Tuesday, September 17, 2019
आचार संहिता की रात

आचार संहिता की रात

मीडियावाला.इन।  आचार संहिता लागू हो गई है। नेताजी कमरे में बैठे हैं। जैसे मौत के पहले जिंदगी की कहानी आंखों मैं तैरने लगती है। नेताजी को भी पांच साल का किया-धरा याद आ रहा है। कुछ खास सहयोगियों के अलावा कोई आसपास नहीं है। थोड़ी घबराहट है और ढेर सारी बेचैनी भी। नेताजी पूछते हैं, साला समझ नहीं आता कि ये पांच साल इतनी जल्दी खत्म कैसे हो जाते हैं। अभी तो इतनी माथापच्ची करके चुनाव जीते थे और अब फिर आ गए। फिर वही गांव-गांव, गली-गली दौड़ो।

अचानक नेताजी को कुछ बातें याद आने लगती हैं। वो लिस्ट बन गई ना कि कौन-कौन लोग से पैसा लेना है। सारे ठेकेदारों को कल ही बुला लेना। जितने भी हमारे नाम से ठेके पाए हैं, उनसे पूरा हिसाब कर लेना। सहायक कहता है ... बाकी सब तो ठीक है, लेकिन तीन-चार लोग आनाकानी कर रहे हैं। कहते हैं, ठेके दिलाने के समय नेताजी पूरा हिस्सा लेते हैं, फिर चुनाव में वापस गर्दन क्यों काट रहे हैं। नेताजी इतना सुनते ही तमतमा जाते हैं। गरज कर कहते हैं, कौन कह रहा है ऐसा, बुलाकर लाओ उसको सबसे पहले। अरे, हमारी वजह से ठेके मिलते हैं। रोजी-रोजगार चलता है। चुनाव में मदद नहीं करेंगे तो क्या पाएंगे। दूसरा आ गया तो गर्दन पर लात रखकर कमीशन भी लेगा और चुनाव में जमकर खर्चा भी कराएगा। हम तो पूछते तक नहीं हैं, जो देते हैं, चुपचाप रख लेते हैं। कभी गिने भी नहीं है। बात कर रहे हैं।

अच्छा ये छोड़ो पहले सब काम की सूची बना लेना। किस-किस गांव में क्या काम कराए हैं। गड़बड़ मत करना। छोटे से छोटा काम भी लिख लेना। कित्ते लोगों की शादी-ब्याह कराए हैं, कितना दान-दहेज दिया है। वह सब भी। सहायक धीरे से पूछता है पर वो तो सब सरकारी योजना में हुआ था ना। नेताजी चीख पड़ते हैं अरे तो सरकारी योजना कौन तुम्हारा बाप लेकर आया था। अरे हम ही तो सरकार हैं। उसका हिस्सा हैं, हम योजना लेकर आए और लोगों का शादी-ब्याह कराया है। इसका भी श्रेय नहीं लेंगे तो फिर क्या बैठकर झांझ बजाएंगे। सहायक चुप हो जाता है।

नेताजी फिर पूछते हैं, वो गांव के सब खास-खास लोगों की सूची बन गई कि नहीं। सहायक जुबान नहीं खोलता। नेताजी फिर चीख पड़ते हैं। जो काम सबसे पहले होना चाहिए, वह अब तक नहीं हुआ है। काम में मन नहीं लगता है तो काहे टिके हो यहां, चलते क्यों नहीं बनते। सहायक बोलता है, सूची तो पिछले चुनाव में भी बनाई थी, लेकिन उसका हुआ क्या। नेताजी कहते हैं, अरे भाई बनाई थी तो उनको बुलाओ ना कल दावत करते हैं। खाना-पीना हो, थोड़ा संगीत-वंगीत का इंतजाम करो। उनका सम्मान कर देंगे। शाल श्रीफल मंगा लेना। सहायक कहता है, इस बार लोग आना नहीं चाहते, कहते हैं सिर्फ चुनाव के समय याद आती है, बाद में पहचानते भी नहीं।

नेताजी कहते हैं, न पहचानने का क्या मतलब है, हम सबकी शादी-ब्याह, नुक्ते-घाटे में जाते हैं। गांव में सबको नाम से बुलाते हैं। सहायक कहने लगा, पिछली बार फलां गांव में आपने रामशरण कहकर दिलीप के गले में माला डाल दी थी। दोनों ही नाराज थे। अरे, ये कोई बात नहीं होती। दिलीप हो या रामशरण और गलती तुम्हारी थी। पहले बता दिया होता तो ऐसी नौबत नहीं आती, लेकिन गांव पहुंचते ही तुम्हारी तो रंगत ही बदल जाती है। खुुद ऐसे एंठने लगते हो कि हमारे भी बाप हो।

इसी बीच एक कार्यकर्ता आता है। कहता है सर बड़ी दिक्कत हो गई है, अपने 13 गांवों में लोगों ने बैनर लगा दिया है कि वोट नहीं देंगे। नेताजी का माथा ठनकता है। अरे, ऐसा क्या हो गया जो वोट नहीं देंगे। कार्यकर्ता कहता है, उनका कहना है, आपने जितनी घोषणा की थी, एक भी पूरी नहीं हुई। गांव में न सडक़ बदली, न अस्पताल ठीक हुआ और न स्कूल की दशा बदली। लोग बहुत नाराज हैं। कहा है, अगर आप वोट मांगने गांव में घुसे तो काला मुंह कर जुलूस निकालेंगे। नेताजी का दिल बैठ जाता है, सारा गुस्सा सहायक पर उतारते हैं। तुम्हे कहा था ना कि आखिरी में सूची बनाकर सब जगह शिलान्यास करा लेना। कराए क्या नहीं।

सहायक कहता है, शिलान्यास तो कर दिए थे, लेकिन लोग माने नहीं। कहने लगे, पिछली बार भी खूब सारे पत्थर लगाए थे, उनका हुआ क्या। चार और लगा दोगे तो क्या हो जाएगा। नेताजी गुस्से से लाल हो गए, कहने लगे पहले क्यों नहीं बताया। चार बोरी सीमेंट और थोड़ी रेती-गिट्टी भी भेज देते। एक-दो दिन काम भी करा लेते। लोग खुश हो जाते। तुमसे कुछ नहीं होता है। अब मुझे ही कुछ करना होगा, बुलाओ सारे गांव के नेताओं को। बड़ी पार्टी करते हैं, गले तर होंगे तो सब विरोध उतर जाएगा। सहायक मुंह नीचा कर रह जाता है। आचार संहिता से आचार संहिता तक देश का लोकतंत्र ऐसे ही चल रहा है। 
 

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अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.