Thursday, October 24, 2019
ब्रजेश राजपूत की पिछली किताब

ब्रजेश राजपूत की पिछली किताब

मीडियावाला.इन।

भोपाल में एबीपी न्यूज के संवाददाता ब्रजेश राजपूत ने अपनी अगली किताब के आने की सूचना आज दी तो किश्तों में पढ़ी पिछली किताब को पूरा करने आज बैठा-"ऑफ द स्क्रीन।' यह 75 कहानियाें का संग्रह है। एक पत्रकार की दिन भर की दौड़धूप का रोजनामचा। पत्रकारिता की पहली कक्षा के विद्यार्थियों को इनके जरिए यह जानने में मदद मिलती है कि एक टीवी रिपोर्टर रोजमर्रा की खबरों को बटोरने के लिए जूझता कैसे है? यह रोज कुआं खोदकर रोज पानी पीने जैसा है। अगले दिन फिर वही। आम लोगों को लगता है कि मीडिया में काम करने वालों की जिंदगी में राेज ही कुछ नया है, लेकिन यह बात उतनी सच नहीं है। बाकी पेशों की तरह मीडिया में भी रोज-रोज एक ही तरह की चीजें करते-करते जिंदगी उतनी ही नीरस, उबाऊ और मशीनी है।

 ये कहानियां एक तरह से एक रिपोर्टर के डायरी नोट्स हैं। जैसे किसी तूफान की रिपोर्टिंग में किन कठिनाइयों के बीच फुटेज लिए, असुविधाओं के बावजूद काम किया और सब कुछ नष्ट होने के बाद कैसे कई किलोमीटर दूर जाकर टीवी पर प्रसारण योग्य माल भेज पाए। भोजशाला जैसे विवादों के कवरेज में कैसे पूजा और नमाज के तनावों के बीच कैमरा-माइक चालू रहा। केबिनेट के विस्तार के समय एक मुख्यमंत्री कैसे खबरें बांटते हैं। इन कहानियों में मुख्यमंत्री हैं। विपक्ष के नेता हैं। उनकी यात्राएं हैं। अफसर हैं। आम लोग हैं। उनके साथ एक रिपोर्टर की अनिवार्य चहलकदमी भी। वे खबरें हैं, जो एबीपी न्यूज चैनल के बुलेटिनों में देखी गईं। देखी गई खबरों के पीछे की भागमभाग इन कहानियों में नजर आएगी। किसी ग्लैमर के कारण पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए आए रिपोर्टर का इससे मोहभंग भी हो सकता है।

 ये कहानियां ब्रजेश की दो दशक से ज्यादा लंबी पत्रकारीय यात्रा का प्रसाद हैं। पुस्तक की थाली में रखकर यह प्रसाद हमारे सामने आया। इन कहानियों पर काम की तपस्या के खट्‌टे-मीठे फल ब्रजेश ने चखे हैं। मीडिया में जो लंबे समय टिके हैं, वे ही जानते हैं कि एक जगह एक ही भूमिका में इतना लंबा समय बिताने के लिए असीम धैर्य चाहिए और यह हर किसी के बूते की बात नहीं। यह ऐसी दुनिया है, जहां आप दो-तीन साल में ही एक भूमिका में ऊब जाते हैं और कुछ नया करने की चाह भटकाती रहती है। तब पत्रकारिता एक उबाऊ और मशीनी काम नहीं रह जाती। इस लिहाज से ब्रजेश का धैर्य काबिले-तारीफ है। इन बरसों में चैनल स्टार से एबीपी हो गया। ऊपर कई आए-गए। लेकिन एक जगह अपने काम में इतने बरसों तक अपनी पहचान को बनाए रखना किसी तप को साधने जैसा काम है। जैसे सिंहस्थ में मई की गरमी मंे चारों तरफ आग के गोलों के बीच तपता कोई सिद्ध पुरुष!

  मैं इस लिहाज से ब्रजेश को मध्यप्रदेश की टीवी पत्रकारिता का दादा साहब फालके मानता हूं। उनके साथ और उनके बाद टीवी में आए बहुत चेहरे थोड़े साल बाद ही मैदान छोड़ दिए। शहर बदल लिए। हो सकता है मीडिया को ही नमस्कार कर दिया हो। एक ही भूमिका में धरती पकड़ पारी में दूसरा जाना-माना नाम मनोज शर्मा हैं। संयोग ही है कि दोनों एक ही शहर के हैं। भोपाल की रिपोर्टिंग में ये दोनों हुनरमंद और मिलनसार पत्रकार अक्सर एक ही साथ दो जिस्म एक जान की तरह देखे जाते रहे हैं। लेकिन ब्रजेश ने अपनी सतत् लेखनी से टीवी के ज्यादातर पत्रकारों में पहचान बनाई है। यह उनके समानांतर परिश्रम का ही फल है।

   ब्रजेश की इन आपबीतियों में मुद्दों के विश्लेषण नहीं हैं। बेहद गंभीर विषय में भी गोते बहुत गहरे नहीं हैं। विषयों का परिप्रेक्ष्य शायद ही मिले। राजनीति या समाज को समझने की कोशिश भी शायद नजर न आए। भाषाई कमाल दिखाने में भी लेखक की दिलचस्पी नहीं है। यही ब्रजेश की ताकत है कि वे अपने कवरेज में जैसे स्वयं ग्राउंड पर मौजूद रहे और जो कुछ देखा-सुना-समझा, उसे ही सामने रखा। इन कहानियों को लिखते समय उनके दिमाग में अपना टारगेट ग्रुप स्पष्ट रहा होगा। वे पत्रकारिता के विद्यार्थियों से ही रूबरू हैं। इसलिए अगर आप इनमें देश या समाज को समझने की उम्मीद से उतरेंगे तो मायूस हों लेकिन एक विद्यार्थी की आंख से देखेंगे तो अगली कहानी तक जा पाएंगे। यह विशुद्ध रूप से विद्यार्थियों को केंद्र में रखकर बांटे गए अनुभवों का दस्तावेज है।

  अगली किताब की सूचना मिली है। उसे पढ़ूंगा। राजनीति और ब्यूराेक्रेसी को इतने निकट से देखने का अनुभव कम लोगों को होता है। ब्रजेश का एक मित्र, प्रशंसक और पाठक होने के नाते मेरी अपेक्षा होगी कि वे अपने लंबे पत्रकारीय अनुभव से मध्यप्रदेश की विकास यात्रा का एक निर्मम दस्तावेज लिखें। साठ साल की यात्रा में इस राज्य ने अपनी क्षमताओं के अनुरूप क्या पाया, क्या खोया? इन 25 सालों में ही दो पार्टियों की दस-पंद्रह साल टिकी सरकारें ब्रजेश की पत्रकारीय यात्रा में रही हैं। उत्तर भारत के दूसरे शहरों की तरह बदहाली से घिरे हमारे गांव-शहर सबूत हैं कि राजनीतिक दूरदृष्टि और इच्छाशक्ति का किस कदर अकाल रहा है। बांध विस्थापन इस दौरान एक सतत् सामयिक मुद्दा रहा है, जिस पर नीति निर्णायकों की एकमुश्त नाकामी स्पष्ट है। गैस हादसा सन् 84 की एक भूली-बिसरी घटना नहीं है। वह आज तक एक कलंकित अध्याय है। लिखने के लिए ऐसे कई विषय आज भी हरेक कलमनवीस को खुला आमंत्रण हैं।

 मैं मानता हूं कि ब्रजेश का सर्वश्रेष्ठ पढ़ा जाना अभी बाकी है। उम्मीद करें कि आने वाले समय में बड़े कैनवास पर हम उनकी कलम का कमाल देखेंगे, जिनमें जनकेंद्रित, ज्वलंत और जरूरी मुद्दों की चीरफाड़ होगी। टिकाऊ और गौरतलब वही होगा। समय की रेत पर वे निशान कुछ अधिक उम्र पाएंगे। सत्ता शिखरों और एकदम जमीनी सचाइयों के निकट बिताए इतने लंबे समय के गर्भ से कुछ तो ऐसा ठोस आना ही चाहिए, जो विचारोत्तेजक हो, चिंतन योग्य हो, कम से कम तात्कालिक न हो।

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विजय मनोहर तिवारी

मध्यप्रदेश में सागर जिले के मंडी बामौरा नाम के कस्बे में पैदा हुए। स्कूली पढ़ाई मंडी बामौरा और शिवपुरी में की। 1991 में विदिशा के एसएसएल जैन पीजी कॉलेज से गणित में फर्स्ट क्लास फर्स्ट एमएससी के बाद एक साल कॉलेज के गणित विभाग में पढ़ाया। लेकिन लिखने का शौक मीडिया में ले लाया। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि के दूसरे बैच के टॉपर हैं। दिल्ली में राष्ट्रीय सहारा में ट्रेनिंग के बाद नईदुनिया इंदौर में रिपोर्टिंग से करिअर की नई शुरुआत। नौ साल प्रिंट में रहने के बाद 2003 में सहारा समय न्यूज चैनल में आए। 2006 में प्रिंट में वापसी दैनिक भास्कर भोपाल के पॉलिटिकल ब्यूरो से। 2010 में दैनिक भास्कर के नेशनल न्यूजरूम में ऑल इंडिया रिपोर्टिंग के लिए चुने गए।

फिर 2015 तक अलग-अलग विषय पर रिपोर्टिंग के लिए पांच साल में लगातार भारत के कोने-कोने की आठ यात्राएं। टीवी और प्रिंट में बीस साल की रिपोर्टिंग के दौरान ऐसे विषयों पर हमेशा पैनी निगाह रही, जिन्हें पांच सौ या हजार शब्दों की खबरों से ज्यादा अहमियत की दरकार थी। यहीं से स्थाई लेखन ने अलग जगह बनाई और छपकर आईं छह किताबें आईं। ये किताबें पत्रकारों और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए गौरतलब दस्तावेज हैं।

अब तक छपी किताबें- 2001 में पहली किताब-प्रिय पाकिस्तान छपी। यह ऐसे आलेखों का संग्रह है, जो छपे हैं, जो नहीं छपे हैं और जो कहीं छप नहीं सकते थे। टीवी में इंदिरा सागर बांध में डूबे हरसूद शहर की लाइव रिपोर्टिंग पर 20005 में प्रकाशित चर्चित किताब-हरसूद 30 जून-को भारतेंदु हरिश्चंद्र अवार्ड मिला। एनएसडी ने इस पर नाटक लिखा। मशहूर कथाकार कमलेश्वर ने इस किताब से प्रेरित होकर एक कहानी लिखी, जिसमें विजय मनोहर तिवारी को ही एक किरदार बनाया।

2008 में समकालीन राजनीति पर दिलचस्प उपन्यास-एक साध्वी की सत्ता कथा प्रकाशित। 2010 में वरिष्ठ पत्रकार राहुल बारपुते पर एक मोनोग्राफ लिखा। इसी साल अदालत से भोपाल गैस हादसे का फैसला आने पर लिखी-आधी रात का सच। पांच साल तक भारत भर की लगातार यात्राओं पर 2016 में छपी-भारत की खोज में मेरे पांच साल। भोपाल के भारत भवन में इस किताब का लोकार्पण करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा-यह किताब प्रामाणिक पत्रकारिता का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें सच को सच की तरह सामने लाया गया है। यह किताब इक्कीसवीं सदी के भारत को हर रंग-रूप और हर माहौल-मूड में सामने लाती है। इंदौर लिटरेचर फेस्टीवल-2016 में यह यात्रा वृत्तांत चर्चित रहा, जहां तारेक फतेह, अमीश त्रिपाठी और कुमार विश्वास जैसी जानी-मानी हस्तियो ने शिरकत की। पत्रकारिता के कई अवार्ड मिले हैं। सभी किताबों की देश के मीडिया में चर्चा, समीक्षाएं हुईं हैं।

पुरस्कार: हरसूद 30 जून के लिए राष्ट्रीय भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार, गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान और यात्रा वृत्तांत के लिए मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार। इसके अलावा श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के कई पुरस्कार।