Monday, October 22, 2018
क्यों बेहाल कर रहे हैं माई के लाल !

क्यों बेहाल कर रहे हैं माई के लाल !

उज्जैन में करणी सेना के आह्वान पर सपाक्स समाज के सहयोग से सवर्ण और पिछड़े समाज की जो रैली निकली है उससे भाजपा, कांग्रेस सहित अन्य दलों की नींद उड़ना स्वाभाविक है। किसी को उम्मीद ही नहीं थी कि बिना विज्ञापन, पोस्टर बैनर और धुंआधार प्रचार के ऐसी रैली निकाली जा सकती है।बीते एक माह से सरकार की नींद उड़ी हुई है इसे जनआशीर्वाद यात्रा पर निकले शिवराज सिंह के हावभाव को देख कर समझा जा सकता है।इस रैली के अगले दिन शिवराज के काफिले पर पथराव की घटनाएं और आज सतना में काले झंडे, लाठीचार्ज बता रहा है कि सरकार को बेहाल करने का हर मौका भुनाने में लग गए हैं माई के लाल। 

मध्यप्रदेश का शायद ही कोई ऐसा गांव-कस्बा-शहर बचा हो जहां एट्रोसिटी एक्ट में उच्चतम न्यायालय से आगे बढ़कर अति उत्साह दिखाने वाली केंद्र सरकार के मंत्रियों-सांसदों, राज्यों के मंत्रियो-विधायकों-पार्षदों से लेकर पंचों तक के लिए यह हॉट सीट का ऐसा धधकता प्रश्न बन गया है जिसका सत्ता पक्ष के पास जवाब नहीं है।दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने भी अपने दल का स्टैंड यह कहकर बता दिया है कि वह इस एक्ट को किसी भी हालत में कमजोर करने के पक्ष में नहीं है।एक तरह से दोनों दलों ने सवर्ण समाज को उन राम के भरोसे छोड़ दिया है जिनका मंदिर मसला इन चार सालों में भी हल नहीं हुआ है। केबीसी में तो चार विकल्प भी मिल जाते हैं लेकिन कश्मीर से कन्याकुमारी या अटक से कटक तक का नारा लगाने वाले सरकारी नुमाइंदों के पास एट्रोसिटी एक्ट मामले में जान बचा कर भागने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा है।

हर बड़े-छोटे मसलों पर ट्विट करने वाले पीएमओ को ही नहीं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी नहीं सूझ रहा है कि एक्ट में संशोधन के बाद पार्टी में जिस तरह दो धारा बहने  लगी है उसे एक दिखाने में कैसे कामयाब हों।ऐसे में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आजादी की लड़ाई में कांग्रेस के योगदान को रेखांकित कर व्यक्तिपूजा का माहौल बनाने वाले दल को आगाह कर दिया है कि सिर्फ एक पहिए से लोकतंत्र का रथ निर्बाध गति से नहीं चल सकता। सामाजिक समरसता के सम्मेलनों के माध्यम से हरिजन-गिरिजन में आत्म गौरव का भाव पैदा करने में कामयाब संघ ही सवर्ण समाज के असंतोष को पार्टी के प्रति विश्वास में तब्दील कर सकता है यह बात सत्ता के महानायक को भी पता तो है लेकिन जिस तरह से नेता-प्रवक्ता के मुंह बंद है वो इस बात का भी संकेत है कि सर्वोच्च न्यायालय ने जो व्यवस्था दी थी उसे दबाव में अमान्य कर इस सरकार ने भी शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय की परवाह ना करने जैसी गलती को दोहराया है, जबकि उसे सबक लेना था। 

मप्र में करणी सेना के प्रति सरकार का दोहरा रवैया भी उसके लिए तो मुसीबत और सवर्ण-खासकर राजपूतों-के बीच गुस्से का भी कारण बन रहा है। पदमावती से पदमावत हुई फिल्म को ज्यादा वक्त नहीं हुआ है, उस वक्त करणी सेना के लिए रेड कारपेट बिछाने वाली सरकारें अब इस सेना के साथ जुड़े सवर्ण समाज को संतुष्ट नहीं कर पा रही है कि उनके दल के नुमाइंदे उस वक्त बूटी छान कर क्यों बैठे रहे जब संसद में संशोधन  विधेयक पारित हो रहा था।तीन तलाक बिल से मुस्लिम समाज तो पहले से ही जलाभुना बैठा है, इस एक्ट में संशोधन के बाद उठे विवाद ने दुश्मन का दुश्मन दोस्त जैसी एकता पैदा कर दी है। 

आशीर्वाद यात्रा से लेकर पीएम के दौरे के लिए भीड़ का टारगेट निर्धारित करने वाले रणनीतिकारों को अब तक तो यह समझ आ जाना चाहिए कि उज्जैन में इस विरोध रैली के लिए न बसों का इंतजाम, न भोजन-डीजल पेट्रोल की सुविधा फिर भी लाखों लोग कैसे जुट गए।जिला प्रशासन सरकार को खुश करने के लिए निश्चित तौर पर रैली को हजारों की संख्या बता सकता है, मीडिया के लिए भी सरकार से इनाम इकरार पाने का यह एक और अवसर हो सकता है लेकिन जो जनसैलाब उमड़ा और जिसे लोगों ने अभूतपूर्व बताया उसे कैसे नकारा जा सकता है? इस रैली के बाद अगली भोपाल, फिर किसी अन्य शहर में हो सकती है।तब भी सरकार की आंखें बंद रहती हैं तो इससे यह गुस्सा प्रेशर कूकर की सिटी में तब्दील होकर देश में और तेजी से फैल सकता है। नारेबाजी हुई लेकिन हिंसा नहीं हुई यह भी इस रैली की खासियत रही।कुछ गड़बड़ी होती तो शायद इस रैली को मीडिया दो तीन दिन तक भुनाता, जाहिर है यह भी ठकुर सुहाती का ही एक अंग होता।कुछ नहीं हुआ इसलिए भी रैली ‘जंगल में मोर नाचा किसी ने न देखा’ जैसी साबित हो जाती लेकिन सोशल मीडिया पर रैली के साथ ही मीडिया हाउस से बातचीत के वॉयरल हुई क्लिपिंग के बाद रैली आयोजकों को भी समझ आ गई है कि उनके द्वारा हर दिन आंख मूंद कर चुकाए जाने वाले साढ़े तीन रुपए की ताकत क्या है।बाकी किसी को समझ आए ना आए भोपाल से दिल्ली तक तो समझ आ ही जाना चाहिए कि सवर्ण-पिछड़े-मुस्लिम जो इस एक्ट के बहाने एकजुट हुए हैं उन्होंने यदि विधानसभा-लोकसभा चुनाव में रिएक्ट करना शुरु कर दिया तो हर रोज की जा रही घोषणाओं की बारिश धरी की धरी रह जाएगी। सरकारों के लिए कांग्रेस बेदम हो सकती है लेकिन ये माई के लाल इन दोनों दलों की गाड़ी पंचर करने के हथकंडे भी समझ गए हैं। 

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कीर्ति राणा

क़रीब चार दशक से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा लंबे समय तक दैनिक भास्कर ग्रुप के विभिन्न संस्करणों में संपादक, दबंग दुनिया ग्रुप में लॉंचिंग एडिटर रहे हैं।

वर्तमान में दैनिक अवंतिका इंदौर के संपादक हैं। राजनीतिक मुद्दों पर निरंतर लिखते रहते हैं ।

सामाजिक मूल्यों पर आधारित कॉलम ‘पचमेल’ से भी उनकी पहचान है। सोशल साइट पर भी उतने ही सक्रिय हैं।


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