Monday, December 10, 2018
काँग्रेस का गुरूर ही कहीं उसे ले न डूबे

काँग्रेस का गुरूर ही कहीं उसे ले न डूबे

अखिलेश यादव का यह कदम मौका देखकर चौका नहीं अपितु आहत मन से किया गया जवाबी प्राहार है।  मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड इलाके की एक सभा में उन्होंने टिकट वंचित काँग्रेस नेताओं को समाजवादी पार्टी से लड़ने का न्योता दे दिया। काँग्रेस वैसे भी भगवान की बनाई पार्टी है और इसमें दैवीय शक्ति वाले नेता हैं। ये काँग्रेस में जन्म ही चुनाव लड़ने के लिए लेते हैं। सो पार्टी सभी देवों को टिकट तो दे नहीं पाएगी सो काँग्रेस को सबक सिखाने के लिए सपा सुप्रीमो  ने ऐसा निर्णय लिया है। सर्वे नतीजों ने कांग्रेस की पतंग को चंग पर चढ़ा रखा है लिहाज़ा वह मध्यप्रदेश में अपने जमीनी साथियों से मुँह फेरे चल रही है। अखिलेश को उम्मीद थी कि यूपी की तरह यहां भी "ये दोस्ती अच्छी है" जारी रहेगी। बुधनी के सपा प्रत्याशी प्रकरण से उन्हें "दोस्ती" का मतलबी चेहरा देखने को मिल गया। 

पहले मायावती और अब अखिलेश यादव  ने गठबंधन को धता बताकर मध्यप्रदेश की सभी सीटों से प्रत्याशी उतारने का ऐलान किया है। दोनों ने ही गठबंधन को विफल बनाने के लिए काँग्रेस को दोषी ठहराया। काँग्रेस के लिए इन दोनों की प्रतिक्रयाओं का अंतरनिहित भाव यही था कि "रस्सी जल गई ऐठन नहीं गई"।

हवाओं का रुख देखते हुए काँग्रेस मध्यप्रदेश में अपने पुराने गुरूर पर है। बसपा को तो वह गठबंधन योग्य मानती भी थी लेकिन समाजवादी पार्टी को तो यहां विचार करने लायक भी नहीं मानती। दरअसल काँग्रेस चुनावी सर्वे से मुदित है कि इसबार उसकी सरकार बनने जा रही है। इसलिए छोटे दलों का यह धर्म बनता है कि वे ही काँग्रेस के आगे जाकर गठबंधन की याचना करें। गोंगपा और जयस भी पहले संभावित गठबंधन के घटक थे अब इन्होंने भी अपने-अपने उम्मीदवारों की सूचियां जारी कर दी हैं। गठबंधन अब यह मुश्किल ही है।

बसपा से गठबंधन न होने की बात समझ में आती है क्योंकि कि उत्तरप्रदेश के अनुभवों के आधार पर उसका साथ घाटे का सौदा था। बसपा चूँकि कांग्रेस के जनाधार के गर्भ से निकली है तथा परस्पर एक दूसरे के खिलाफ लड़ते हुए खटास इतनी बढ़ चुकी है कि गठबंधन की सूरत में वोटों की अदला-बदली संभव नहीं। बसपा का सबसे पुख्ता जनाधार विंध्य में है और संदर्भ के लिए यह भी जानते हुए चलना चाहिए कि वह यहाँ के दोनों कद्दावर नेताओं अर्जुन सिंह और श्रीनिवास तिवारी को क्रमशः सतना और रीवा की सीटों से हरा चुकी है। इसलिए जिस किसी ने बसपा से समझौते पर टाँग अड़ाई है उसे पार्टी का हितैषी ही समझना चाहिए।

अब जहां तक रही बात अखिलेश यादव के समाजवादी पार्टी के वजूद को नकारने की वह काँग्रेस के हित में नहीं है। एक बात नोट करके चलना चाहिए कि विंध्य और महाकौशल के जो भी बड़े कांग्रेसी हैं(भाजपाई भी) उनमें से प्रायः की पृष्ठभूमि समाजवाद की रही है। यहां की जमीन में समाजवाद के बीज कहीं न कहीं जिंदा हैं। विंध्य और बुंदेलखंड में खासतौर पर। सपा ने सीधी की गोपदबनास/सिंहावल सीट से जिन केके सिंह की सीट की घोषणा की है वो मायने रखती है। केके सिंह अजय सिंह राहुल के ताऊ रणबहादुर सिंह के बेटे हैं। एक बार निर्दलीय और एक बार सपा की टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं। रणबहादुर सिंह 72 में निर्दलीय सांसद रह चुके हैं। केके सिंह का सपा की टिकट से चुनाव लड़ना सीधी जिले में अजय सिंह राहुल के प्रभाव को समेटेगा ही। सतना की मैहर सीट से नारायण त्रिपाठी पहली बार सपा की टिकट पर ही जीते थे। रीवा सतना में सपा का सोया हुआ जनाधार है और ऐसे में टिकटवंचित कोई कद्दावर कांग्रेसी उतरता है तो वह काँग्रेस का ही खेल बिगाड़ेगा और भाजपा की जीत आसान होगी।

विंध्य के बुंदेलखंड हिस्से से लगभग हर विधानसभा में कोई न कोई सपा विधायक रहा है। सत्यव्रत चतुर्वेदी ने जब (93-98) में दिग्विजय सिंह से विवाद के चलते त्यागपत्र दिया था तब चँदला के उस उप चुनाव में सपा के विजय बहादुर सिंह बुंदेला जीते थे। इस क्षेत्र की कई और सीटों पर भी सपा का जनाधार है भले ही न जीते पर वोट कांग्रेस का ही तितर बितर होगा।

मध्यभारत में बैतूल से सुनीलम सपा के बड़े स्तंभ हैं। दो बार चुनाव जीतकर आ चुके हैं। बैतूल जिले की सभी सीटों पर उनका प्रभाव है। वे इसबार दमदारी से चुनाव लड़ेगे। बालाघाट में कंकर मुंजारे सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं। जब वे निर्दलीय लोकसभा और विधानसभा में जीतने की हैसियत रखते हैं तो समाजवादी पार्टी उनके प्रभाव को बढ़ाएगी ही बढ़ाएगी। सो इस बार अखिलेश यादव ने चुपचाप अपने प्रत्याशियों की जिसतरह गोटी फिट की है यह उनके रणनीतिक कौशल का कमाल है।

आज जब कोई लहर नहीं चल रही है ऐसी स्थिति में सपा जैसे दल गेमचेंजर साबित होंगे इस बार खासतौर पर। अखिलेश का बागी काँग्रेसियों को सपा से लड़ने हेतु न्योतने के पीछे मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र बुधनी है। यहां से जिन अर्जुन आर्य की सपा से टिकट की घोषणा की गई थी उन्होंने हाल ही यह कहते हुए टिकट लौटा दी कि शिवराजसिंह चौहान को हराने में वे कांग्रेस का साथ देंगे। शांत मिजाज वाले अखिलेश यादव को भड़काने के लिए यह कदम पर्याप्त था। जाहिर है इस खुरपेंच के पीछे काँग्रेस ही थी। यह वही काँग्रेस है जिसे उत्तरप्रदेश के पिछले विधानसभा में अखिलेश यादव ने गले लगाते हुए "यह दोस्ती अच्छी है" का नारा दिया था। काँग्रेस के अहंकारी नेताओं ने अखिलेश यादव की सदाशयता का लिहाज नहीं रखा सो अब सपा के पास खेल बिगाड़ने के लिए खुला मैदान है। खुदा न खास्ता यदि वे बसपा के साथ गठबंधन कर ले जाते हैं और गोंगपा, जयस जैसे संगठनों को साधने में सफल रहते हैं तो उन्हें मध्यप्रदेश में तीसरी ताकत बनने से कोई रोक नहीं सकता। ठहरी हुई हवा से निकला जनमत किसे कहां बैठाता है ये सर्वे और चुनावी पंडित भी नहीं बता सकता वह सत्ता के दरवाजे के चाभी तीसरी ताकत के पल्लू में भी बाँध सकता है।

बहरहाल अखिलेश यादव के आह्वान को यदि काँग्रेसी नेतृत्व कमतर करके आँकता है तो लह मुगालते में है। काँग्रेस में  कार्यकर्ता व काडर नाम की प्रजाति तो होती नहीं, यहा सब नेता ही होते हैं, सभी चुनाव लड़ने के लिए राजनीति करते हैं ऐसे में आप देखेंगे कि बड़ी संख्या में कांग्रेस के टिकटवंचित नेताओं का रुख सपा की ओर होगा। इन नेताओं की स्थानीय ताकत और सपा का आभामंडल चुनाव नतीजों को चौंका सकता है।

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