Sunday, June 16, 2019
आचार संहिता की नयी चुनौतियाँ

आचार संहिता की नयी चुनौतियाँ

लोकसभा चुनावों के लिए आदर्श आचार संहिता लागू होते ही नयी चुनौतियां भी सामने आकर खड़ी हो गयीं हैं,चुनाव आयोग के लिए इन नयी चुनौतियों से निबटना इस बार की सबसे बड़ी "अग्निपरीक्षा"है .ये चुनौतियां तकनीक की हैं और इनका तोड़ अब तक निकाला नहीं गया है .लोकसभा के लिए चुनाव ११ अप्रेल से २३ मकई तक कराये जाने हैं .

चुनाव आयोग की मौजूदा आदर्श आचार संहिता वक्त की चुनौतियों के हिसाब से कालातीत होती नजर आती है .आदर्श आचार संहिता केवल पढ़ने में आदर्श लगती है वरना धरातल पर उसे प्रति-पल तोड़ा जाता है लेकिन इतनी सफाई से तोडा जाता है की कोई कुछ कर ही नहीं सकता .आचार संहिता जिस-जिस काम की मुमानियत करती है,नेता वे ही सब काम जान-बूझ कर करते हैं.मान लीजिये संहिता कहती है की किसी जाती,धर्म सम्प्रदाय को आहत करने वाली बात न की जाये,किसी कोई व्यक्तिगत आलोचना न की जाये ,लेकिन कोई मानता है क्या ?

आदर्श आचार संहिता कहती है की पूजाघरों का इस्तेमाल मंच के रूप में मत कीजिये तो नेता जान-बूझकर थोड़ा सा बरकते हुए अपने चुनाव अभियान का श्री गणेश किसी न किसी पूजाघर में माथा टेककर ही करते हैं,आइये रोक लीजिये ,ये उनकी निजी आस्था से जुड़ा मामला है जबकि ऐसा करने के निहितार्थ साफ़-साफ़ सियासी हैं यानि यदि चुनाव आयोग डाल-डाल चलता है तो नेता पात-पात पर चलते नजर आते हैं .

पूर्व चुनाव आयुक्त ओपी रावत से मैंने सवाल किया था की क्या आयोग के पास सोशल मीडिया और टीवी चैनलों का सीधा प्रसारण बाधित करने का कोई इंतजाम है टी वे मौन हो गए थे .आज के समय में सोशल मीडिया और टीवी चैनलों से होने वाला चुनावी सभाओं का सीधा प्रसारण ही आदर्श आचार संहिता की सरेआम धज्जियां उड़ाता है.आप जब तक चुनाव सभाओं के सीधे पर्सारण को बाधित नहीं करते तब तक आदर्श आचार संहिता का पालन नहीं हो सकता ,सोशल मीडिया पर आप किसी को कैसे रोक सकते हैं ?क्योंकि यहां तो आपकी पहुँच है ही नहीं .आदर्श आचार संहिता का पालन करने के लिए चुनाव पर्यवेक्षकों की लम्बी फ़ौज और एमसीएमसी कमेटियां होती हैं लेकिन इनकी भी अपनी सीमाएं हैं ,उनके आगे ये सब आशय हैं .

चुनाव आयोग को शायद पता नहीं हो लेकिन हकीकत ये है की चुनाव पर्यवेक्षक चुनाव ड्यूटी के समय सबसे जयादा अनादर्श प्रस्तुत करते हैं ,वे आयोग के काम के लिए मिली शासकीय सुविधाओं का सबसे अधिक दुरुपयोग करते हैं.वे चुनाव पर्यवेक्षण को छोड़ पर्यटन और मौज-मस्ती में जुट जाते हैं. जिला निर्वाचन अधिकारी उनका सेवक बन जाता है ,आदर्श आचार संहिता अपने पर्यवेक्षकों के आचरण को भी बाधित नहीं करती जब आयोग की आँख-कान ही खराब हों तो आप कैसे अपेक्षा कर सकते हैं की जो होगा सो सब ठीक ही होगा ?

इस बात में कोई दो राय नहीं की टीएन शेषन ने आदर्श आचार संहिता का जो हुआ खड़ा किया था उसका साफ़-सुथरे चुनाव करने में बड़ा योगदान है और बाद के वर्षों में इस हुआ का आकार बड़ा ही होता गया लेकिन असर व्यापक नहीं हुआ .अब शेषन कोई तरह दहाड़ने और फुफकारने वाले चुनाव आयुक्त नहीं आ रहे ,उलटे पिछले दिनों में चुनाव आयोग खुद सवालों के घेरे में आ गया,प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया की आयोग सरकार के इशारों पर काम करता है यहां तक की चुनाव कार्यक्रम घोषित करने में भी सरकार की सुविधाओं का ख्याल रखा जाता है .

इस बार के चुनाव में सेना का शौर्य जाने अनजाने एक सियासी मुद्दा है,सेना की तस्वीरों के सियासी इस्तेमाल को रोकने के लिए इस बार उच्चतम न्यायालय तक को हस्तक्षेप करना पड़ा,चुनाव आयोग ने भी इस वारे में स्नज्ञान लिया लेकिन देर से .मै देख रहा था की उधर आयोग चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर रहा था दूसरी तरफ कुछ चैनल इन खबरों के साथ सेना का चॉपर उड़ाते दिखाई दे रहे थे,कहने का आशय ये है की इस बार राजनीतक दलों से कहीं अधिक उनके माउथपीस बन चुके चैनल आदर्श अचार संहिता तोड़ने पर आमादा हैं,.ऐंकर सेना की वर्दियां पहने दिखाई दे रहे हैं .

चुनाव आयोग यदि देश में निष्पक्ष चुनाव कराना चाहता है तो सबसे पहले उसे चुनावी रैलियों के सजीव प्रसारण को बाधित करना होगा ,बल्कि सीधे प्रसारण के खर्च को वास्तविक खर्च मानकर पार्टी के चुनावी खर्च में शामिल करना होगा यानि उसे 'पेडन्यूज' मानना होगा ,दुसरे सीधे प्रसारण की समय सीमा और प्रसारण का क्षेत्र भी नियंत्रित करना होगा ताकि नेतागण दूसरे चुनाव क्षेत्रों को प्रभावित न कर सकें .वर्तमान में ये ही सबसे बड़ी चुनौतियां हैं .

आपको बता दें कि 17वीं लोकसभा के गठन के लिए 90 करोड़ लोग वोट डालेंगे. 18 से 19 साल के डेढ़ करोड़ वोटर इस चुनाव में पहली बार हिस्सा लेंगे. मुख्य चुनाव आयुक्त के मुताबिक आठ करोड़ 43 लाख नए मतदाता इस बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे.लोकतंत्र के इस महायज्ञ को सम्पादित करने के लिए आदर्श आचार संहिता का नयी चुनौतियों के हिसाब से सज्जित होना बहुत जरूरी है ,चुनाव आयुक्त शायद इस बारे में चिंतित भी हों 

चुनाव आयोग जब तक आदर्श आचार संहिता तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त और प्रभावी कार्रवाई नहीं करेगा तब तक लोग उससे डरने वाले नहीं हैं,ख़ास तौर पर नेता.अभी आयोग केवल आपराधिक प्रकरण कायम करने तक सीमित है ,आयोग ने अभी तक किसी को संहिता के उल्लंघन करने पर चुनाव लड़ने से रोका नहीं है .अब देखना होगा की आने वाले दिनों में आदर्श आचार संहिता आदर्श रह पाती है या नहीं ?

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राकेश अचल

राकेश अचल ग्वालियर - चंबल क्षेत्र के वरिष्ठ और जाने माने पत्रकार है। वर्तमान वे फ्री लांस पत्रकार है। वे आज तक के ग्वालियर के रिपोर्टर रहे है।