Wednesday, September 18, 2019
'खतरे की घंटी है'खेतों में जवानों की कमी

'खतरे की घंटी है'खेतों में जवानों की कमी

मीडियावाला.इन।

अपने देश में कई समस्याएं जानते-बूझते और साफ़ साफ़ देखते हुए आती हैं.हम भी बड़ी मासूमियत और सहूलियत से उनकी तरफ से आँखें फेर लेते हैं.

ऐसी ही एक समस्या है खेती से नौजवानों का बाहर होना.नौजवान गाँवों में ठहर नहीं रहे हैं,और शहरों में उनके लिए काम नहीं है.

ज्यादातर किसान खेती छोड़ना चाहते हैं,जबकि खेती यदि आकर्षक और सुरक्षित आजीविका बन जाए,तो ताजिंदगी चलने वाली,उससे अच्छी कोई आजीविका नहीं है.क्योंकि बिना कार,टीवी,फ्रिज,बाईक,स्कूटर और लोहे आदि से जीवन चल जाएगा,लेकिन अन्न के बिना नहीं.इसलिए इस आजीविका को तो क़यामत तक रहना है.इसके बिना अपना अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है.

यही बात, चिंता के साथ करता यह लेख.---------------------------------

देश और प्रदेश में,जब 'बयान-बम'हर क्षण फट या फूट रहे हों,देश की सीमा पर बम फूटने का हल्ला हर पल हो,तब 'रोटी'की बात करने या सुनने में शायद ही किसी की रूचि होगी.

लेकिन याद रखें,कि जीने के लिए मनुष्य जाति हजारों साल से 'रोटी',यानी खेत में ऊगने वाली चीज़ें ही खाती आई है,और शायद आगे भी खाती ही रहेगी.वही 'रोटी'इन दिनों एक नए संकट में है.

इसीलिए इस लेख में बम,बारूद,बयानों,बतौलों,बदनीयती,बदजुबानी और बेईमानी के कान-फोड़ू हल्ले के बीचों-बीच हिम्मत जुटाकर 'रोटी'पर आ रहे उस संकट का दर्द,सबसे बांटने की कोशिश की गई है.

विश्व आर्थिक विकास व सहयोग संगठन (ओईसीडी) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया भर में खेती से युवा पीढ़ी निरंतर दूर होती जा रही है.खेतों में अब जवान लोग दिखना बंद से हो गए हैं.

अमेरिका में खेती में लगे लोगों की औसत आयु 58 वर्ष,जापान में 67 वर्ष और अन्य यूरोपीय देशों में 65 वर्ष है.भारत में खेती से सीधे-सीधे जुड़े लोगों की औसत आयु 40 वर्ष है,जो लगातार ऊपर की तरफ ही जा रही है.यानी पूरी दुनिया में नौजवान लोग खेतों में नहीं हैं,माने वे खेती करना ही नहीं चाहते.

भारत की एक प्रतिष्ठित अकादमिक संस्था 'सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटी'(सीएसडीएस) ने कुछ दिनों पहले ही,इस तथ्य से ऊपर जाकर कहा था कि अपने देश में 76 प्रतिशत किसान खेती ही छोड़ना चाहते हैं.

सीएसडीएस के सर्वेक्षण में भारत के 18 राज्यों के किसान शामिल थे.अपने ही देश की जनगणना से एक और आंकड़ा निकलकर आया था कि देश में प्रतिदिन लगभग दो हजार किसान खेती से बाहर हो रहे हैं.

यह मामला विश्वव्यापी है.इसी 'विश्व आर्थिक सहयोग संगठन'ने एक आंकड़ा जारी किया था कि जापान में अगले आठ-दस सालों में आधे किसान खेती छोड़ देंगे.

इसके पीछे का,ऐसा कोई कारण नहीं है,जिसे हम सब न जानते हों.मेहनत और मेहनताने सहित मौसम की अनिश्चितता ने इसे सर्वाधिक अलोकप्रिय और असुरक्षित आजीविका  बना दिया है.इसीलिए जवान हो या अधेड़ सब इससे दूर भाग रहे हैं.

सारे मुल्कों की सरकारें कहती जरूर हैं कि वे कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाएंगी या किसानों की आमदनी दुगुनी कर देंगी,पर करता कोई नहीं.

अपने देश की ही बात ले लें,तो पाएंगे कि पूरे देश में सरकारी नौकरी में न्यूनतम औसत वेतन 25000 रुपये प्रतिमाह है,जबकि किसान की औसत आमदनी एक हेक्टेयर पीछे लगभग साढ़े छह हजार रुपये महीना है.इसमें उसकी गायों,भैसों और मुर्गे-मुर्गी से होने वाली आमदनी भी शामिल है.यह आंकड़ा इस काम के लिए सरकार द्वारा अधिकृत 'नेशनल सेम्पल सर्वेऑर्गनाइज़ेशन'(एनएसएसओ) का है.एनएसएसओ ने ही यह भी माना है कि अपने यहाँ किसान और गैर-किसान की आय में पांच गुना का अंतर है.

सीएसडीएस ने अपने अध्ययन के दौरान पाया था कि भारत में ग्रामीण प्रष्ठभूमि के 61 प्रतिशत युवा शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार और मनोरंजन के साधनों की उपलब्धि के कारण शहरों में ही बसना चाहते हैं.इनमें से 18 प्रतिशत युवा फौज में जाना चाहते हैं, 12 प्रतिशत इंजीनियर बनना चाहते हैं,शेष युवक बाक़ी कुछ भी बनना चाहते हैं,पर किसानी नहीं करना चाहते.मात्र डेढ़ प्रतिशत युवा खेती करना चाहते हैं,पर उसके पीछे उनकी कोई न कोई मजबूरी है.

ग्रामीण लड़कियों में भी एक बहुत बड़ा प्रतिशत शिक्षक या नर्स बनना चाहता है,पर गाँव में रहकर खेती में हाथ बंटाना वे भी नहीं चाहती.

वैसे तो अपने देश में,स्नातक पाठ्यक्रमों के एक का भी आधा प्रतिशत लोग कृषि,पशुपालन और पशु चिकित्सा के कोर्सों  में प्रवेश लेते हैं,लेकिन उनमें से भी अधिकांश लोग,अपने अध्ययन क्षेत्र को व्यवसाय या आजीविका नहीं बनाना चाहते.बैंक और खाद,बीज व कृषि रसायन बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी ही उनका सपना होती हैं.

इसी अध्ययन के महत्वपूर्ण भागीदार रहे प्रोफ़ेसर योगेंद्र यादव ने तो कहा है कि किसानी में लगे युवकों की शादी में भी दिक्कत आती है.वे बहुत ही कम लड़कियों की पसंद होते हैं.

यह बात हम लोग तब कर रहे हैं जब निरंतर बढ़ रही आबादी के कारण, खाद्यान्न की जरूरतें भी रोज कई कई गुना ज्यादा बढ़ रही हैं.ऐसी ही स्थिति रहने पर,वर्ष 2050 में विश्व की जनसँख्या करीब 900 करोड़ हो जायेगी.जिस रफ़्तार से हम खाद्यान्न उगा रहे हैं,तब उससे तो मात्र 59 प्रतिशत लोगों का ही पेट भर पायेगा.

हमारे प्रधान मंत्रीजी ने यूं ही नहीं लाल किले की प्राचीर से कह दिया है कि जनसँख्या वृद्धि बड़ी चिंता का विषय है.वे जानते हैं कि यदि जनसँख्या,उत्पादन और उत्पादकता का यही अनुपात रहा,तो हम 2030 से ही गंभीर संकट की चपेट में आने लगेंगे.

आज की तारीख में,हम अपने देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर कहते हैं.खाद्यान्न उत्पादन के बड़े बड़े आंकड़े भी हमारे पास हैं,किन्तु हर साल बढ़ रही किसानों की आत्महत्याओं को लेकर हमारे पास कोई जवाब नहीं है. 

डेढ़ करोड़ किसान पिछले कुछ ही सालों में खेती छोड़ चुके हैं.'ग्लोबल हंगर इंडेक्स'में हम 103 वें स्थान पर हैं,ऑक्सफेम के खाद्य उपलब्धता के आंकड़े में हम 97 वें स्थान पर हैं. इन बातों को महज चौंकाने वाली खबर न मानें,ये सब वे बातें हैं,जो पुष्ट आधार पर खड़ी हैं.

और हाँ,प्रधान मंत्रीजी को मालूम है कि अभी हमारा खाद्यान्न उत्पादन 250 मिलियन टन (दस लाख टन का एक मिलियन टन होता है) है.अगले तीस साल में सबका पेट भरने के लिए इसे 350 मिलियन टन तक इसे ले जाना बहुत जरूरी है.लेकिन यदि परिस्थितियां ये ही रहीं,तो खेती के लिए उपलब्ध श्रम शक्ति या मानव संसाधन,आज की तुलना में तब मात्र 25 प्रतिशत ही रहेगा.रोज छोटी होती जा रही 'जोतों'में भारी मशीनें काम नहीं आएँगी. इसलिए मानना होगा कि नौजवानों का खेत में न होना हमारे सारे इरादों पर पानी फेर देगा. राजा राम रहे हों या श्रीकृष्ण,तबसे अब तक गंगाजी और नर्मदा माई में कितना पानी बह गया है,पर हमने किसानों के अभी होने वाले खूनी आन्दोलनों जैसे कभी नहीं सुने या देखे.

सोचिये न,जरूर कोई न कोई बात तो होगी,तभी तो साल दर साल,कहीं न कहीं ये आंदोलन होते हैं और गुस्से में टनों से खेत में उत्पादन होने वाली चीज़ें बर्बाद होती हैं,और कई जानें भी जाती हैं.

यह समस्या बड़ी है,और इसे रोज बढ़ना ही है.यह विकराल रूप ले,इसके पहले आपको और मुझे अपने स्तर पर खाद्यान्न की बर्बादी को रोकना है.

भगवान ने ही अपने समाज के लिए 'माल-संस्कृति'नहीं बनाई है.अपने समाज का 'ताना-बाना' ही कुछ ऐसा है कि जिन्दा रहने के लिए सबको सबकी जरूरत है.यदि अपनी खरीदी का बड़ा भाग हम सीधे उत्पादक या छोटे और मझौले दूकानदार से ही खरीदेंगे तो ग्रामीण रोजगार शायद जीवित रह जाए.

बहुत अच्छी बात है कि सरकार के प्रयासों से कृषि 'लाभ की आजीविका'बने. पर वह आकर्षक और सुरक्षित भी तो हो. तभी प्रतिभाशाली और उद्यमी किस्म के ग्रामीण युवक गाँवों में रुकेंगे.अभी अपना व्यापार सहित विकास का हर हिस्सा शहरों में ही केंद्रित इसलिए जरूरी हैं कि गाँव भी 'बिज़नेस हब'बनें,जो रोजगार पैदा कर युवकों को गाँवों में रोक सकें.

और हाँ,आप कुछ दिनों तक बिना सौंदर्य साधनों के रह सकते हैं,बिना कार,बाइक,फ्रिज,टीवी जैसी चीजों के जिंदगी चल सकती है,पर खाने को रोटी तो लगना ही है.इसलिए यह आजीविका इंसान की ताज़िंदगी रहेगी.जरूरत बस इतनी है कि इसे आकर्षक और सुरक्षित बना दें.

बात मानिये,गाँवों में अधिकाँश घरों में लगे ताले,ट्रेक्टर के स्टीयरिंग के बजाय,चौक-चौबारों पर बीड़ी,सिगरेट पीते,तमाखू खाकर थूकते और ताश खेलते हृष्ट-पुष्ट युवक अच्छे नहीं लगते.

कोई 'माई का लाल'तो पैदा हो,जो गाँवों की जाति-प्रथा को भी 'हाथ लगाए'.हाल ये हैं कि सवर्ण जातियों के युवक खेती में खुद काम करने को अपनी बेइज़्ज़ती समझते हैं.

 

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कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...