Thursday, May 23, 2019
ड्रैगन साँप का पुरखा, अभी तक नहीं समझे!

ड्रैगन साँप का पुरखा, अभी तक नहीं समझे!

मीडियावाला.इन।

संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में चीन लगातार चौथी बार पाकिस्तान के हक में अजहर मसूद को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के आड़े आ गया। यह अप्रत्याशित नहीं। 'पयंपानम् भुजंगानाम केवलम् विष वर्धनम्' लेकिन  वह तो साँप का भी बाप है। पलटकर डसने का इतिहास है उसका। इन चार सालों में हमारे प्रधानमंत्री, विदेशमंत्री कई बार हो आए। उसी नाते चीनी प्रधान भी आते-जाते रहे।

 दोनों देशों के परधानों का आनाजाना ऐसा रहा जैसे कि अपने-अपने फार्महाउस आए या गए हों। चीन के प्रधान साबरमती में झूला झूलने आए तो अपने प्रधान वहां जा के ड्रम और 'पिपिहरी' बजा के आ गए। ये विदेश नीति अपन के पल्ले ही नहीं पड़ रही। पूरा बाजार चीनी माल से पटा है। यहां से मुनाफा कमाकर वह मुटल्ला हो रहा है और हम दुमछल्ला बने फिर रहे हैं।

चीन से अपन की तो पैदाइशी अदावत है। इधर मैं पैदा हो रहा था, उधर चीन बम बरसा रहा था। चीन के बमों का असर मेरे पैदा होने पर इसलिए पड़ा क्योंकि वो जगह जबलपुर में बम, गोला बनाने वाली फैक्ट्री के श्रमिकों की बस्ती थी। रात को ब्लैकाउट। वाहनों की हेडलाइट में काला कोलतार। मुझे ढिबरी की रोशनी में पैदा होना पड़ा। मेडिकल की मदद दूर दूर तक नहीं। कातिक की गुलाबी ठंड भर से ही मुझे निमोनिया हो गया। दाई..और पडोसी महिलाओं की चुटकबैदिया ने एक नन्हीं जान को शहीद होने से बचा लिया।

 युद्ध में सिर्फ़ सैनिक भर शहीद नहीं होते। और भी बहुत लोग होते हैंं जो अपंजीकृत ही रहे आते हैं। खैर फिर भी अब तक निमोनिया ने मेरा साथ नहीं छोड़ा। साल में एक दो बार झटका मार ही देता है। न सर्दी देखता है न गर्मी। मुझे निमोनिया का अटैक कब आ जाएगा न डाक्टर जान पाए और न मैं। 

चीन का चरित्र भी निमोनिया जैसे ही है। विषाणु जब अनुकूल मौसम देखते हैं तो फेफड़े को जकड़ लेते हैंं। चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी और उनका पाँलित ब्यूरो ठीक निमोनिया के विषाणुओं जैसा ही है। अंदाजा नहीं लगा सकते देश के किस कोने में कब घुस आए, विश्वमंच पर कब कहां दगा दे दे।

 दुनिया के लिए चीन वैसेइ अबूझ है जैसे अपने लिए उसकी भाषा। उसकी चाल सन् 62 में समझ में आई जब नेहरू के साथ पंचशील का झूलाझूलते हुए चाऊ-एन-लाई, जोर जोर से चीखने लगे- हिन्दी-चीनी भाई-भाई। बीजिंग पहुंचते ही साँप की तरह पलटवार किया। सम्भलने का मौका ही नहीं दिया। अक्साई चिन के 80 हजार वर्ग किलोमीटर के विशाल भू भाग में कब्जा कर लिया। 

चीन की दगाबाजी का इतिहास नया नहीं है। पिछली बार चीन प्रमुख अपने प्रधानमंत्री के साथ साबरमती में झूला झूलकर बीजिंग पहुंचे तो पीएलए की आर्मी को अरुणाचल में घुसेड़ दिया। और फिर डोकलम में पहुंच कर चिकन नेक पकड़ ली। जैसे तैसे वो मामला कुछ हद तक दबा। पर कोई गारंटी नहीं कि चीन कोई नई चाल नहीं चलेगा। 

साँप की पूँछ दबती है तो वह पलटवार करता है। ड्रैगन यानी अजदहा तो साँप का पुरखा है। चीन की हर युद्ध कला साँप की चाल से प्रेरित होती है। वह बीन बजाने वाले को भी डसने से नहीं छोड़ता। बहरहाल मुद्दे की बात ये कि चीन से खतरा सैन्यमोर्चे में नहीं है। जब उसकी नजर में विश्व बाजार है तो भला क्यों लड़े झगड़ेगा। व्यापारी लड़ने की झंझट से दूर ही रहता है। किसी को ठिकाने लगाना है तो उसका मैंनेजर जा के किसी सूटर को सुपारी दे आता है। 

चीन के पास जब किराये का गुंडा पाकिस्तान है तो उसे फिकर किस बात की। यदि वह यूएनओ में लखवी, अजहर मसूद, हाफिज सईद की पैरवी करता है तो बिना विस्तार में जाए उसका मंतव्य समझ जाना चाहिए। सीमा पर पाकिस्तान की फौज और आतंकवादी, देश के भीतर माओवादी। उसका प्रहार अंदर और बाहर दोनों की ओर से है। वह दोनों को पाल रहा है।

चीन में एक बाबा हुए, नाम था सुन त्जू ने बहुत पहले वहां के शासकों को मंत्र दिया था- युद्ध के बगैर ही शत्रु को हराना ही सबसे उत्तम कला है, यह कला आर्थिक ताकत से सधती है। चीन ने इस मंत्र को ताबीज में मढ़ाकर रख लिया है। वह सोने के रथ पर सवार होकर दुनिया का बाजार लूटने निकल चुका है। हम उसकी चपेट में हैं। 

चीन 61अरब डालर का व्यापार भारत से करता है, उसके एवज में चीन से हमारा कारोबार महज 10 अरब डालर का है। वह हमसे बहुत आगे है। इलेक्ट्रॉनिक, कम्युनिकेशन के मामले में उसका कब्जा है। हर दस ब्रांड के मोबाइल्स में नौ ब्रांड उसके हैं। वह घर में घुसा है स्वाद में घुसा है, हमारी आदतों में शामिल हो रहा है। इसलिए वह दंभ के साथ कहता है भारतीय भले ही कुछ बकें, हमारे बगैर रह नहीं सकते। 

बहिष्कार एक सांकेतिक तरीका हो सकता है। दीर्घकालिक तरीका तो परिष्कार है। हम अपने कुटीर उद्योगों का परिष्कार करके ही उसके मुकाबले खड़े हो सकते हैं। कोई और चारा नहीं सिवाए अपने उपभोक्ताओं को चीनी विकल्प उपलब्ध कराने के। व्यापार बंद कर सकते नहीं क्योंकि विश्वव्यापार संगठन की शर्तो से बंधे हैं। 

बहरहाल तमाम लानतों-मलानतों के बावजूद हमारे सत्ताधीशों को चीन बहुत सुहाता है। मोदीजी चार साल में अबतक कितनी बार चीन हो आए मैं अपडेट नहीं हूँ। हाँ वहां उनका कैसा स्वागत होता है, माओवादी कैसे अपनी बीन से नागिन वाली धुन निकालते है शियांग से बिजिंग तक, यह उनका मीडिया रह रहकर याद दिला देता है। डेलीहंट जैसा न्यूज एग्रीगेटर चीन के धन से चलता है। वह अक्सर कमेंट्री देता है कि एशिया में ड्रैगन और शेर कैसे साथ-साथ चल रहे हैं। 

अपने यहां के माओवादी बस्तर के जंगलों को खून से सींच रहे हैं। इधर सीपीएम के कामरेड लोग सीताराम येचुरी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव के वास्ते मित्रदलों के लिए लाल जाजम बिछा रहे हैं। कामरेड येचुरी चीन के विशेषज्ञ माने जाते हैं। वहां उनकी बड़ी मान्यता है। भारत में जब भी कोई नेता चीन के बारे में टिप्पणी करता तो पहली हूक येचुरी के ही सीने से उठती है। 62 की जंग में भी सीपीएम वालों की भावना चीन के साथ रही। फिर थियानमन चौक में जब लोकतंत्र समर्थक छात्रों को टैंक से कुचला गया तो इसी सीपीएम ने इसे चीन की सम्प्रभुता के लिए अनिवार्य कार्रवाई बताई। क्रांति के नाम पर जंगल में जो रक्तपात हो रहा है वह भी माओ के ही खाते में है। 

मुझमें राजनीतिशास्त्र की ज्यादा समझ नहीं, सहज ही ये जिज्ञासा है कि जब मोदी के साथ चीन के राष्ट्रपति साबरमती नदी के तीरे झूला झूलते हैं या शियांग से बीजिंग तक गलबहियां डाले वहां के राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ घूूूमते हैं तो शहरी और जंगली कामरेडों के दिल दिमाग में क्या गुजरता रहा होगा?

 यूरोपीय और अमेरिकी महाद्वीप के साम्राज्यवादी-पूंजीवादी देशों के राष्ट्राध्यक्षों की भारत यात्रा और भारतीय राजनेताओं की वहां की यात्रा में तत्काल प्रतिक्रिया देने वाले बुद्धिजीवी कामरेड लोग ऐसे में कभी प्रतिक्रिया नहीं देते। अजहर मसूद के बारे में भी टीवी पर बोलते किसी कामरेड को नहीं सुना।

 ड्रैगन अजदहा है... चीनियों की काल्पित पराशक्ति का प्रतीक। यह सांप की प्रजाति का है। हिन्दुस्तान में सांप को विभिन्न संदर्भों में जाना जाता है। पौराणिक कथाओं की मान्यता के अनुसार सांप शेषनाग भी हैं, जिनके फन पर पृथ्वी धरी है। वासुकी भी हैं और तक्षक भी, जिसने पांडवों के वंशज राजा परीक्षित को डसा था। सांप, यमुना का वह विषधर कालिया नाग भी है जिसे कृष्ण ने नाथा और उसके फन पर नृत्य किया। 

सांप दुनिया का सबसे अविश्वसनीय प्राणी है। वह पलटकर वार करता हैं। जो सपेरा उसे दूध पिलाता है उसे भी डस लेता है। सांप-सांप को भी खा लेता है। सर्पिणी अपने बच्चों को भी नहीं छोड़ती। अजदहा यानी ड्रैगन इन्हीं सांपो का पुरखा है। ये डै्रगन 62 के पहले हिन्दुस्तान आया, हिन्दी-चीनी भाई-भाई पुचकारते हुए जैसे ही अपनी बांमी पहुंचा- अचानक पलटकर वार किया व हमारी हजारों किलोमीटर भूमि पर तब से फन फैलाए बैठा है। अभी भी कभी पाकिस्तान के आतंकी, अरूणाचल, तो कभी लेह-लद्दाख, जहाँ जब मौका मिलता है फन पटकने व विषवमन करने से नहीं चूकता। 

शेर की शुरू से यह कमजोरी रही है कि वह बिना आगे-पीछे की सोचे अपने आगे किसी को नहीं भजता। यहां तक कि अपनी परछाई को भी नहीं। इसलिए सबसे ताकतवर होते हुए भी टुच्चे शिकारियों के फंदे में फंस जाता है। - ड्रैगन को कृष्ण बनकर ही बस में किया जा सकता है, जैसा कि द्वापर में कालिया मर्दन हुआ था। सांप की बांमी में शेर बनकर दहाडऩे से ज्यादा कुछ हासिल होने वाला नहीं।

 

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