Tuesday, August 20, 2019
चांद पर पहली बार पड़े कदम अब चांद को क्या बनाना चाहते हैं

चांद पर पहली बार पड़े कदम अब चांद को क्या बनाना चाहते हैं

मीडियावाला.इन।उस महान क्षण की ऐतिहासिक अनुभूति को आज आधी सदी पूरी हो चुकी है, जब 20 जुलाई 1969 को मनुष्य ने चमकते चांद पर अपना कदम रखा था। सारी दुनिया रात भर जागकर उस लमहे की साक्षी बनी थी, जब कमांडर नील आर्म स्ट्रांग ने  अंतरिक्ष यात्री के बाने में चांद की खुरदुरी सतह को स्पर्श किया और अभिभूत हो उठे। उनके शब्द थे- यह मनुष्य का छोटा कदम, लेकिन मानवता की लंबी छलांग है। आज प्रौद्योगिकी  और संचार तकनीकों के मायाजाल में डूबी नई पीढ़ी को मनुष्य के चांद पर पहुंचने और चांद की असलियत का जान लेने की उस महान उपलब्धि और थ्रिल का अहसास शायद न हो, क्योंकि अब तो चांद भी एक महंगे पिकनिक स्पाॅट में तब्दील होने वाला है। नासा की कोशिश है कि 2028 तक लोग चांद पर जाकर तफरीह करने लगें। फिर चाहे चांद इस बारे में कुछ भी सोचे। 
मनुष्य की अदम्य आकांक्षा, भोग वृत्ति और प्रौद्यो‍िगकी मिलकर चांद को नया ट्रीटमेंट देने वाले हैं। धरती के उपग्रह के रूप में तो चांद का वजूद साढ़े चार अरब सालों से है। सौर मंडल में सूर्य के बाद चांद ही वह उपग्रह है, जो अपने सौंदर्य, चमक, और शीतलता के कारण मानव सभ्यता और संस्कृति के साथ हिल-मिल गया है। यह चांद ही है जो महबूबा के चेहरे से लेकर मां की लोरी तक सदियों से हमारे साथ रहा है। चांद, जिसे खुली आंखों से देर तक देखा जा सकता है। चांद, जो रात का हमसफर है। चांद, जिसने धरती पर हावी होने की कभी कोशिश नहीं की। चांद, जो भीतर से कैसा भी हो, तासीर में दोस्त की मानिंद रहा है। वह कवियों का प्रिय‍ बिम्ब, उपमान और प्रेरणा रहा है तो हमारे पुराणों, मिथकों में तो वह एक पात्र के रूप में है। पुराणों में चांद का डेरा भगवान शिव की जटाअोंके बीच है। जबकि प्रेमियों ने अक्सर चांद की गवाही में प्रेम का आदान-प्रदान किया है। इतना सब होते हुए भी चांद एक ‘दूर का ढोल’ ही रहा। शायद कोई उसके भीतर झांक कर देखना भी नहीं चाहता था, क्योंकि ऐसा करने से चांद की छवि को लेकर मोहभंग का खतरा था। 
लेकिन खतरा न उठाए, वह इंसान ही क्या। वैज्ञानिकों में चांद को एक आकाशीय पिंड के रूप में जानने-समझने की होड़ पिछली सदी में 1959 में शुरू हुई, जब सोवियत रूस ने अपना अंतरिक्ष  यान लूना-2 चांद पर भेजा। इसके बाद सोवियत रूस और अमेरिका के बीच जो अंतरिक्ष होड़ शुरू हुई, उसी का सकारात्मक परिणाम अमेरिका का अपोलो-11 मिशन था। तब पूरी दुनिया में गजब उत्साह था कि  क्या जिस चांद को हजारों-बरसों से देखते, सराहते और कोसते आ रहे हैं, उस इंसान के कदम पड़ेंगे? पड़ेंगे तो कैसा महसूस होगा? क्या चांद भी धरती जैसा नरम-गरम है? नहीं है तो कैसा है? इन तमाम सवालों के आंशिक जवाब नील आर्म स्ट्रांग ने 20 जुलाई 1969 की रात 20:17 बजे ( समन्वित वैश्विक समय के अनुसार) अपने कदम चांद की धरती पर रखकर दिए। इसके ठीक 39 मिनट बाद उनके सह यात्री बज एल्ड्रिन ने भी चांद पर चहलकदमी की। दुनिया को लगा ‍िक चांद अब उसकी मुठ्टी में है। 
नील आर्म स्ट्रांग के बाद 10 और अं‍तरिक्ष यात्री चांद की सैर कर आए हैं। लेकिन 1972 के बाद से यह सिलसिला थम-सा गया है। उसके बाद भी चांद पर मिशन तो जारी रहे, लेकिन कोई मनुष्य इसमे नहीं गया। शायद इसलिए कि चांद को लेकर हमारी कवि और पौराणिक कल्पनाअों को पहली बार तगड़ा झटका लगा। और इसलिए भी कि अब तकनीकी का इतना ‍िवकास हो गया है कि हम अंतरिक्ष की बातों को यहां बैठकर ही जान लेते हैं। या यूं कहें  कि अगर पृथ्‍वी पर आपका कोई डाटा सुरक्षित नहीं है तो अंतरिक्ष पिंडों की बहुत से जानकारियां भी अब रहस्य नहीं रह गई हैं। विज्ञान तो पहले ही चांद को आकाशीय पिंड की तरह देख और समझने की कोशिश कर रहा था। अब तक हुए चांद मिशनों की उल्लेखनीय उपलब्धियों में  हमारे चंद्रयान-1 द्वारा चांद पर पानी की भाप की खोज और चीन के चेंग-2 ‍मिशन द्वारा चांद के उस हिस्से की खोज है, जहां अभी तक कोई अंतरिक्ष यान नहीं गया था। हमारा चंद्रयान 2 मिशन भी चांद के उस भाग में उतरने वाला है, जहां केवल भयानक गड्ढे हैं। यानी चांद की बनावट और तासीर के बारे में कुछ और जान‍कारियां हासिल होंगी। 
यह सही है कि सौर मंडल के अन्य ग्रहों जैसे बृहस्पति और मंगल के बारे में जानने-बूझने की जिज्ञासा के मुकाबले चांद के बारे में हमारी उत्कंठा हमेशा ज्यादा और बहु आयामी रही है। क्योंकि चांद हमारी खयाली दुनिया पर  अभी भी उतना ही छाया हुआ है, जितना कि वह 20 जुलाई 1969 के पहले था। बावजूद इसके कि चांद  अपने आप में निर्जन, नीरव है, वहां प्राण वायु भी नहीं है। चांद पर ऋतुएं नहीं होतीं। वहां, पशु- पक्षी और पेड़-पौधे  भी नहीं है। एक भयावह सन्नाटा और जानलेवा एकांत है। ( भले ही नील आर्म स्ट्रांग को चांद की सतह के उस भूरे पन में भी एक अलग तरह की रागात्मकता महसूस हुई हो)। विशाल मुर्दा ज्वालामुखी हैं। सदियों से खामोश पड़े पत्थर, चट्टानें और धूल है। वहां कोई गीत, कविता या जीवन का क्रंदन नहीं है। इन सबके  बाद भी चांद हमारे लिए चांद क्यों है? उधारी  की चमक के बावजूद वह हमे ‘मामा’ जैसा ‘स्नेहिल’ क्यों लगता है? इन सवालों के सही जवाब आने में अभी हजार साल और लग सकते हैं।   
बहरहाल चांद पर, चांद को लेकर जो अब हो रहा है, वह गुजरे जमाने की ‘स्पेस रेस’ से बहुत जुदा  और ज्यादा चिंताजनक है। नील आर्म स्ट्रांग ने तो चांद पर जाकर वहां के वातायन ( वो जैसा भी है) से आंखें चार की थीं। लेकिन अब चांद को लेकर जो सोचा जा रहा है, वह ‘एडवेंचर टूरिज्म’ की शक्ल में है। यहां चांद देवता या प्रेम संदेश वाहक न होकर एक एंटरटेनमेंट प्लेटफार्म बनने जा रहा है। पचास बरस पहले चांद पर इंसान के जाने  पीछे एक उम्मीद यह भी थी कि अगर वहां धरती जैसा माहौल और दाना-पानी मिल जाए तो उस अभागे चांद को भी हम धरती में बदल दें। लेकिन अफसोस कि विज्ञान की खोजबीन में जो राज उजागर हुए हैं, उनसे चांद को जीतने और उसे अपना दूसरा ठिकाना बनाने की आसुरी अाकांक्षाअों पर जरूर ब्रेक लग गया है। लेकिन फिर भी वह टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनने से नहीं बच पा रहा है। नासा ने इसकी तैयारियां कर ली हैं। इसके तहत अमीरों से मोटी रकम लेकर लोगो को चांद की सैर कराई जाएगी। वहां आने-जाने  के‍ लिए 2024 तक अंतरिक्ष में एक प्लेटफार्म बनेगा। यात्री इसी प्लेटफार्म से होकर चांद पर जाएंगे और लौटेंगे। जिस यान के जरिए यह सब होगा, उसे ‘एट्रिमस’ नाम दिया गया है। 
हां, हैरानी की बात यह है कि चांद जिनके सपनो और जज्बातों को हम सफर रहा है, उ महिलाअों में से कोई भी अब तक असली चांद के सफर पर नहीं गया है। प्रेयसी की तुलना चांद से करने वाले पुरूष यहां भी ‘स्वार्थी’ ही साबित हुए हैं। वो ‘चांद’ तो चाहते हैं पर ‘चांद’ को चांद पर जाने नहीं देना चाहते। असल चांद पर कोई महिला कब जाएगी, यह अभी भी तय नहीं है, हालांकि अपोलो 11 मिशन के संयोजन में  महिलाअोंकी बड़ी भूमिका थी।  
ध्यान रहे कि मनुष्य जब पहली बार चांद पर पहुंचा था, तब इंटरनेट नहीं था। तब दुनिया कल्पना से भरी लेकिन वास्तविक दुनिया में ही जी रही थी। इसीलिए नील आर्म स्ट्रांग के कदम को विश्व के हर व्यक्ति ने अपना कदम ही समझा। अब लोग चांद पर पिकनिक के लिए जाना चाहते हैं। भले ही चांद ‘टूटा हुआ तारा’ बन जाए। यह बात चांद को भी समझनी होगी। शायद इसीलिए शायर इब्ने सफी ने लिखा था ‘चांद का हुस्न भी जमीन से है, चांद पर चांदनी नहीं होती...!’

 

 

0 comments      

Add Comment


अजय बोकिल

जन्म तिथि : 17/07/1958, इंदौर

शिक्षा : एमएस्सी (वनस्पतिशास्त्र), एम.ए. (हिंदी साहित्य)

पता : ई 18/ 45 बंगले,  नार्थ टी टी नगर भोपाल

मो. 9893699939

अनुभव :

पत्रकारिता का 33 वर्ष का अनुभव। शुरूआत प्रभात किरण’ इंदौर में सह संपादक से। इसके बाद नईदुनिया/नवदुनिया में सह संपादक से एसोसिएट संपादक तक। फिर संपादक प्रदेश टुडे पत्रिका। सम्प्रति : वरिष्ठ संपादक ‘सुबह सवेरे।‘

लेखन : 

लोकप्रिय स्तम्भ लेखन, यथा हस्तक्षेप ( सा. राज्य  की नईदुनिया) बतोलेबाज व टेस्ट काॅर्नर ( नवदुनिया) राइट क्लिक सुबह सवेरे।

शोध कार्य : 

पं. माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के  रूप में कार्य। शोध ग्रंथ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित।

प्रकाशन : 

कहानी संग्रह ‘पास पडोस’ प्रकाशित। कई रिपोर्ताज व आलेख प्रकाशित। मातृ भाषा मराठी में भी लेखन। दूरदर्शन आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन।  

पुरस्कार : 

स्व: जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार, मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार, मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान।

विदेश यात्रा : 

समकाालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका)  में सहभागिता। नेपाल व भूटान का भ्रमण।