Thursday, October 24, 2019
सर मुझे मेरी चिट‌्ठियां वापस कर दें

सर मुझे मेरी चिट‌्ठियां वापस कर दें

मीडियावाला.इन।

सर मुझे मेरी चिट‌्ठियां वापस कर दें

सोचता हूं कि कहीं से वे सारी कॉपियां ढूंढवा लूं। ठीक-ठीक याद नहीं, लेकिन चौथी-पांचवीं कक्षा से तो हर साल ही हिन्दी और अंग्रेजी की परीक्षा में चिट्ठियां लिखी ही थी। कभी हेड मास्टर को छुट्‌टी के लिए तो कभी ट्रांसफर सर्टिफिकेट के लिए। कभी दोस्त को खत लिखा, कभी किसी रिश्तेदार को। मिडिल स्कूल में आकर शहर के मेयर को भी खत लिखवाए गए। उन्हें इलाके के हालात बताते हुए, सफाई आदि में मदद की अपेक्षा जताते हुए।

हाई स्कूल, हायर सेकंडरी में इनका स्तर और बढ़ा। बीमारी की छुट्‌टी से लेकर जिम्मेदार पद पर बैठे लोगों को लिखवाई गई इन चिटि्ठयों की भी अपनी थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन है। कैसे इन चिटि्ठयों ने मुझे खत लिखना सिखाने के साथ, जिम्मेदार बनाने की कोशिश की। जिम्मेदार इस लिहाज से कि जीवन में संवाद का महत्व और उसकी ताकत को समझ सकूं।

फिर खत लिखने की नई वजहें भी जीवन में कम नहीं आई। लिखने-पढ़ने के शौक ने दोस्तों की मदद का बहाना भी ढूंढा। किसी को खत में हाल बयां करने होते तो चला आता। थोड़ा अच्छा लिख देना, कुछ शेर शायरी भी डाल देना। थोड़ा रोमांटिक फील आना चाहिए। लगता खत नहीं एक पूरी दुनिया है। पेपर पर उभरे शब्द सिर्फ सूचना नहीं देते, दिलों को जोड़ते हैं, उन्हें करीब लाते हैं।

टेलीफोन उतना कॉमन नहीं था, तब खत ही तो थे। देहरी पर एक इंतजार हमेशा टंगा होता। इसकी चिट्‌ठी आ गई, उसकी कोई खबर नहीं आई। घर से विदा होती बेटी हो या पढ़ने के लिए बाहर जाता बेटा, मां आशीर्वाद के साथ एक बात जरूर कहती, बेटा चिट्‌ठी लिखते रहना। कोई दोस्त लिखने में आनाकानी करे तो उसे बलात 5-10 पोस्ट कार्ड या अंतरदेशी भेज देने के किस्से भी हवाओं में तैरते मिल ही जाएंगे।

अखबार में लिखने का शौक जागा तो पत्र संपादक के नाम भेजते। पत्र के साथ अपना नाम पढ़कर खुश होते। मोहल्ले का कोई बुजुर्ग पढ़कर बधाई दे देता कि मैंने पढ़ा, तुमने अच्छा लिखा तो लगता पैर जमीन से दो फीट ऊपर हो गए हैं। हवा में उड़ रहा हूं। दो दिन तक गुदगुदी होती रहती। कॉलेज में प्रिंसिपल से शिकायत हाेती तब भी वही चिट्‌ठी काम आती। जो बात बोलने में संकोच होता, वह खत में लिखकर भेज देते, यह ठीक नहीं है, उसे बेहतर करना चाहिए। फिर मुद्दों पर खत लिखो अभियान भी चलते देखे। कश्मीर में धारा 370 का मुद्दा हो या दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को नियमित करने की मांग। एक ही आह्वान गूंजता, चिट्‌ठयां लिखो।

गो हत्या पर पाबंदी लगानी हो या कोई और मांग चिटि्ठयां ही नाव बन जाती, जिन्हें मुसीबत की नदी पर तैरा देते। बदलाव होता या नहीं लेकिन तसल्ली रहती कि कम से कम हमने अपनी आवाज उठाई, बात पहुंचाई। अब ये उन पर निर्भर करता है कि वे काम करें या न करें, हमने अपनी जिम्मेदारी निभा दी है। गांव-गांव ऐसे आह्वान की गूंज होती, पुल नहीं बना तो हस्ताक्षर अभियान के साथ खत लिखो अभियान भी छेड़ देते।

स्कूल की बिल्डिंग खराब है, अस्पताल में डॉक्टर नहीं है, आंगनवाड़ी में पोषण आहार नहीं मिल रहा। हर आदमी दफ्तरों के चक्कर तो नहीं लगा सकता, तो चिट्‌ठी लिखकर ही अपनी बात पहुंचाता। आप कहते हैं, संवाद ही लोकतंत्र की ताकत है, प्रजा के अहसास राजा तक न पहुंचे तो मामला एकपक्षीय हो जाएगा।

भरी सभाओं से लोग पूछते, बैठकों में मंथन होता, पता कीजिए फलां मुद्दे पर लोग क्या सोचते हैं। क्योंकि यही समझा है, पढ़ा है कि जनमत ऐसे ही तैयार होता है। पीपुल्स वाइस ऐसे ही बनती है, आवाज का अंदाजा ऐसे ही लगाया जाता है। नीतियां ऐसे ही बनाई जाती हैं, उनके क्रियान्वयन की हकीकत ऐसे ही परखी जाती है। पता तो चले लोग क्या सोच रहे हैं। अब संसाधन हैं तो आप रिसर्च टीम लगाते हैं, जनता की नब्ज समझने को विदेशी एक्सपर्ट भिड़ाते हैं। करोड़ों खर्च करते हैं, ताकि जनता के मन की थाह ली जा सके।

इन सबमें चिट्ठियां हमेशा ताकतवर महसूस होतीं। क्योंकि शब्द और संवाद ही तो सेतु है, लेकिन नहीं पता था कि किसी दिन चिट्‌ठी लिखना ही राजद्राेह हो जाएगा। मन की बात सुनना राष्ट्रीय कर्तव्य और कहना देशद्रोह बन जाएगा। इसलिए बहुत डरा हुआ हूं। क्योंकि बचपन से चिट्‌ठयां लिखते आ रहा हूं। डरता हूं कहीं पुराने लिखे खतों के लिए भी ऐसी ही कोई राजाज्ञा न आ जाए।

इसलिए अपने तमाम शिक्षकों से निवेदन करता हूं कि सर कृपया मुझे विभिन्न परीक्षाओं की मेरी वे सारी कॉपियां लौटा दें, जिनमें मैंने खत लिखे हैं। अगर कानूनी तौर पर यह संभव न हो सके तो कम से कम इतनी मेहरबानी तो कीजिए कि अपने रिकॉर्ड से उन कॉपियों को निकालकर वे पन्ने फाड़ दें, उन्हें जला दें। उनकी राख को कहीं दफन कर दे, मैं अपने गुनाह के कोई चिन्ह नहीं छोड़ना चाहता हूं।

और बहुत बेहतर होगा अगर सिलेबस बदल पाएं। सभी कक्षाओं से पत्र लेखन को पूरी तरह हटा दें। जो आगे चलकर अपराध बन सकता है, उसके बीज ही क्यों पड़ने देना चाहिए। नहीं चाहता मेरी आने वाली पीढ़ियां देशद्रोही बनें।
 

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अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.