Wednesday, September 18, 2019
मुरैना में चंबल की रेत से भरे वो धडधडाते ट्रैक्टर.....

मुरैना में चंबल की रेत से भरे वो धडधडाते ट्रैक्टर.....

मीडियावाला.इन।

तो सर, दूध की कहानी तो निपटा ली अब चंबल की रेत के अवैध उत्खनन पर भी घंटी बजा ही दीजिये। ये थे हमारे मुरैना के मित्र उपेंद्र गौतम। अरे छोडो यार कितनी बार चंबल का उत्खनन दिखायेंगे। अरे नहीं सर अब तो बहुत बेधडक बेखौफ हो रहा है। चलिये कहानी करने नहीं सिर्फ देखने और आपके लिखने के लिये ही चलिये। अच्छा कब चलें। सुबह पांच बजे। अरे यार इतनी सुबह। हां सारे अवैध काम रात के अंधेरे या तडके सुबह ही होते है। और अगली सुबह साढे पांच बजे हम अंबाह से मुरैना आने वाली सडक पर थे और सामने से आ रहे थे कतार में एक के बाद रेत से भरे हुये ट्रैक्टर। इन ट्रैक्टरों की गति ऐसी थी जैसे वो किसी रेस में भाग रहे हों। ट्रैक्टरों की हेडलाइट जल रही थी। कुछ में गाने बज रहे थे। हर टैक्टर में डाईवर के अलावा दो सहयोगी बैठे हुये जो इधर उधर चैकन्नी निगाह रखे हुये थे। करीब पंद्रह टैक्टरों के काफिले के आगे मोटरसाइकिल पर सवार होकर दो लोग चल रहे थे जिनका काम भी इस कारवां के लिये रास्ता साफ करना था। ये सारे टैक्टर चंबल की नदी से रेत निकालकर मुरैना शहर में प्रवेश कर रहे थे। कुछ के ग्राहक शहर के लोग थे तो कुछ दूसरी जगहों पर जाने वाले थे। मगर जायेगे बीच शहर से ही निकल कर जहां पर कलेक्टर एसपी के बंगले हैं उनके सामने से होते हुये। किसी बात का कोई डर नहीं। मुरैना में सुबह की सैर करने वाले लोग और सेना पुलिस में भर्ती होने की तैयारी में दौड लगा रहे युवा इन टैक्टरों को आसानी से राह दे रहे थे। जिस तरफ से वो गुजर रहे थे उसकी दूसरी तरफ खडे होकर हमारे साथी कैमरामेन होमेंद्र उसे हमारी इनोवा की आड में जल्दी जल्दी शूट किये जा रहे थे। उपेंद्र बुदबुदाये सर स्पीड देखिये भला कोई रोक सकता है इनको। अब आप जितनी जल्दी हो सकते है उतर कर पीटीसी मारिये और ये टैक्टर वाले कुछ समझ पाये उससे पहले ही निकल लीजिये। बस फिर क्या था होमेद्र को इशारा किया और गाडी से उतरने वाला ही था कि हमारा डाईवर जो अब तक चुप था बोल पडा सर इनके पास हथियार भी होते हैं जरा जल्दी करियेगा तब तक मैं गाडी चालू रखूंगा। उपर वाले को याद किया और गाडी के सामने खडे होकर कुछ बोलना शुरू किया तो गले से आवाज ही अजीब सी निकलने लगी। सुबह उठकर बिना चाय और गरम पानी के भागे जो थे। खैर जैसे तैसे एक दो रिटेक में पीटीसी हुआ तब तक टैक्टर पर रेत लेकर आ रहे काफिले के लोग कुछ कुछ समझने लगे थे वो दूसरी तरफ से गालियां देने लगे थे। मगर ये हमें भी मालुम था कि इतनी स्पीड में टैक्टर रोकने का दुस्साहस वो नहीं कर सकते थे। हमने अपना काम किया और गाडी दबा कर बीच शहर में आ गये। उपेंद्र ने बताया कि वैसे तो चंबल के घाटों से मुरैना में आने का मुख्य रास्ता एनएच ही है मगर वहां पुलिस और वन विभाग की तैनाती होती है इसलिये ये टैक्टर वाले नये नये रास्ते से चलते हैं। इन दिनों ये इस रास्ते पर हैं मगर यहां पुलिस का पहरा लगा तो रास्ता बदल देंगे मगर हां आयेगे रोज ही क्योंकि इनके पास कुछ और काम नहीं हैं और इस काम में पैसा बहुत है। मुरैना में चंबल के किनारे के गांवों में टैक्टर खेती के कामों के लिये बल्कि रेत की ढुलाई के लिये ही खरीदे जा रहे हैं। ये बिना लागत का काम है। सुबह चंबल से रेत भरो शहर में पटको,  नकद पैसे पीटो और दिन भर दूसरे काम करो। कहां होगा ऐसा सुख। पुलिस का डर तो भिंड मुरैना के के लोगों में वैसे भी कम होता है। इसलिये धडल्ले से चल रहा है ये सब। मैंने कहा चलो अब ये सब छोडो जरा शहर से बाहर चलकर चंबल के शाट ले लेते हैं। मुरैना के बाहर आगरा मुंबई रोड पर बना चंबल का पुल के उस पार धौलपुर यानिकी राजस्थान लगता है और इस तरफ हमारा एमपी। भारी बारिश में भी चंबल में वो उफान नहीं था जिसके लिये वो जानी जाती है। नदी किनारे बडे बडे गढढे दिख रहे थे जिनसे रेत निकाली गयी होगी। दरअसल चंबल नदी के किनारे में घडियाल सेंचुरी है। ये घडियाल अंडे चंबल की रेत पर ही देते है। घडियालों को बचाने और पर्यावरण की बेहतरी के लिये सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से चार सौ पैंतीस किलोमीटर चंबल के घाटों पर से रेत निकालने पर पूरी पाबंदी है। मगर धडल्ले से रेत निकाली जाती है क्योंकि चंबल की रेत के खरीदार मध्यप्रदेश से ज्यादा राजस्थान में है। रेत से भरा टैक्टर ढाई हजार रूप्ये में तो रेत से भरा टक पचास से सत्तर हजार रूप्ये में बिकता है। चंबल की रेत की खुदाई करो कौन रोक रहा है ये सोच कर गांव के युवक दबंग इस काम में शामिल हैं और उनके ट्रक टैक्टरों को पुलिस और वन विभाग से छुडवाने के लिये नेता मंत्री तो हैं ही। इस तरीके से नीचे से उपर तक पूरा गठबंधन है। मगर ये क्या हम पुल पर खडे हैं और वहीं से दिख रहे थे टैक्टर चंबल के किनारों से रेत निकालते हुये थोडी देर में ही हमें दिखी जेसीबी मशीन जो घाट की ओर जा रही थीं और वहीं पर बनी थी पुलिस चौकी जो घाटों पर इन अवैध गतिविधियों को रोकने के लिये बनी थी मगर वहां पर पुलिस जवान सुबह के नित्य कर्मो में व्यस्त था उसे नहीं थी परवाह कि कौन कहां आ रहा और जा रहा था। मगर लौटते में कुछ और देखना बाकी था। नदी से लौटते में शहर के बाहर हाईवे पर वन और पुलिस विभाग की जांच चौकी है जहां पर रेत से भरे टक ओर टैक्टर रोकने के लिये रखी रहती है लोहे के कांटे वाली प्लेट जिसे खींच कर रोड पर लाया जाता है तो टक के टायर पंचर किये जाते हैं थोडी देर पहले ही एक रेत से भरे टक को रोका गया था उसकी रेत सडक पर फैली थी। वहां तैनात जवानों ने बताया कि हर दिन एक दो ट्रक टैक्टर हम ऐसे ही रोक लेते हैं। देखकर अच्छा लगा कि कहीं तो रेत से भरे टक और टैक्टर रोके जा रहे हैं। 

 

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ब्रजेश राजपूत

तकरीबन पच्चीस साल के पत्रकारिता करियर में अधिकतर वक्त टीवी चैनल की रिपोर्टिंग करते हुये गुजारा। सहारा टीवी से होते हुये स्टार न्यूज में जो अब एबीपी न्यूज के नाम से चल रहा है। इसी एबीपी न्यूज चैनल के लिये पंद्रह साल से भोपाल में विशेष संवाददाता। इस दौरान रोजमर्रा की खबरों के अलावा एमपी यूपी उत्तराखंड गुजरात और महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की रिपार्टिंग कर इन प्रदेशों के चुनावी रंग देखे और जाना कि चुनावी रिपोर्टिग नहीं आसान एक आग का दरिया सा है जिसमें डूब के जाना है। चुनावी रिपोर्टिंग में डूबते उतराने के दौरान मिले अनुभवों के आधार पर अखबारों में लिखे गये लेख, आंकडों और किस्सों के आधार पर किताब चुनाव राजनीति और रिपोर्टिंग मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव २०१३ लिखी है जिसमें देश के पहले आम चुनाव की रोचक जानकारियां भी है।

लेखक टीवी में प्रवेश के पहले दिल्ली और भोपाल के अखबारों में उप संपादक और रिपोर्टर रहे। जैसा कि होता है इस लंबे अंतराल में कुछ इनाम इकराम भी हिस्से आये जिनमें मुंबई प्रेस क्लब का रेड इंक अवार्ड, दिल्ली का मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड, देहरादून का यूथ आइकान अवार्ड, मध्यप्रदेश राष्टभाषा प्रचार समिति भोपाल का पत्रकारिता सम्मान, माधवराव सप्रे संग्रहालय का झाबरमल्ल शर्मा अवार्ड और शिवना सम्मान।

पढाई लिखाई एमपी के नरसिंहपुर जिले के करेली कस्बे के सरकारी स्कूल से करने के बाद सागर की डॉ हरिसिंह गौर विश्वविदयालय से बीएससी, एम ए, पत्रकारिता स्नातक और स्नातकोत्तर करने के बाद भोपाल की माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता विश्वविघालय से पीएचडी भी कर रखी है।