Wednesday, July 24, 2019
भाजपा को बचाएगी कांग्रेस

भाजपा को बचाएगी कांग्रेस

मीडियावाला.इन।

लोकसभा चुनाव सिर पर आ गया है और विपक्षी गठबंधन ने अभी चलना भी शुरु नहीं किया है। उसके पांव अभी से लड़खड़ाने शुरु हो गए हैं। दो-तीन हफ्ते पहले जो न्यूनतम साझा कार्यक्रम या घोषणा-पत्र बनाने की बात चली थी, वह भी अधर में लटक गई है। यदि देश के सबसे बड़े प्रदेश याने उप्र में भाजपा की टक्कर तिकोनी होगी याने वह कांग्रेस और सपा+बसपा गठबंधन से लड़ेगी तो जाहिर है कि विरोधियों के वोट बटेंगे और भाजपा को इसका फायदा मिलेगा। हालांकि उप्र में संसद के उप-चुनावों में भाजपा की शिकस्त इतनी बुरी हुई थी कि यदि ये तीनों विपक्षी दल मिलकर लड़ते तो माना जा रहा था कि उप्र में भाजपा को 15-20 से ज्यादा सीटें नहीं मिल सकती थीं। दूसरे शब्दों में अकेला उप्र ही भाजपा की बधिया बिठाने के लिए काफी था। इसी तरह का ही हाल प. बंगाल में भी हो रहा है। ममता बेनर्जी ने घोषणा कर दी है कि तृणमूल कांग्रेस का गठबंधन किसी से नहीं होगा याने वहां भी त्रिकोणात्मक लड़ाई होगी। बल्कि चतुर्कोणात्मक, क्योंकि भाजपा, कांग्रेस और कम्युनिस्ट भिड़ेंगे तृणमूल से। ओडिशा में नवीन पटनायक भी एकला चालो का राग अलाप रहे हैं। आंध्र में चंद्रबाबू नायडू का ऊंट किस करवट बैठेगा, कौन कह सकता है ? बिहार और दिल्ली में भी कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात अभी तक परवान नहीं चढ़ी है। महाराष्ट्र में प्रकाश आंबेडकर की पार्टी भी कांग्रेस के साथ नहीं जा रही है तो क्या केरल में भी कम्युनिस्ट और कांग्रेसी अलग-अलग लड़ेंगे ? कर्नाटक में अभी तक कांग्रेस और जद (यू) में सीटों के बंटवारे पर खींचतान चल रही है। जम्मू-कश्मीर में विरोधी दलों का एका तो दूर की कौड़ी है। ऐसी हालत में सारे विरोधी दल मिलकर भाजपा को टेका लगा रहे हैं। वे भाजपा पर चाहे जो आरोप लगाएं और उन आरोपों में सत्यता हो तो भी ऐसी हालत में विपक्ष का जीतना असंभव है। इसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी कांग्रेस की होगी, क्योंकि वह ही विपक्ष की एक मात्र अखिल भारतीय पार्टी है। यदि कांग्रेस हर राज्य में गठबंधन के लिए कुछ-कुछ सीटें छोड़ दे तो भी वह भाजपा के बाद सबसे ज्यादा सीटों पर लड़ेगी। वह सबसे बड़ा विपक्षी दल बनेगी, जैसी कि वह आजकल भी है। यह भी संभव है कि वह ही विकल्प की सरकार का नेतृत्व करे लेकिन यह महागठबंधन यदि गड़बड़बंधन बनकर रह गया तो कोई आश्चर्य नहीं कि भाजपा को लगभग स्पष्ट बहुमत मिल जाए या वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर जाए। विपक्ष की सबसे बड़ी कमी यह है कि उसके पास कोई सर्वसम्मत नेता भी नहीं है, जिसका होना इस मूर्तिपूजक देश में नितांत आवश्यक है।

0 comments      

Add Comment


डॉ. वेदप्रताप वैदिक

  • डॉ॰ वेद प्रताप वैदिक (जन्म: 30 दिसम्बर 1944, इंदौर, मध्य प्रदेश) भारतवर्ष के वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, पटु वक्ता एवं हिन्दी प्रेमी हैं। हिन्दी को भारत और विश्व मंच पर स्थापित करने की दिशा में सदा प्रयत्नशील रहते हैं। भाषा के सवाल पर स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी और डॉ॰ राममनोहर लोहिया की परम्परा को आगे बढ़ाने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है।
  • वैदिक जी अनेक भारतीय व विदेशी शोध-संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ रहे हैं। भारतीय विदेश नीति के चिन्तन और संचालन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय है। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने लगभग 80 देशों की यात्रायें की हैं।
  • अंग्रेजी पत्रकारिता के मुकाबले हिन्दी में बेहतर पत्रकारिता का युग आरम्भ करने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है। उन्होंने सन् 1958 से ही पत्रकारिता प्रारम्भ कर दी थी। नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक, बाद में विचार विभाग के सम्पादक भी रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। सम्प्रति भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।