Wednesday, September 18, 2019
कश्मीर और विश्व

कश्मीर और विश्व

मीडियावाला.इन।

मोदी ने कश्मीर से धारा 370 हटाकर एक साहसिक क़दम उठाया है। भारतीय संविधान में स्वयं यह लिखा था कि यह धारा अस्थाई है। मोदी और शाह की जोड़ी ने बड़ी चतुराई से देश की राजनीति को भाँप लिया था और उन्हें मालूम था कि मुख्यधारा का विपक्ष इस पर कोई ठोस विरोध नहीं कर पाएगा।

 मोदी के समक्ष मुख्य  समस्या  अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया की थी और इसके लिए उन्होंने भारत के सभी राजदूतों को विदेशों की सरकारों के सामने दमदारी से भारत का पक्ष रखने के लिए निर्देश दिए थे। भारत के निर्णय को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ रखे जाने से भारत को बहुत लाभ हुआ। ट्रम्प ,पुतिन, मैक्रो तथा खाड़ी के मुस्लिम देशों के आकाओं को समझाने के लिए स्वयं मोदी ने कमान सँभाली और भारत के पक्ष में वातावरण उत्पन्न किया। यहाँ तक कि चीन की पाक समर्थक प्रतिक्रिया भी कुल मिलाकर नियंत्रित रही।भारत को सबसे अधिक कठिनाई अस्थिर मस्तिष्क के ट्रंप से हुई जो अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के साथ समझौता करने में पाकिस्तान के द्वारा दी जा रही सहायता के एवज़ में भारत को जान बूझ कर मध्यस्थता के लिए आमंत्रित कर रहे थे। ट्रंप के इन वक्तव्यों से भारत काफ़ी असहज हो गया था। भारत का सौभाग्य है कि ट्रंप और तालिबान की वार्ता टूट गई और पाकिस्तान की अमेरिका को सहायता देने की भूमिका फ़िलहाल सीतनिद्रा मे चली गई है।           

 सितम्बर माह UN की गतिविधियों के लिए जाना जाता है। भारत ने जिनेवा में UN ह्यूमन राइट्स काउंसिल मे पाकिस्तान के विदेश मंत्री कुरैशी के भाषण को लगभग एक अरण्य- रुदन के समान बना दिया। भारत ने उनका उत्तर केवल विदेश सचिव (पूर्व ) स्तर के अधिकारी  से ही दिया। यूएन जनरल असेंबली में भी पाकिस्तान को समर्थन मिलने की कोई आशा नहीं है। 

  इन वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से भारत को आत्ममुग्ध न होते हुए भविष्य के लिए बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता है।भारत को यह नहीं समझना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय जनमत हमेशा एकमत से उसके साथ रहेगा। इस समय सबसे गंभीर समस्या कश्मीर घाटी में जनजीवन को सामान्य बनाना है और पूरा विश्व इसको बहुत ध्यान से देख रहा है। पाकिस्तान पूरी ताक़त से नियंत्रण रेखा पर सेना के द्वारा और घाटी के अंदर आतंकवादियों के द्वारा वातावरण विषाक्त बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। पाकिस्तान की हरकतों के बावजूद भारत को  स्थिति नियंत्रण में रखनी होगी। घाटी के लोगों को घरों में क़ैद हुए अब दूसरा महीना चल रहा है। सभी प्रकार की व्यावसायिक, शासकीय, सामाजिक, मीडिया, संचार एवं धार्मिक गतिविधियां लगभग बंद है। पूरे कश्मीर में केवल सुरक्षा कर्मी सक्रिय हैं। कश्मीर मे सबसे बड़ा व्यवसाय सेब का होता है और वह बुरी तरह से बाधित हो रहा है। भारत सरकार वहाँ के अलगाववादियों को यह संकेत दे सकती है कि बिना शांति के कश्मीर का सेब भारत नहीं पहुँच सकता है।वर्ष 2010 में भी लंबी हिंसा के बाद अन्य कारणों के अतिरिक्त सेब के कारण भी शांति बहाल हो सकी थी।मोदी और शाह के लिए यह परीक्षा की घड़ी है कि वे कश्मीर में किस प्रकार स्थिति को सामान्य करते हैं। यद्यपि कश्मीर घाटी भारत का आंतरिक मुद्दा है फिर भी वहाँ की स्थिति भविष्य में अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया का निर्धारण करेगी। कश्मीर की अनियंत्रित  स्थिति भारत सरकार को देश की गंभीर आर्थिक स्थिति से निपटने के लिए पूरा ध्यान और शक्ति नहीं लगाने देगी।

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एन. के. त्रिपाठी

एन के त्रिपाठी आई पी एस सेवा के मप्र काडर के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। उन्होंने प्रदेश मे फ़ील्ड और मुख्यालय दोनों स्थानों मे महत्वपूर्ण पदों पर सफलतापूर्वक कार्य किया। प्रदेश मे उनकी अन्तिम पदस्थापना परिवहन आयुक्त के रूप मे थी और उसके पश्चात वे प्रतिनियुक्ति पर केंद्र मे गये। वहाँ पर वे स्पेशल डीजी, सी आर पी एफ और डीजीपी, एन सी आर बी के पद पर रहे।

वर्तमान मे वे मालवांचल विश्वविद्यालय, इंदौर के कुलपति हैं। वे अभी अनेक गतिविधियों से जुड़े हुए है जिनमें खेल, साहित्य एवं एन जी ओ आदि है। पठन पाठन और देशा टन में उनकी विशेष रुचि है।

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