Monday, December 10, 2018
जनता ने सबको मौका दिया मगर जनता को आगे बढ़ने का मौका किसी ने नहीं दिया

जनता ने सबको मौका दिया मगर जनता को आगे बढ़ने का मौका किसी ने नहीं दिया

2009 में यूपीए टू के आने से पहले की बात है। राहुल गांधी उत्तराखंड के दौरे पर थे। स्टूडेंटों के बीच। आरक्षण का सवाल उन दिनों भी बहुत गर्म था। छात्रों में नाराजगी भी थी और कई सवाल भी। राहुल उन दिनों कांग्रेस के महासचिव थे और एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस का काम देख रहे थे। राहुल ने छात्रों से कहा कि समस्या आरक्षण नहीं मौकों की कमी है। अगर ज्यादा उच्च शिक्षण संस्थाएं हों, मेडिकल और इंजीनियरिंग कालेज हों तो सबकों मौका मिलेगा।

दूसरा उदाहरण। उसी दौरान राहुल यूपी और बिहार में भी जगह जगह दौरे कर रहे थे। जहां वे कहते थे कि इन राज्यों के मजदूर दिल्ली बना रहे हैं। कामनवेल्थ खेलों के पहले की बात है। राहुल कहते थे कि कामनवेल्थ के स्टेडियम, मेट्रो, फ्लाई ओवर यह सब यूपी बिहार का मजदूर बना रहा है। दिल्ली को बनाने वाले यहां के मेहनतकश लोग है।

यह पुरानी बातें राहुल गांधी के हाल ही के एक प्रोग्राम में सुन कर फिर याद आ गईं। राहुल ने कहा कि अगर हम सत्ता में आते हैं तो हमारा मुख्य काम एक नई कम खर्चीली उच्चस्तरीय शिक्षा व्यवस्था का मूल भूत ढांचा खड़ा करना होना चाहिए।

बहुत अच्छी बात है। मगर जैसा कि पहले दो उदाहरणों में बताया कि राहुल शिक्षा और मेहनतकश लोगों के बारे में पहले भी बात करते और अपनी चिंता व्यक्त करते रहे हैं। लेकिन फालोअप नहीं हुआ। आज राहुल गांधी विपक्ष में हैं। लेकिन इससे पहले जब वे उत्तराखंड के छात्रों को भरोसा दिला रहे थे कि ज्यादा मौके उपलब्ध कराकर उनके एडमिशन न होने और नौकिरयों की समस्या का हल किया जा सकता है। या यूपी बिहार के मजदूरों और उनके परिवारों से कह रहे थे दिल्ली बनाने के लिए उनका जो योगदान है हम उसके लिए आपका आभार व्यक्त करते हैं। और आपके लिए कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन कुछ हुआ नहीं। इसकी वजह क्या राजनीतिक इच्छा शक्ति का कमी है? या चीजों को गंभीरता से नहीं लेना है? या राजनीतिक और प्रशासनिक तौर पर फालोअप में दिलचस्पी नहीं लेने की हमारी स्वभावगत समस्या है? कारण कोई भी हो यह किसी नेता विशेष या खास राजनीतिक दल से जुड़ी चीज नहीं है। बल्कि हमारे राजनीतिक सिस्टम की बड़ी कमी है।

जिस समय राहुल यूपी बिहार के मजदूरों के श्रम का रोज महिमागान कर रहे थे। उन दिनों दिल्ली में भी कांग्रेस की सरकार थी। महिला और पुरुष मजदूर मेट्रो और फ्लाईओवर बना रहे थे और उनके बच्चे वहीं धूल में खेल रहे होते थे। राज्य सरकार चाहती तो उन बच्चों के लिए मोबाइल स्कूल और क्रेच चला सकती थी। लेकिन राहुल के मजदूरों के लिए कुछ करने की बातों का असर कांग्रेस की शीला दीक्षित सरकार पर नहीं पड़ा। विडबंना यह है कि उसी समय कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार राइट टू एजुकेशन बिल तैयार कर रही थी लेकिन बच्चों की पढ़ाई से लेकर मजदूरों के लिए शाम और रात के प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र चलाने में दिल्ली सरकार ने कोई दिलचस्पी नहीं ली। देश भर में काम की तलाश में आए सैंकड़ों मजदूर रोज दिल्ली के रेल्वे स्टेशनों पर उतरते हैं। प्लेटफार्मों और स्टेशनों के बाहर रात गुजारतें हैं। उनके अल्प प्रवास के लिए मजदूर सराय जैसी किसी चीज को बनाने पर भी कभी विचार नहीं किया जाता।

हिन्दी बेल्ट के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़  के चुनाव की घोषणा हो गई है। तीनों राज्यों में बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है। शीक्षित बेरोजगारों के पास तो काम है ही नहीं मगर मजदूरों, भूमिहीन कृषकों और छोटे किसानों की हालत सबसे ज्यादा खराब है। इन विधानसभा चुनावों में नेता इन गरीबों के लिए बड़ी बड़ी बातें करेंगे। गरीब को लगेगा कि बस फलां नेता और पार्टी के जीतते ही उसके दिन फिरने लगेंगे। मगर हमेशा की तरह यह फिर एक छलावा साबित होगा।

पिछले कुछ सालों में समय चक्र ऐसा घुमा है कि हर राजनीतिक दल को और नए लोगों को भी काम करने का, सरकार में आने का मौका मिल गया। दिल्ली में विधानसभा बनने के बाद भाजपा, कांग्रेस और अब आप की अलग अलग तरह की राजनीतिक विचारधारा से शासन संचालित हुआ। इसी तरह यूपी में सपा, बसपा, भाजपा और उससे पहले कांग्रेस सरकारें बना चुकी हैं। केन्द्र में भी सभी पार्टियों को मिलीजुली सरकारों को मौका मिला। मगर वह सवाल वैसा का वैसा ही रहा कि नेता और सियासी दलों के कहने और करने में इतना फर्क क्यों हैं? जिन पिछले तीस- पेंतीस सालों की मिसाल यहां दी जा रही है उसमें कथनी और करनी में फर्क क्यों नहीं मिटा?

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चार साल पहले भारत के संदर्भ में एक बहुत जरूरी योजना स्वच्छता अभिययान की शुरूआत की थी। वे लगातार इस पर जोर भी देते रहे। मगर सफाई का जो कान्सेप्ट विकसित होना चाहिए था नहीं हुआ। सड़कों पर थूकने से लेकर, गंदगी फैलाने की एक आदत भी हम भारतीय नहीं छोड़ पाए। मेट्रो जब बना तो विश्वस्तरीय था। मगर अब वहां भी सफाई से लेकर सुरक्षा, ट्रेनों के संचालन और दूसरी कई समस्याएं सिर उठाने लगी हैं। अगर कड़ाई नहीं बरती गई तो मेट्रो भारतीय रेल और ब्लूलाइन बसों का मिलाजुला रूप बन जाएगा। 

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शकील अख्तर

शकील अख्तर दिल्ली के जाने माने पत्रकार और नवभारत टाइम्स समेत देश के कई राष्ट्रीय अखबारों में पत्रकार रह चुके है.


संपर्क : 9818813244