Wednesday, June 19, 2019
शुतुरमुर्ग की तरह खतरों से लड़ नहीं सकती कांग्रेस

शुतुरमुर्ग की तरह खतरों से लड़ नहीं सकती कांग्रेस

mediawala.in

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस क्या करे? लाख टके का सवाल है कि उसे किस रणनीति पर काम करना चाहिए कि वह जल्द से जल्द हार के अवसाद से बाहर निकलकर कार्यकर्ताओं में जोश भरे और आने वाले चुनाव के लिए अपनों को तैयार करे। कांग्रेस एक आंदोलन से निकली पार्टी है और वह तभी खड़ी हो सकती है जब अपनी जड़ों को उन्हीं खाद-पानी से सींचे जिससे उनके पूर्वजों ने डेढ़ सौ साल पूर्व उसे खड़ा किया था। राहुल गांधी के इस्तीफे की पेशकश के बाद कोई कह रहा है कि यह नौटंकी है, कोई कह रहा है कि यह कांग्रेस के हित में नहीं है और चमचावाद के प्रवर्तकों ने यहां तक कह दिया कि राहुल गांधी के बिना कांग्रेस एक कदम भी आगे नहीं चल सकती। तो फिर कांग्रेस करे क्या? एक राजनीतिक समीक्षक के नाते कांग्रेस के भीतर जो कुछ चल रहा है वह ठीक नहीं है। लोकतंत्र के लिए एक मजबूत विपक्ष जरूरी है, जो मजबूत सरकार के सामने दृढ़ता से अंकुश का काम कर सके। नरेंद्र मोदी जैसे कद्दावर नेता और अमित शाह जैसे रणनीतिकार के सामने राजीव गांधी और सोनिया गांधी के सलाहकार फुस्सी बम की तरह हैं। चूक गए नेता और जमीनी सचाई से कोसों दूर रहने वाले ये व्हाइट कालर सलाहकार राहुल-प्रियंका की जोड़ी को फिर से सत्ता तक नहीं ले सकते। ऐसे में राहुल गांधी को क्या करना चाहिए? सबसे पहले राहुल-प्रियंका को अपनी मां और पिता के सलाहकारों से पिंड छुड़ा लेना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा करने से भी काम नहीं चलेगा, क्योंकि प्रदेशों में भले ही पिछले चुनावों में तीन राज्यों में सत्ता हासिल की हो, पर जो लोग कमान संभाले हुए हैं वे अगले 20 साल की कांग्रेस खड़ी नहीं कर सकते हैं। कमलनाथ, अशोक गेहलोत, भूपेश बघेल जैसे क्षेत्रीय क्षत्रप सत्ता में आ गए, पर अपनी चमक से 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को कुछ नहीं दे पाए। कर्नाटक, दिल्ली से लेकर उत्तर पूर्व राज्य और दक्षिण में भी कांग्रेस के सिपहसालार कोई करिश्मा नहीं कर सके। तो फिर इन परिस्थितियों में लगभग समाप्तप्राय कांग्रेस को पुनर्जीवित कैसे किया जाए? यह सवाल राहुल-प्रियंका की भविष्य की राजनीति के लिए बहुत मायने रखता है और सिर्फ मायने नहीं रखता बल्कि उसका निदान किए बिना आगे की राजनीतिक लड़ाई ये दोनों भाई-बहन लड़ नहीं सकते। तो फिर कांग्रेस इस अंधी गुफा से बाहर कैसे निकले? अपने इतिहास से कांग्रेस सीखती क्यों नहीं? जब उसने एक आंदोलन के भ्रूण से जन्म लिया हो तो फिर उसे वातानुकूलित कमरों में वैचारिक मंथन से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। आसपास के व्हाइक कालर सलाहकार को कांग्रेस के पिछले दरवाजे से बाहर भेज देना चाहिए और एक जुझारू, संघर्षशील युवा टीम को खड़ी कर पार्टी को एक आंदोलन की शक्ल देना जरुरी हो गया है। 1857 की क्रांति से अंग्रेज भयभीत हुए पर देश छोड़कर नहीं गए। गरम दल के कांग्रेसी  नेताओं के सामने अंग्रेज शासक और आततायी हो गए और उन्होंने हथियार नहीं डाले, फिर क्या कारण था कि गांधी के असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में क्रांतिकारियों की बिछी जमीन पर ऐसे आंदोलन लड़े कि अंग्रेज 15 अगस्त 1947 को विदा हो गए। संघर्ष और त्याग के मिश्रण से जन्म लेने वाली कांग्रेस न तो आज त्यागी नजर आती है और न ही उसमें कोई संघर्ष का जज्बा है। इसलिए अपनी ही जमीन में गड़े बीजों को कांग्रेस के आज के नेता खोजें और उनको खाद-पानी दें उससे ही नई फसल पैदा होगी। कांग्रेस पार्टी को आदेश-निर्देश, जिंदाबाद-मुर्दाबाद, चमचावाद, वंशवाद, भ्रष्टाचार और निरंकुश, अनैतिक, बेईमान और भ्रष्ट नेताओं की संस्कृति से मुक्त होकर एक नई सोच के साथ पार्टी को खड़ा करना होगा। वार्ड से लेकर मोहल्ले, गांव, नगर, प्रदेश और देश की कांग्रेस इकाइयों का कायाकल्प किए बिना कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी नहीं होगी। शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन घुसाकर खतरों से नहीं लड़ा जा सकता, यह कांग्रेस समझ ले।

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सतीश जोशी

पिछले चालीस वर्षों से पत्रकारिता कर रहे, राजनीतिक विश्लेषक, टिप्पणीकार, नईदुनिया, भास्कर, चौथा संसार सहित प्रदेश के कई समाचार पत्रों के लिए लेखन। 


आदिवासी जनजीवन पर एक पुस्तक, राजनीतिक विश्लेषण पर पांच पुस्तकें, राज रंग, राज रस, राज द्रोह, राज सत्ता, राज पाट।  


रक्षा संवावदाता, रिपोर्टिंग के क्षेत्र में खोजी पत्रकारिता में महारथ हांसिल। प्रेस क्लब इंदौर के अध्यक्ष रहे। वर्तमान में सांध्य दैनिक 6pm के समूह सम्पादक, इंदौर में कार्यरत।


संपर्क : 9425062606