420, बॉबी, जिस देश में गंगा बहती है, कर्ज, सत्यम शिवम सुंदरम, राम तेरी गंगा मैली हो गई से लेकर प्रेम ग्रंथ तक। हर कहानी को आरके स्टूडियो में आकर ही तो ठौर मिला था। फिल्में ही क्यों, वहां के उत्सव भी तो भारतीय सिनेमा इतिहास की अनूठी थाती हैं। हर बरस होली की पार्टी फिल्मी दुनिया का अलग रंग दिखाती थी, मायापुरी में जिसके फोटो देखने के लिए लोग बेसब्र होते थे।

एक और बात कि वहां सिर्फ फिल्में नहीं बनी, स्नेह के कितने रिश्तों ने भी आकार लिया। दोस्ती हुई, पे्रम हुआ, कोई किसी की जिंदगी का हमसफर हुआ। कई रिश्ते टूटे और बिखरे भी। स्टूडियो के भीतर कई सपने पूरे हुए तो अनगिनत सपने उसके गेट पर दम भी तोड़ गए। अच्छी बात यह है कि स्टूडियो में आरके बैनर की तमाम फिल्मों के कास्ट्यूम, प्रॉप आदि भी सहेज कर रखे हैं। यहां तक कि उसकी दीवारों पर ढेर सारे चित्र भी इतिहास का झरोखा बने हुए हैं।

हालांकि 16 सितंबर 2017 को एक रियलिटी शो की शूटिंग के दौरान लगी भीषण आग में बहुत कुछ खाक हो गया, उसके बाद से ही स्टूडियो का भविष्य अनिश्चितताओं से घिर गया था। हालांकि उस वक्त ऋषि कपूर ने इसे आधुनिक बनाने की बात कही थी, लेकिन अब वे ही कह रहे हैं कि ऐसा कर पाना आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं होगा। यादों पर व्यापारिक सोच-समझ की यह जीत सच में दिल तोडऩे वाली है।

राजकपूर खुद कहते थे स्टूडियो महत्वपूर्ण नहीं है, वहां लोगों ने क्या बनाया यह महत्वपूर्ण है। बाकी तो सब ईंट, ग्रेनाइट और सीमेंट है। उस विरासत को बढ़ते न देख पाने का मलाल तो लंबे समय से भारतीय दर्शकों को है, अब उसका पर्दा गिरने का अफसोस भी सहना ही होगा। 

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अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.