Sunday, May 19, 2019
मासूमों का लोकतंत्र

मासूमों का लोकतंत्र

मीडियावाला.इन।

राहुल गांधी की सभा खत्म होती है। भीड़ बाहर आती है, जिसमें ढेर सारे चेहरे हैं। अलग-अलग रूप-रंग और आकार-प्रकार के चेहरे, लेकिन लौटते समय ज्यादातर पर कोई भाव नहीं है। जबकि इनमें से कई लोगों ने तालियां पीटी, ठहाके लगाए और नारों से सुर भी मिलाया। फिर भी जैसे आए थे, वैसे ही चल दिए, किसी मलंग की तरह। सभा से पूरी तरह निस्पृह, निर्लिप्त और निर्विचार।

जबकि सभा में मसाला पूरा था। राहुल से पहले कमलनाथ ने 125 दिन की सरकार को आचार संहिता के पहले मिले 75 दिन के कामकाज गिना दिए। कर्ज माफी पर तालियां बजवा ली, शादी के पैसे बढ़ाए जाने पर मुस्कुराहट बटोर ली, सस्ती बिजली पर पीठ ठोक ली। बाण में चलाया कि मोदी जी कहते थे, अच्छे दिन आएंगे, अब जनता उन्हें कह रही है आखिरी दिन आ रहे हैं।

इनके बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राहुल गांधी का मतलब समझाया। राहुल यानी, युवाओं के लिए रोजगार, महिलाओं की सुरक्षा, गरीबों की रोटी। ऊपर से तालियां बजती तो नीचे भी सैकड़ों हाथ जुड़ जाते। नेताजी खुश हो जाते, बात पहुंच रही है। इसलिए बीच-बीच में नारे भी लगवा लेते, ताकि सनद जनता जाग रही है, सुन रही है और जवाब भी दे रही है।

राहुल ने भी आते ही इसी पटरी पर अपनी ट्रेन दौड़ाई। चौकीदार कहा, जवाब जनता ने दिया। राहुल खुश हो गए कि उनका नारा जन-जन तक पहुंच गया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में खेद जताया, माफी मांगी, यह बात वहां कितने लोगों को पता थी, नहीं थी, कौन जानता है। इसके बाद राहुल ने सिलसिलेवार हमले शुरू किए। नीरव मोदी, ललित मोदी, विजय माल्या, मेहुल चौकसी के चि_े खोले। रफाल पर पूरा पुराण सुना दिया। इसमें फ्रांस के राष्ट्रपति भी थे, एचयूएल, यूपीए की कोशिशें, लोकसभा में उठाए गए सवाल और अनिल अंबानी भी। आखिर में मोदी को तो होना ही था।

नोटबंदी और गब्बरसिंह टैक्स से उद्योग, व्यापार और आम जनता पर प्रहार की पूरी कहानी भी राहुल ने सुनाई। कैसे लोगों ने खरीदना कम किया, कैसे दुकानों की बिक्री घटी, कैसे फैक्ट्रियां बंद हुई और अंतत: कैसे लोग बेरोजगार हुए। इनके बाद उन्होंने अपनी योजनाएं भी पेश की। 72 हजार खाते में पहुंचाने के लिए उन्होंने कितनी रिसर्च की, इस पर से भी पर्दा उठाया। वे बोलते जा रहे थे, लोग उन्हीं की लय में सुने जा रहे थे। आखिर में उन्होंने पुरुषों से इस बात के लिए माफी भी मांगी कि न्याय योजना का पैसा उनके नहीं बल्कि महिलाओं के खाते में जाएगा।

सभा खत्म हुई हेलीकॉप्टर उड़ गया। लोग देर तक उसे निहारते रहे, फिर जाने के रास्ते तलाशने लगे। सभा से उतरती भीड़ में कुछ और नहीं बल्कि ढेर सारे अनाम सपाट चेहरे थे। एक चेहरे को मैंने इशारे से पास बुलाया। हालचाल पूछे, कहां से और इतनी गर्मी में कैसे आए जैसे सवाल किए। जवाब रटे-रटाए थे। सरपंच साथ लेकर आए थे। अभी कुछ इंतजाम नहीं हुआ है, लेकिन लौटते में खाना-पीना होगा। सभा में क्या अच्छा लगा के सवाल पर ज्यादातर खामोश थे। महिलाओं के तो सिर ही झुक गए इस सवाल पर। वे मुस्काती हुई आगे बढ़ गईं।

युवाओं की एक टोली ने जरूर कहा कि जिले में नर्मदा लाने की बात अच्छी लगी, लेकिन नई कंपनियां शुरू करने की बात ठीक नहीं है। गांव में अगर फैक्ट्रियां आ गईं तो हमारी जमीनें चली जाएंगी। मैंने पूछा, रोजगार भी तो मिलेगा, तो उनका कहना था, जमीन की शर्त पर उद्योग नहीं चाहिए। 
बाकी लोग वैसे ही लौट गए, अपनी-अपनी टोलियों में।

भीषण गर्मी के बीच उनके लिए सियासी टूरिज्म हो गया। उससे ज्यादा अगर कुछ था तो उन नेताओं के लिए जो सफेद कपड़ों पर पार्टी का दुपट्टा डाले, अपना चेहरा चमकाने के लिए आए थे। किसी के चेहरे पर कार्यक्रम ठीक से निपट जाने की तसल्ली थी तो किसी के चेहरे पर पीछे की खाली कुर्सियों को देखकर उभरी मुस्कान।

इस तसल्ली और कुटिल मुस्कान के बीच ही मासूमों का यह लोकतंत्र झूल रहा है, जिनमें से अधिकतर को शायद यह नहीं पता कि रफाल क्या है, अनिल अंबानी कौन है और 30 हजार करोड़, 5 लाख करोड़, 10 हजार करोड़ जैसी ये रकम गिनाई जा रही है, वह कितनी होती है, कैसी होती है। उसके अपने मसले हैं, लेकिन उन पर पता नहीं किस चुनाव में बात होगी। शायद वह उसी के इंतजार में सभा में आया हो, उस दिन की रिहर्सल कर रहा हो। 
 

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अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.