Wednesday, November 14, 2018
इतना बुरा भी नहीं है शिवराज का चेहरा !

इतना बुरा भी नहीं है शिवराज का चेहरा !

इन चार सालों में मुझे आज तक यह बात पल्ले नहीं पड़ी कि प्रधानमंत्री मोदी और शिवराज जहां जहां, जब जब आमने-सामने होते हैं पीएमजी की भाव भंगिमा से लगता है वह उन्हें फूटी आंख नहीं सुहाते।सीएम हाउस से लेकर विदिशा के अपने गांव में भी शिवराज गाय जरूर पालते हैं लेकिन जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश बाद भी गुजरात से गिर प्रजाति के शेर लाने का साहस न दिखा सके वो मोदी के गांव से भैस लेकर आया हो।

अभी कल महाकुंभ में भोपाल आए तब भी राजश्री फिल्म की संस्कारित बहू की तरह सीएम तो झुके-झुके जा रहे थे और ये थे कि ललिता पंवार जैसी खुर्राट सास बने हुए थे।

प्रदेश के मामा शिवराज सिंह का चेहरा इतना भी बुरा नहीं है।एक आदमी पंद्रह साल से मप्र का नेतृत्व कर रहा है, आप को भगवान कहते कहते मुंह सूख जाता है।आप की हर मप्र यात्रा में मुकुट में उपमा का कोहिनूर जड़ने का कौशल दिखाता है।चौथी बार फिर शिवराज

 ही नेतृत्व में ‘अबकी बार-दो सौ पार’ के साथ ही लोकसभा की 29 सीटों पर प्रचंड जीत का संकल्प भी बार बार दोहराया जाता है। फिर ऐसा क्या है कि बस शिवराज का चेहरा सामने आते ही हावभाव बदल जाते हैं? क्यों ऐसी मुखमुद्रा हो जाती है कि जैसे आडवाणी सामने आ गए हों।केंद्र की सारी योजनाओं को लागू करने में नंबर वन ही नहीं बल्कि जिस प्रदेश की लाड़ली लक्ष्मी योजना को केंद्र ने गले लगा लिया हो उस के मुखिया के चेहरे से इतनी बेरुखी! गुजरात में 13साल सीएम (2001-14) रहने का कीर्तिमान आप के नाम है तो ये बंदा भी (2005 से) डेढ़ दशक पूरे करने वाला है।कहीं यही भय तो नहीं ? क्या इसीलिए 2013 महाकुंभ की पंच लाईन ‘जन जन की आवाज-फिर भाजपा फिर शिवराज’ की जगह इस महाकुंभ मंच के बैकग्राउंड पर पहले अपनी ललकार, भाजपा सरकार।फिर इसे भी बदलकर जनता की पुकार, फिर भाजपा सरकार किया गया, क्या इन्हीं कारणों से चेहरा पसंद नहीं आ रहा है?  

कैमरों की फ्लश लाइट चमकने भर से जिस चेहरे पर रौनक आ जाती हो, विश्व मंच पर फोटो सेशन के दौरान  कोई सामने आने की भूल कर बैठे तो दूसरे ही पल हाथ पकड़ कर फ्रेम से बाहर कर देने का जो शख्स अदम्य साहस रखता हो।ऐसे महामानव को यह पता न हो कि एमपी के सीएम के साथ फोटो सेशन के पलों में कैसे पेश आना है, यह संभव ही नहीं। 

हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री प्रदेश में जहां भी आए हैं, राज्य सरकार ने उनके आतिथ्य सत्कार में कहीं कोई कमी रखी हो ऐसा कोई किस्सा विरोधी दलों के पास भी नहीं है फिर अपनी ही पार्टी के ऐसे विनम्र व्यक्तित्व से विरोधी पार्टी के  सीए जैसा ‘तस्वीराना व्यवहार’ क्यों? क्यों इसे आम पार्टी कार्यकर्ता पूर्व नियोजित अदा और अंदरुनी अदावत मानने को मजबूर हो रहा है।आर्ट ऑफ लिविंग वाले श्री श्री रविशंकर तो कहते हैं हंसना न आए तो झूठे ही हंसो-मुस्कुराओ।मप्र में आएं और शिवराज गुलदस्ता भेंट करें तो झूठे ही मुस्कुरा दें। नेता लोग तो यूं भी झूठे वादे करने के लिए बदनाम हैं, ये नई बदनामी और सही। सोचिए इस महाकुंभ में तीन लाख या तेरह लाख जितना भी कमलदल आया, उस सब ने इस बार भी आप के इस अंदाज का क्या मतलब निकाला होगा, जबकि उसी मंच पर बाबूलाल गौर के साथ हंसीठट्ठा करते भी सबने देखा है।आप दोनों कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए आएं पर यह तो विरोधाभास ही होगा कि उन कार्यकर्ताओं के सेनापति को नजरअंदाज करते रहें वह भी तब जब प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह भी इतने महीनों में कार्यकर्ताओं में कमलनाथ की तरह कांग्रेस कार्यकर्ताओं जैसा जोश ना भर पाए हों। 
 

0 comments      

Add Comment


कीर्ति राणा

क़रीब चार दशक से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा लंबे समय तक दैनिक भास्कर ग्रुप के विभिन्न संस्करणों में संपादक, दबंग दुनिया ग्रुप में लॉंचिंग एडिटर रहे हैं।

वर्तमान में दैनिक अवंतिका इंदौर के संपादक हैं। राजनीतिक मुद्दों पर निरंतर लिखते रहते हैं ।

सामाजिक मूल्यों पर आधारित कॉलम ‘पचमेल’ से भी उनकी पहचान है। सोशल साइट पर भी उतने ही सक्रिय हैं।


संपर्क : 8989789896