Wednesday, December 12, 2018
ये है गांधीगिरी का चमत्कार !

ये है गांधीगिरी का चमत्कार !

बाजार में अफीम की भाजी तो आ नहीं रही मतलब इसकी फसल का सीजन नहीं है।फिर ये मंदसौर में कौनसी नशीली हवा चल पड़ी कि शासकीय पीजी कॉलेज के प्राध्यापक दिनेश गुप्ता के डील में बापू की सवारी आ गई।जिस तरह का वीडियो दो दिन से धूम मचाए हुए है उसे देखकर तो यही लगता है कि प्रोफेसर साब केमिकल लोचे का शिकार हो गए हैं। वॉयरल वीडियो देखकर और मंदसौर के मित्रों से बातचीत में मुझे पता चला कि प्रोफेसर गुप्ता की परेशानी यह थी कि जब वे पढ़ा रहे थे तब ही राष्ट्र भाव में गले गले तक डूबे बच्चे भारत माता के नारे लगाते देशप्रेम का अलख जगाने पहुंच गए थे।सारा देश जब पेट्रोल-डीजल, रॉफेल मुद्दे, पप्पू-गप्पू के किस्सों पर हर दिन मुफ्त मिल रहे डेढ़जीबी डाटा का जी भर के उपयोग करने में मशगूल हो ऐसे में इन बच्चों के भारत माता प्रेम पर अंगुली उठाना राष्ट्र द्रोह की नजर से ही तो देखा जाएगा, और यह काम भी एक शासकीय कॉलेज का प्रोफेसर करे, इसकी तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।एक तरफ सरकारें निजीकरण की नींव मजबूत करने में लगी हैं और सरकारी कॉलेज के ये प्रोफेसर साहब इसलिए पगला गए कि बच्चों की नारेबाजी से पढ़ा नहीं पा रहे थे ! सरकारी कॉलेज में कोई इतनी निष्ठा से पढ़ाता है क्या? 

मंदसौर के सांसद और जनभागीदारी समिति सदस्य-विधायक ने कम से कम अब एक अभिनंदन समारोह आयोजित कर प्राध्यापक संघ के पदाधिकारियों का सम्मान करना चाहिए जिन्होंने कल के कल में बिना जांच पड़ताल जैसी नाटक-नौटंकी में समय गवाए डॉ आरके सोनी और डॉ दिनेश गुप्ता को अपने संघ की जिला इकाई के अध्यक्ष, सचिव पद से मुक्त कर के अपने उजले बैनर को दागदार होने से बचा लिया।उच्चशिक्षा मंत्री पवैया ही क्यों मुख्यमंत्री को भी महात्मा गांधी का दिल से आभार मानना चाहिए कि गांधीगिरी ने प्रोफेसर दिनेश गुप्ता की जान बचा ली, नहीं तो जनआशीर्वाद यात्रा को बीच में छोड़कर सीएम को और उनके बाद कमल-ज्योति वगैरह को बैठने आना पड़ता। उज्जैन में माधव कॉलेज के प्रो सबरवाल की तो जान गई ही इसलिए कि तब गांधीगिरी के चमत्कार किसी को पता ही नहीं थे।

सरकार को तो जश्न मनाना चाहिए कि किसान आंदोलन-गोलीकांड वाले मंदसौर में एक प्रोफेसर के इस पगलेपन को शहर ने गंभीरता से नहीं लिया। प्राध्यापक संघ से बाहर का रास्ता दिखाने के पहले कम से कम प्रो गुप्ता से पूछना तो था कि दस-पंद्रह किताबें लिखने के बाद कॉलेज में पढ़ाने की ऐसी क्या हाय पड़ी थी। न तो ई अटेंडेंस का रिकार्ड रखा जा रहा है और सरकार रोज रिपोर्ट भी नहीं मांग रही है किसने पढ़ाया, किसने स्टॉफ रूम में टाईम पास किया, सेलरी तो उन सब को भी मिलती है जो पढ़ाने का झंझट मोल नहीं लेते और जनभागीदारी समिति के सदस्यों से रिश्ते प्रगाढ़ करने में लगे रहते हैं। 

लगता है डेढ़ दर्जन किताबें लिखने के बाद भी छात्रों के दिलों में गुप्ता सर के प्रति वो सम्मान भाव नहीं उमड़ा था कि चरण रज लेने के लिए दौड़ पड़ें।इस वीडियो के वॉयरल होने के बाद शिक्षा जगत के ठहरे हुए पानी में हलचल तक ना होना बता रहा है कि गुप्ता सर का ये पब्लिसिटी स्टंट सबकी समझ में आ गया है।एबीवीपी को भी संतोष करना चाहिए कि जेएनयू में भले ही उसे छात्रसंघ चुनाव में कामयाबी नहीं मिली हो लेकिन डूसु (दिल्ली विवि छात्रसंघ)में मिले बहुमत के बाद मप्र में उसके संगठन की जड़े इतनी मजबूत तो हो गई हैं कि अब प्रोफेसर भी देशद्रोही वाली कालिख से अपना मुंह बचाने  के लिए उसकी चरणवंदना करने लगे हैं।छोटे छोटे शहरों के प्रेरक प्रसंगों को ‘मन की बात’ में शामिल करने वाले पीएमजी को मंदसौर की इस अभूतपूर्व घटना को गांधीजी की डेढ़सौवीं जयंती वाले ग्लोबल इवेंट  के प्रसंगों में शामिल करना चाहिए ताकि अब तक भी जो लोग गांधी को अप्रासंगिक मानते रहे हैं उन्हें विश्वास हो सके कि गांधीगिरी करने के कारण कैसे हार्ट के पेशेंट प्रोफेसर की जान बच गई।गांधीवादियों को तो इस चमत्कारी घटना के पर्चे छपवाकर लोगों से अनुरोध करना चाहिए कि शिक्षा जगत से जुड़े परिवारों में जो भी ऐसे पर्चे छपवाकर बंटवाएगा उसकी सात पीढ़ियों में कोई अकाल मृत्यु का शिकार नहीं होगा।   

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कीर्ति राणा

क़रीब चार दशक से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा लंबे समय तक दैनिक भास्कर ग्रुप के विभिन्न संस्करणों में संपादक, दबंग दुनिया ग्रुप में लॉंचिंग एडिटर रहे हैं।

वर्तमान में दैनिक अवंतिका इंदौर के संपादक हैं। राजनीतिक मुद्दों पर निरंतर लिखते रहते हैं ।

सामाजिक मूल्यों पर आधारित कॉलम ‘पचमेल’ से भी उनकी पहचान है। सोशल साइट पर भी उतने ही सक्रिय हैं।


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