Monday, October 22, 2018
न्यायपालिका पर राजनैतिक खेल

न्यायपालिका पर राजनैतिक खेल

पर्यटन से लौट कर सभी पुराने समाचार पत्र पढ़े। चुनाव संबंधी निरर्थक सूचनाओं के बीच बीते दिनों के सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय ध्यानाकर्षित करने वाले हैं। विदेश जाने से पूर्व मैंने प्रतीक्षित निर्णयों की सूची के बारे में लिखा था ।विवादास्पद चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने बड़े साहस के साथ अपनी सोच के अनुसार निर्णय दिये हैं । अधिकांश पीठें उन्हीं के अनुसार बनी थी अत: ये निर्णय उन्हीं के हैं। सभी निर्णय प्रत्याशित हैं। मैं अत्यन्त सूक्ष्म मे इन पर कुछ कहना चाहता हूँ। 

आधार पर दिया गया निर्णय सरकार के लिये राहत देने वाला है। वैसे भी भारी व्यय और श्रम के बाद ९९% लोगों का आधार कार्ड बन चुका है और उस पर अब पानी फेरना मूर्खता होती। निजता के पक्षधर अभिजात्य वर्ग, जिसके अपने निजी स्वार्थ भी है, उनको भी थोड़ा संतुष्ट किया गया है और अनेक क्षेत्रों मे आधार की अनिवार्यता समाप्त कर दी गयी है। 

अयोध्या का विवाद तीन जजों की बेंच से पाँच जजों की संवैधानिक पीठ को भेजने की याचिका ख़ारिज कर दी गई है और अब इस प्रकरण की त्वरित सुनवाई हो सकेगी। नमाज़ के लिये मस्जिद की अनिवार्यता के प्रश्न पर  कोर्ट ने कोई टीप देने से इन्कार कर दिया है। इस निर्णय से विपक्षी दलों को झटका लगा है क्योंकि कपिल सिब्बल ब्रिगेड का चिल्लाना व्यर्थ चला गया है। 

चुनाव मे दाग़ी उम्मीदवारों के मामले मे कोर्ट ने कहा है कि निचली अदालत मे केवल आरोप ( चार्ज) तय होने के आधार पर चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता है। वर्तमान की तरह केवल वहाँ पर सज़ा होने पर ही प्रत्याशी को अयोग्य घोषित किया जा सकता है। कोर्ट ने यथा बनाये रखते हुए इस पर क़ानून बनाना संसद पर छोड़ दिया है। नेता खुश हैं। अपराधियों से भरी संसद कुछ करेगी यह हास्यास्पद है। 

धारा ४९७ भा दं वि अर्थात एडल्टरी का प्रावधान समाप्त कर कोर्ट ने स्पष्ट घोषणा कर दी है कि राज्य और पुलिस को किसी के बेडरूम मे झाँकने की आवश्यकता नहीं है। सामाजिक नैतिकता निजी जीवन पर थोपी नहीं जा सकती है। महिला को चल संपत्ति मानने की विक्टोरियायी मान्यता को कोर्ट ने कूड़ेदान मे फेंक दिया है। बीजेपी सरकार आर एस एस के दबाव मे बौनी सिद्ध हुई और न्यायालय मे उसने मध्ययुगीन विचारधारा प्रस्तुत करने का असफल प्रयास किया। 

एस सी एस टी वर्ग को सरकारी नौकरियों  मे पदोन्नति मे आरक्षण दिये जाने के मामले मे कोर्ट ने मिश्रित निर्णय दिया है। पुराने नागराज केस मे इस वर्ग के विभिन्न घटकों के पिछड़ेपन की जाँच पड़ताल का मामला कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया है। इससे इस वर्ग को राहत मिली है क्योंकि यह ख़तरा था कि कुछ जातियाँ इस वर्ग से बाहर न हो जायें। लेकिन कोर्ट ने साथ ही यह भी कह दिया है कि इस वर्ग  के क्रीमी लेयर वाले परिवारों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिये। ऐसी व्यवस्था ओबीसी के लिये है। इस निर्णय से एस सी एस टी वर्ग के सक्षम अभिजात्य तबके ( जैसे पासवान आदि) को चोट लग सकती है। इस निर्णय से कांग्रेस तथा बीजेपी दोनों को साँप सूंघ गया है तथा उन्होंने ग़ज़ब की चुप्पी साध ली है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस निर्णय का पालन कब और कैसे होगा। 

केरल के सबरीमाला के आयप्पा मन्दिर मे १० से ५० वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध कोर्ट ने समाप्त कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि यह प्रतिबंध संविधान की धारा १४ एवं २१ का उल्लंघन है। दूसरे शब्दों मे धार्मिक परंपराएँ संविधान की आधुनिक सोच के आगे नहीं टिक सकती हैं। मैं इस निर्णय से पूर्णत: सहमत हूँ परन्तु यह निर्णय भविष्य के लिये बहुत ही फिस्फोटक है क्योंकि सभी धर्मों की अधिकांश परंपराएँ असमानता तथा प्रतिगामी विचारों पर आधारित है। कोई आश्चर्य नहीं है कि देवस्थानम् तथा कट्टर हिन्दुओं के अतिरिक्त अतिवादी मुस्लिमों ने भी इस निर्णय का विरोध किया है। कांग्रेस और बीजेपी एक बार फिर पुरातनपंथियों के साथ खड़ी हैं। 

अंततोगत्वा इन निर्णयों से राजनीति के अतिरिक्त सामाजिक  स्तर पर भी देश कुछ करवटें ले रहा है।  हमारी राजनैतिक पार्टियाँ समाज को आगे ले जाने के लिये संविधान की शपथ खाती हैं लेकिन संवैधानिक कोर्ट के निर्णयों पर ओछी चालाकी दिखाती हैं। यदि निर्णय पक्ष मे आता है तो न्यायपालिका मे पूर्ण विश्वास जताते हुए मुक्त कंठ से उसकी प्रशंसा करते हैं परन्तु यदि निर्णय उल्टा हुआ तो जनभावनओं का ‘ सम्मान’ करते हुए उस निर्णय को ही पलट देते हैं। इस विषय मे शाहबानो प्रकरण मे राजीव गांधी पहले ही हमारा मार्गदर्शन कर गये हैं।

 

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एन. के. त्रिपाठी

एन के त्रिपाठी आई पी एस सेवा के मप्र काडर के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। उन्होंने प्रदेश मे फ़ील्ड और मुख्यालय दोनों स्थानों मे महत्वपूर्ण पदों पर सफलतापूर्वक कार्य किया। प्रदेश मे उनकी अन्तिम पदस्थापना परिवहन आयुक्त के रूप मे थी और उसके पश्चात वे प्रतिनियुक्ति पर केंद्र मे गये। वहाँ पर वे स्पेशल डीजी, सी आर पी एफ और डीजीपी, एन सी आर बी के पद पर रहे।

वर्तमान मे वे मालवांचल विश्वविद्यालय, इंदौर के कुलपति हैं। वे अभी अनेक गतिविधियों से जुड़े हुए है जिनमें खेल, साहित्य एवं एन जी ओ आदि है। पठन पाठन और देशा टन में उनकी विशेष रुचि है।

मो. नंबर - 9425112266