Monday, October 22, 2018
मतदाता की कसौटी पर कसे जाने का पर्व है चुनाव

मतदाता की कसौटी पर कसे जाने का पर्व है चुनाव

बज गया है। मतदाता की अहमियत का पर्व और मानमुनव्वल का जश्न शुरु होने वाला है। वादे, दावे की महफिल सजने वाली है। सरकार कसौटी पर कसी जाएगी, विपक्ष की सजगता, संघर्ष भी तोला जाएा। हर पांच वर्ष में आने वाला यह पर्व लोकतंत्र की जीत लेकर आया है। कोई भी जीते, कोई भी हारे पर जनादेश दुनिया में हमारे परिपक्व लोकतंत्र के झंडे गाड़ता रहा है, इस बार भी यही होगा। आचार संहिता लग चुकी है, मुख्यमंत्री से लेकर सभी मंत्री अब सिर्फ कामचलाऊ सरकार के प्रहरी हैं। राजनेताओं के दबदबे की प्रतीक सरकारी कारें गैरेज में लौट गई हैं। मतदाता ही फैसला करेगा कि ये किनके दरवाजे की शोभा बनेंगी। इसका फैसला 11 दिसबंर को वीवीपेट मशीनों की गिनती ही करेगी।

बहरहाल मध्यप्रदेश का डेढ़ दशक का भगवा शासन जनता की कसौटी पर कितना खरा उतरा है, इस पर खूब वार-प्रति-वार होगा। सरकार पर नाकारा होने के तीर चलेंगे तो सरकार चलाने वाले अपनी उपलब्धियों के भाले फेंककर अपने रणवीर होने के अनथक चुनावी राग छेड़ेंगे। सत्ता संचालन करते किए वादे पूरे करने के प्रमाण गीत सुनाई देंगे, पुन: वापसी के जनदरबार में नए दावे, वादे के सुर साज पर बजाए जाएंगे। पिछले रण में खेत रहे रणबांकुरे रण जीतने वालों के चिट्ठे लिए नए गीत सजाएंगे। जनता को इसकी भी सुननी और उसकी भी सुननी है। अपनी ईमानदार कसौटी पर प्रदेश के पांच साल के भाग्य का फैसला करना है।

फैसले की घड़ी तो आएगी ही मगर उसके पहले हर राजनीतिक दल के भीतर एक संग्राम छिड़ेगा। हर बार की तरह विधायक अपनी उपलब्धियों के आधार पर पुन: जनता का आशीर्वाद मांगने की कतार में आना चाहेगा। नया कार्यकर्ता पार्टी के लिए किए काम, जनता के बीच जनसमस्याओं और पार्टी कार्यक्रमों की उपलब्धियों के आधार पर रण जीतने की दावेदारी करेगा। यह कसरत सभी राजनीतिक दलों में होती रही है, फिर होगी। सत्ताधारी दल हो या प्रतिपक्ष सभी इस प्रक्रिया से गुजरकर चुनाव के लिए फौज खड़ी याने उम्मीदवार खड़े करते हैं। यह फौज अपने ही मित्रों के भरोसे मैदान में उतरती है। इनमें कुछ एेसे भी होते हैं जो भीतरघाती बन जाते हैं, कुछ बागी होकर नया झंडा थाम लेता है। कल तक जिनकी वंदना गीत गाते रहे वे निंदा कव्वाली गाते दिखेंगे। हर पार्टी में सिद्धू अवतार ठहाके लगाते रहे हैं, यह भी चुनावी रंग है, जो इस बार भी खूब बिखरेगा। 

कुल मिलाकर राष्ट्रीय, प्रादेशिक नेताओं की बड़ी-बड़ी रैलियां होंगी, मुद्दे मूल विषय बनते हैं या नहीं उम्मीद कम ही है। आरोप-प्रत्यारोप के बेसूरे राग, कोसते राजनेता और चौराहे-चौराहे पर आकाओं के लिए लड़ते प्यादे सरफुटव्वल करते, कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाते दिखेंगे। तंत्र की निष्पक्ष होने की नाकारा कोशिशें, इस या उस के पक्ष में दिखने के दृष्य भी खूब उभरेंगे। चुनाव मशीनरी के लिए भी यह अनुशासन पर्व है। उसके लिए साफ सुथरे चुनाव कराने की महती जिम्मेदारी है, निन्यान्वे प्रतिशत तंत्र इस पर खरा उतरता रहा है। देश दुनिया में हमारी चुनाव प्रक्रिया प्रतिष्ठा पा चुकी है। इसीलिए, चुनाव मशीनरी, प्रशासन, पुलिस, मतदाता, राजनेता, राजनीतिक दल, मीडिया के सभी घटक के लिए लोकतंत्र की जीत का यह पर्व शुरु हो चुका है। सबसे महती भूमिका आम आदमी की है जो सबको कसौटी पर कसकर अपने ही पांच वर्ष का भाग्य लिखने वाला है। इसका बिगुल बज चुका है.......कसौटी पर हम सब हैं। 

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सतीश जोशी

पिछले चालीस वर्षों से पत्रकारिता कर रहे, राजनीतिक विश्लेषक, टिप्पणीकार, नईदुनिया, भास्कर, चौथा संसार सहित प्रदेश के कई समाचार पत्रों के लिए लेखन। 


आदिवासी जनजीवन पर एक पुस्तक, राजनीतिक विश्लेषण पर पांच पुस्तकें, राज रंग, राज रस, राज द्रोह, राज सत्ता, राज पाट।  


रक्षा संवावदाता, रिपोर्टिंग के क्षेत्र में खोजी पत्रकारिता में महारथ हांसिल। प्रेस क्लब इंदौर के अध्यक्ष रहे। वर्तमान में सांध्य दैनिक 6pm के समूह सम्पादक, इंदौर में कार्यरत।


संपर्क : 9425062606