Monday, September 23, 2019
चुनाव में जातिवाद का घटता प्रभाव

चुनाव में जातिवाद का घटता प्रभाव

mediawala.in
                         
         लोक सभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में इस भाग में मैं राजनीति में जातिवाद के ह्रास की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ। भारत का बहुसंख्यक हिंदू समाज हज़ारों वर्षों से जातियों में विभक्त रहा है और भारत की स्वतंत्रता के पश्चात भी चुनावों में यह महत्वपूर्ण रहा है।सभी पार्टियां चुनाव क्षेत्र की जातीय स्थिति देखकर उम्मीदवार की जाति का निर्णय  लेती रहीं है।दक्षिण भारत में विशेषकर तमिलनाडु में जातिगत आंदोलन ने समाज और राजनीति में बहुत पहले ही व्यापक घुसपैठ कर ली थी। उत्तर भारत में,विशेष रूप से हिन्दी भाषी राज्यों में , जाति का दोहन सभी पार्टियों ने अपने तरीक़े से किया है।प्रारंभ में कांग्रेस पार्टी के लिए ब्राह्मण, दलित एवं मुस्लिम समाज का शक्तिशाली गठजोड़ प्रबल समर्थन जुटाता रहा है। फिर भी कांग्रेस स्वतंत्रता संग्राम की उत्तराधिकारी तथा एक राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते सभी वर्गों को साथ लेकर चलने में लंबे समय तक सफल रही। 
        कांग्रेस को जाति के आधार पर सबसे प्रथम चुनौती चौधरी चरण सिंह द्वारा दी गई जब उन्होंने जाट तथा अन्य मध्य कृषक जातियों को एकत्र कर 1967 में भारतीय क्रांति दल का सृजन किया। इन मध्य जातियों को बाद में मंडल कमीशन द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग या OBC का नाम दिया गया।आठवें दशक के अंत तक कमंडल के प्रादुर्भाव के साथ साथ मंडल एवं दलितों का भी स्थान राजनीति में बन गया। आगे आने वाले दो दशकों तक आरक्षण की माँग को एक मुख्य हथियार के रूप में प्रयोग किया गया। OBC वर्ग में मुलायम सिंह, लालू यादव और देवीलाल राजनीति में छा गए। उधर कांशीराम तथा मायावती ने दलित वर्गों का एक ज़ोरदार संगठन खड़ा कर दिया। दूसरी तरफ़ BJP की राजनीति पूरी तरह हिन्दू धर्म पर आधारित रही है। उसे उच्च जातियों का स्वाभाविक समर्थन प्राप्त था। उसने OBC वर्ग को अगड़ा और पिछड़ा वर्गों में बाँट दिया। OBC की पिछड़ी जातियों ने BJP का साथ दिया। इसी प्रकार BSP के वोट बैंक में से ग़ैर जाटवों को अलग करने का सफल काम किया। जातियों के इस प्रकार के बटवारे ने कांग्रेस को पूरी तरह आधारहीन बना दिया। मुस्लिम समाज BJP के अतिरिक्त अन्य सभी पार्टियों को अपनी स्थानीय समझ के अनुसार वोट देने पर मजबूर हो गया। 
    लोक सभा 2019 के  चुनावों में BJP ने उत्तर भारत में अपने वोटों का आधार बढ़ाने के लिए जातिवाद को शिथिल करने का सुनियोजित अभियान चलाया। देश भक्ति, राष्ट्रीयता तथा मज़बूत नेतृत्व के साथ-साथ हिंदुत्व का सम्मोहक मिश्रण जनता के समक्ष प्रस्तुत किया।उत्तरप्रदेश में इसकी दहशत ने SP और BSP को एक मंच पर लाकर खड़ा करदिया।सार्वजनिक रूप से SP प्रमुख अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ने मायावती के चरण छूकर एक नया इतिहास बना दिया। अंकगणित के आधार पर यह सूत्र निकाला गया कि यादव +दलित +मुस्लिम =भारी विजय। ऐसा लगा कि BJP का उत्तर प्रदेश से सफ़ाया हो जाएगा।इसी प्रकार लालू पुत्र तेजस्वी ने चार अन्य जातिगत पार्टियों के साथ एक मोर्चा बनाया। BJP ने इसका सामना करने के लिए अन्य सभी जातियों को अपनी तरफ़ लामबंद किया और सभी जातियों के नवयुवकों को अपनी ओर आकृष्ट करने का प्रयास किया।
     यद्यपि इस चुनाव में राजनीतिक लाभ के लिये जातिवाद का प्रभाव घटा है पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि इन जातिवादी पार्टियों को अपनी जातियों का भरपूर वोट नहीं मिला है। SP और BSP जैसी पार्टियों के सामने मुख्य समस्या यह खड़ी हो गई कि इन्हें अपनी जातियों के तो बहुतायत वोट मिले परंतु इनके विरुद्ध अन्य सभी जातियॉं एकजुट हो गई।दूसरी समस्या इनके समक्ष यह भी उपस्थित हुई है कि इनके अपनी जातियों के नौजवान तबके का पूरा वोट इन्हें नहीं मिला क्योंकि बढ़ते शहरीकरण , शिक्षा तथा अपेक्षाओं के कारण युवाओं का ध्यान अपने जाति के अधिनायकवादी नेतृत्व से हट गया। सभी जातियों और धर्मों के युवा वर्ग का एक छोटा प्रतिशत आज चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए सामने आ गया है। यद्यपि जातिवादी पार्टियों का अपनी जातियों पर प्रभाव लंबे समय तक  बना रहेगा परन्तु यह चुनावों में सफलता दिलाने के लिये अपर्याप्त होगा।
      जातिवादी राजनीति जिसे परिष्कृत भाषा में सामाजिक न्याय की राजनीति कहा जाता है वह देश की सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था में तेज़ी से हो रहे परिवर्तन के कारण कमज़ोर पड़ती जा रही है। फ़िलहाल इसका स्थान हिन्दू धर्म आधारित राजनीति ने ले लिया है। जातियों का हिन्दू धर्म में राजनीतिक विलीनीकरण हो गया है।इस पूरी राजनीति में दुर्भाग्यवश मुस्लिम समाज अप्रासंगिक और असंगत होता जा रहा है।
      राजनीति में सूक्ष्म दूरदृष्टि रखने वालों को इस उथल पुथल के वातावरण में कांग्रेस या उसके जैसी विचारधारा की किसी पार्टी के उत्थान के लिए काफ़ी संभावनाएं दिखाई दे सकती हैं, लेकिन ऐसा केवल ज़मीन से उठा हुआ एक शक्तिशाली नेतृत्व ही करने में सक्षम हो सकेगा। फ़िलहाल जातिवादी राजनीति के घटते प्रभाव का लाभ BJP को मिलता दिख रहा है।

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एन. के. त्रिपाठी

एन के त्रिपाठी आई पी एस सेवा के मप्र काडर के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। उन्होंने प्रदेश मे फ़ील्ड और मुख्यालय दोनों स्थानों मे महत्वपूर्ण पदों पर सफलतापूर्वक कार्य किया। प्रदेश मे उनकी अन्तिम पदस्थापना परिवहन आयुक्त के रूप मे थी और उसके पश्चात वे प्रतिनियुक्ति पर केंद्र मे गये। वहाँ पर वे स्पेशल डीजी, सी आर पी एफ और डीजीपी, एन सी आर बी के पद पर रहे।

वर्तमान मे वे मालवांचल विश्वविद्यालय, इंदौर के कुलपति हैं। वे अभी अनेक गतिविधियों से जुड़े हुए है जिनमें खेल, साहित्य एवं एन जी ओ आदि है। पठन पाठन और देशा टन में उनकी विशेष रुचि है।

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