Monday, October 22, 2018
गुजर गई खुली आंखों से झूठ देखने की झिलमिल रात 

गुजर गई खुली आंखों से झूठ देखने की झिलमिल रात 

सरकारों ने इंट्रेस्ट ही नहीं दिखाया कि कपड़ा मिलें चालू रहें

साल में एक दिन इंदौर में हजारों परिवार खुली आंखों से झूठ देखते हैं और आसपास से भी लोग इस झिलमिल करती रात के झूठ में सहभागी बनते हैं। कभी कपड़ा मिलें इस शहर की पहचान थी, चिमनियों का धुंआ अब आसमान काला नहीं करता और न ही साइकिलों से तीन पाली में मजदूरों के झुंड मिलों की तरफ जाते दिखते है।गेट पर लटकते तालों में जंग लग चुका है, मिल परिसर के अंदर जो मैदान मजदूरों से आबाद रहते थे वहां गाजर घांस और पौधे फैल गए हैं। लेकिन गेट के बाहर पांच रु की कट चाय, दस रु के दो समोसे-कचोरी का लुत्फ लेने वालों की भीड़ जरूर बनी रहती है।मिल की जर्जर बाउंड्रीवाल फांदकर रात में नशेड़ियों और बदमाशों की महफिल जम जाती है।कपड़ा मजदूरों के साहस के नाम से इस झिलमिल करती रात को झूठ का तमगा पहना दिया गया है।मिलें बंद हुए पंद्रह बरस हो गए हैं बस अब इन मिलों के परिसर ही उपयोग में आते हैं झांकी निर्माण के लिए-शायद इसलिए इस रात को कपड़ा मिलों की झांकी वाली रात की पहचान मिली हुई है। मुंबई में कभी 54 कपड़ा मिलें हुआ करती थीं, अब एक दर्जन के करीब बची हैं वे सब भी मरणासन्न हालत में हैं।मुंबई के बच्चे इंदौर में छह मिलें कल्याण, स्वदेशी, राजकुमार, मालवा, हुकमचंद होप मिल हुआ करती थीं। 1983 में होप, 91 में हुकमचंद, 2002 में स्वदेशी, कल्याण, राजकुमार और 2003 में मालवा मिल ने भी दम तोड़ दिया। श्रमिक इलाके से गुजरते वक्त यदि नजर पड़ जाए तो बदरंग हो चुके बोर्ड गवाही देते रहते हैं कि पहले इन्हीं मिलों का कपड़ा विश्व बाजार में अपनी खास पहचान रखता था। 

सरकारें रोटी-कपड़ा और मकान की जरूरतों को पूरा करने के वादे से जरूर बंधी हुई हैं लेकिन रोटी के लिए अनाज पैदा करने वाला अन्नदाता आत्महत्या को मजबूर है।विकास की अंधी दौड़ में भाग रहा शहरी करण गांवों और खेत को निगलता जा रहा है। कपड़ा अब आयात होने लगा है या आधुनिक मशीनों से उत्पादित कपड़े ने मजदूरों की निर्भरता कम कर दी है। सरकारें मकानों की जरूरतें पूरी कर रही हैं लेकिन वह भी योजनाओं का लाभ पाने की पात्रता रखने वाले वर्ग के लिए।यानी रोटी-कपड़ा-मकान निम्न मध्यम वर्ग के लिए जिंदा रहने की कठिनतम चुनौती बनता जा रहा है।  

कभी अपने स्वाभिमान और हुनर के अभिमान की वजह से पहचानी जाती रहीं कपड़ा मिल की वो झांकियां इसीलिए बीते डेढ़ दशक में दया, दान पर निर्भर हैं ।दशकों पहले मिल बंद हो गए, मिल मजदूरों की बसाहट के रूप में पहचाने जाने वाले नंदानगर, मालवा मिल क्षेत्र, द्रविड़ नगर के  हजारों परिवारों को अब कोई मिल मजदूर के नाम से नहीं जानता। इस दौरान बीते दस बीस वर्षों में इंदौर की मतदाता सूची में जो हजारों युवा मतदाता जुड़े हैं उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि कभी यह शहर कपड़ा मिलों के कारण पहचाना जाता था। इस पीढ़ी को तो कॉमरेड होमी दाजी, कल्याण जैन, वीवी द्रविड़, रामसिंह भाई वर्मा, सुरेश सेठ, गंगाराम तिवारी के नाम भी नहीं पता इनके लिए इंदौर के शेर का मतलब है अपने अपने क्षेत्र के बाहुबली नेता जैसे गणपति को हर मोहल्ले-कॉलोनी के राजा का नाम दे कर स्थापित किया जाने लगा है, वही स्थिति इंदौर के इन शेरों की हो गई है। यह बात अलग है कि विपरीत दल-विचारधारा के बाद भी इन लोकल शेरों में अकसर मजबूत गठबंधन हो जाता है।

बंद हो चुकी कपड़ा मिलों को लेकर श्मशान वैराग्य जैसा भाव बस इसी एक दिन हिलोरे मारता है इधर गणेश जी ठंडे किए और उसी के साथ कपड़ा मिलों की दुर्दशा वाली चिंता भी ठंडी हो जाती है। ऐसा नहीं कि शिवराज सरकार के इन पंद्रह वर्षों या मोदी सरकार के चार वर्षों में ही मिलें बंद हुई हैं केंद्र में मनमोहन सिंह और मप्र में दिग्विजय सिंह सरकार के वक्त से ही इस जहाज में सुराख होना शुरु हो गए थे बाद की सरकारों ने सुराख पर हथेली लगाने का काम किया लेकिन यह ध्यान नहीं दिया कि सुराख का आकार हथेली से भी बढ़ा होता जा रहा है। यही कारण रहा कि इंदौर, उज्जैन ही नहीं, छत्तीसगढ, मुंबई, अहमदाबाद कोलकाता, कानपुर, कोयंबतूर सहित देश की सभी कपड़ा मिलें इसलिए भी बदहाली का शिकार होती गईं कि सरकार का इंट्रेस्ट कपास निर्यात में तो रहा लेकिन कपड़ा मिलों को जिंदा रखने में कम रहा, इसकी एक वजह मजदूर आंदोलन के नाम पर उत्पादन प्रभावित करने वाले विभिन्न श्रम संगठनों का राजनीतिक दलों के हाथों में खेलना भी रहा।  

इन संस्थाओं से बचा हुआ है कपड़ा मिलों की झांकियों का गौरव

कपड़ा मिलों की झांकियों की इस गौरवशाली परंपरा को जीवित रखने के लिए नगर निगम, उसके बाद नंदानगर सहकारी साख संस्था, इंदौर विकास प्राधिकरण, विष्णु प्रसाद शुक्ला, कनकेश्वरी इंफोटेक,  किशोर वाधवानी, कमलेश खंडेलवाल, विमल कुमार पोद्दार के साथ ही शहर के अन्य संगठनों ने झांकी निर्माण में आर्थिक सहयोग की उदारता दिखाई है। इन सब की वजह से भी नौ दशक पुरानी इंदौर की यह पहचान जिंदा है लेकिन इतने बदलाव के बाद भी ये झांकिया शास्त्री पुल के उस पार के रहवासियों को आज तक नहीं जोड़ पाई हैं। जब कपड़ा मिलों में इंदौर का दिल धड़कता था और कवि सम्मेलनों के साथ कव्वालियों के जोरदार मुकाबले हुआ करते थे तब शहर के हर इलाके से सुनने वाले भी जुटा करते थे, अब वो जमाना नहीं रहा लिहाजा ऐसे सारे आयोजन भी क्लबों, सभागार के आमंत्रित श्रोताओं में सिमट गए।

झांकियों के परिणाम
 

1 - स्वदेशी मिल प्रथम
2 - हुकुमचंद मिल द्वितीय
3 - मालवा मिल व राजकुमार मिल संयुक्त रूप से तृतीय

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कीर्ति राणा

क़रीब चार दशक से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा लंबे समय तक दैनिक भास्कर ग्रुप के विभिन्न संस्करणों में संपादक, दबंग दुनिया ग्रुप में लॉंचिंग एडिटर रहे हैं।

वर्तमान में दैनिक अवंतिका इंदौर के संपादक हैं। राजनीतिक मुद्दों पर निरंतर लिखते रहते हैं ।

सामाजिक मूल्यों पर आधारित कॉलम ‘पचमेल’ से भी उनकी पहचान है। सोशल साइट पर भी उतने ही सक्रिय हैं।


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