Sunday, April 21, 2019
बीमार धरती मां और इलाज में सुस्त हम

बीमार धरती मां और इलाज में सुस्त हम

मीडियावाला.इन।

प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 19 फरवरी,2015 के दिन,राजस्थान के सूरतगढ़ में कहा था कि अपनी धरती मां बीमार है.हम व्यवस्था कर रहे हैं कि अब किसान को भी पता चले,कि जिस मिट्टी पर वह मेहनत कर रहा है,उस 'मां'(धरती) की तबीयत कैसी है.

वास्तव में भारतीय कृषि-संकट पर अध्ययन और उसके निदान हेतु बने राष्ट्रीय आयोग(स्वामीनाथन आयोग) की सिफारिशों में खेती की जमीन के स्वास्थ्य पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है.

इस आयोग की रिपोर्ट पर,एक साथ तो कभी बात नहीं हुई,किन्तु,पार्टियों की राजनैतिक छवि चमकाने के लिए जरूर,टुकड़ों में घोषणाएं होती रहीं,व योजनाएं एक तरह से जमीन पर डाल दी गईं.

भारत में 'कंसोर्शियम ऑफ़ एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूशंस' (सभी कृषि विश्वविद्यालयों और शोध संस्थाओं के संगठन) ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अपनी धरती माता की बीमारी रोज-रोज बढ़ती ही जा रही है,अतः हम सब इस पर गंभीरता से सोचें.

उन वैज्ञानिकों ने एक आंकड़ा भी दिया था कि भारत की कुल 350 लाख हेक्टेयर भूमि में से लगभग 120 से 140 लाख हेक्टेयर जमीन समस्याग्रस्त है.

जब मैं,अपनी यह बात लिख रहा था,तब मैंने हाल ही में 'पद्मश्री'से सम्मानित मध्य प्रदेश के सतना जिले के किसान श्री बाबूलाल जी दहिया और पिपरिया (मध्यप्रदेश ) के वरिष्ठ पत्रकार,जो उतने ही अच्छे किसान भी हैं,श्री राजेंद्र हरदैनिया से भी बात की थी.उन्होंने बताया कि पूरे मध्य प्रदेश में हम किसान इसे कहते हैं कि 'जमीन नशीली','नशाखोर'या 'नसैड़ी' हो गई है.पैदावार तभी होगी,जब उसमें रासायनिक खाद बड़ी मात्रा में डालेंगे.यानी भूमि तभी सक्रिय होगी,जब वह रसायन लेगी.उसकी प्राकृतिक शक्ति लगभग समाप्त होती जा रही है.किसी कारणवश वह नहीं मिला,या कम मिला,तो उपज भी कम से कम होगी.

जमीन के इसी नशीले,नशाखोर या नसेड़ेपन को वैज्ञानिक अब 'धरा' का बड़ा संकट मान रहे हैं.क्योंकि,इस जमीन में पैदा हुआ अन्न भी अब तो सुरक्षित नहीं है.वह मात्रा में ज्यादा हो सकता है,पर गुणवत्ता में समस्याग्रस्त ही होगा.

आज की तारीख में,हम अपनी जरूरत से ज्यादा अन्न उपजाते हैं.विश्व की कुल भूमि का मात्र 2 .5 प्रतिशत हिस्सा भले हमारे पास हो,किन्तु उस पर कुल मानवता का 16 % हिस्सा और 20 % पशुधन रहता है.इस 'धरा'पर,हम कुल 2720 लाख मी.टन खाद्यान्न उपजाते हैं,जबकि हमारी जरूरत क़रीब बीस लाख टन की है.लेकिन,वर्ष 2030 तक हमें इससे डेढ़ गुना ज्यादा अन्न लगेगा.

चिंता बस इसी बात की है,कि इस बीमार और थकी-हारी हुई जमीन पर यह सब कैसे होगा ? 'सरप्लस' का तमगा तो बस एक दो साल में छिन ही जाएगा.

श्री राजेंद्र हरदैनिया ने अपनी पुस्तक 'समाज,प्रकृति और विज्ञान'में लिखा है कि अधिक उत्पादन के चक्कर में हमने खेती को बहुत जहर पिलाया है.पंजाब के बीमार ग्रामीण और खेत इसके जीवंत उदाहरण हैं.हाल ही 'पद्मश्री'से सम्मानित बाबूलाल जी दहिया कहते हैं कि ज्यादातर किसान,सिर्फ दूकानदार से पूछकर अपने खेत में खाद व दवाइयां डालते हैं,जबकि वह इसके लिए प्रशिक्षित या शिक्षित नहीं है.इनमें से आधे किसान तो उसके उपयोग के लिए जरूरी सावधानियां भी नहीं जानते.इसीलिए धरती,धान्य और धनी(मालिक) सब बीमार हैं.

प्रधानमंत्री ने फरवरी,2015 में धरती के स्वास्थ्य के लिए 'साइल हेल्थ कार्ड' की योजना घोषित की थी.जिसमें प्रावधान है कि किसान को वैज्ञानिक सलाह लिखकर कार्ड में दी जायेगी.सरकार ने कहा है कि इन चार सालों में 18 करोड़ कार्ड बंट गए हैं.इस साल के लिए लक्ष्य है कि 31 मार्च,2019 तक 12 करोड़ से कुछ ज्यादा कार्ड बंटेंगे.किन्तु,जनवरी,19 तक साढ़े सात करोड़ से कुछ कम कार्ड ही बंटे हैं.बाक़ी पांच करोड़ कैसे बंटेंगे,किसी को नहीं मालूम.क्योंकि,तीन राज्यों में सरकारें बदल गई हैं,और कार्डों पर प्रधानमंत्रीजी के साथ तबके मुख्य मंत्रियों के भी फोटो हैं,जो अब नहीं बंट सकते.

इसमें एक 'लोचा'यह भी है कि फसल काटने के बाद,और अगली फसल बोने के पहले मिट्टी के नमूने जांच के लिए लेने होते हैं.लेकिन,खेतों की संख्या और कर्मचारियों या प्रयोगशालाओं की संख्या का अनुपात इतना गड़बड़ है कि यह संभव ही नहीं हो पाता.

अतः 'टारगेट'और 'कृषि-कर्मण'अवार्ड के चक्कर में,सिर्फ आंकड़े भरकर ही धरती की बीमारी दूर हो रही है.

लक्ष्य के अनुसार अभी तक मध्यप्रदेश में ही 313 प्रयोगशालाएं बन जानी थीं,किन्तु 90 ही बन पाई हैं.इसके बावजूद,'साइल हेल्थ कार्ड'के मामले में मध्य प्रदेश सबसे आगे है.

यह तो वह राज्य है,जहाँ एक वर्ष किसी प्राकृतिक कारण से बोनी नहीं हो पाई थी.तो रासायनिक खाद भी कम उपयोग हुआ.इस कारण  'रासायनिक खादों के कम प्रयोग करवाने वाले राज्य' का राष्ट्रीय पुरस्कार यहां के मंत्री और अफसर ले आये थे.

कृषि विस्तार के निहायत देशज गुणी,पद्मश्री बाबूलाल जी दहिया कहते हैं कि हम गाँव-गंवई के लोग तो 'साइल हेल्थ कार्ड'पर क्या लिखा है,यही ठीक से नहीं समझते.सरकारी विस्तार तंत्र, संख्या में तो बहुत बहुत कम है ही,पर उसकी भाषा भी हमसे अलग है.

चार-पांच गाँवों पर एक 'कृषि मित्र'है,पर वह भी सिर्फ सूचना लाता है,धरती की बीमारी का इलाज़ तो वह बिलकुल नहीं जानता.

श्री दहिया एक बड़ी अच्छी बात कहते हैं कि एक ट्रैक्टर जब गाँव में आता है,तो वह बीस बैलों को खेती से बाहर करता है.यानी,उसकी मेहनत से लेकर जैविक खाद तक के उसके योगदान से हम वंचित होते हैं.ऐसी बहुत सी हमारी अपनी सम्पदाएँ हैं,जिन्हें हम ज्यादा उत्पादन के चक्कर में गुमाते जा रहे हैं.

विज्ञान के वरेण्य शिक्षक डॉ.कपूरमल जैन इस परिस्थिति को 'धरती का बुखार'कहते हैं.हमारी सारी आपदाओं,चाहे वह केरल की बाढ़ हो या उड़ीसा का सूखा,इसके पीछे यही बुखार है,जो निश्चित रूप से हमारे अविवेक के कारण आया है.

एक दुखी कृषि विशेषज्ञ ने तो यहाँ तक कहा है कि हमारी खेती-बाड़ी या यह धरती राजनेताओं के विश्वासघात,अफसरों की अज्ञानता,बिचौलियों के शोषण,बौद्धिक समाज की घृणा और प्रकृति की ठगी के कारण भी बीमार है.

चूँकि चीजें बहुत दूर तक जा चुकी हैं,पीछे लौटने की गुंजाइश कम ही दिखती है,इसलिए सोचना तो हम सबको (इसमें सब,यानी सब -नेता,अफसर,पत्रकार,व्यापारी,न्यायविद शिक्षक,साधू-संत,पंडित,मौलवी,और मज़दूर ) ही पड़ेगा,क्योंकि आप सबको,हमेशा हमेशा रोटी ही खाना है.यह किसी की भी आलोचना नहीं है.जागने का आग्रह मात्र है.

0 comments      

Add Comment


कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...