Wednesday, September 18, 2019
कश्मीरः अब नया राग

कश्मीरः अब नया राग

मीडियावाला.इन।

भारत में कश्मीर के पूर्ण विलय को अब एक महीना हो रहा है। ऐसा लगता है कि भारत और पाकिस्तान अपनी-अपनी शाब्दिक गोलाबारी से थक गए हैं। दोनों देशों के नेताओं ने अब नया राग छेड़ा है। दोनों एक-दूसरे से बात करना चाहते हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा है कि यदि भारत सरकार कश्मीरी नेताओं को रिहा कर दे और उनसे उन्हें बात करने दे तो वे भारत से संवाद कर सकते हैं। इधर हमारे विदेश मंत्री ने यूरोपीय संघ से ब्रुसेल्स में कहा है कि भारत भी पाकिस्तान से बात करने को तैयार है बशर्ते कि वह आतंकवाद और हिंसा का रास्ता छोड़ दे। अब दोनों देशों के बीच परंपरागत युद्ध और परमाणु-मुठभेड़ की बात पर्दे के पीछे चली गई हैं। सच्चाई तो यह है कि अब भारत को तो अपनी तरफ से कुछ करना नहीं है। उसे जो करना था, वह उसने 5 अगस्त को कर दिया। जो कुछ करना था या अब करना है, वह पाकिस्तान को करना है। पाकिस्तान आज सीमित युद्ध छेड़ने की स्थिति में भी नहीं है। उसकी आर्थिक और राजनीतिक हालत भी डांवाडोल है। कश्मीर के सवाल पर दुनिया के एक राष्ट्र ने भी भारत की कार्रवाई का विरोध नहीं किया है। सिर्फ चीन कुछ बोला है लेकिन वह क्या बोला है, उसका मतलब क्या है, उसे खुद इसका पता नहीं है। वह खुद हांगकांग, सिक्यांग और तिब्बत के कारण फंसा हुआ है। वह पाकिस्तान का साथ देने का नाटक इसलिए कर रहा है कि एक तो उसे पाक ने कश्मीर की 5 हजार वर्ग किमी जमीन भेंट कर रखी है और दूसरा वह बलूचिस्तान को अपना अड्डा बना रहा है। अब चीन और पाकिस्तान के पास सिर्फ एक ही मुद्दा रह गया है। वह कश्मीर किसका है, यह नहीं, बल्कि यह कि वहां मानव अधिकारों का हनन हो रहा है। मानव अधिकारों की रक्षा के नाम पर अनेक अंतरराष्ट्रीय संगठन चीन और पाकिस्तान की बातों पर कान जरुर देंगे लेकिन भारत सरकार की दक्षता पर यह निर्भर करेगा कि वह इस प्रोपेगंडा की काट कैसे करेगी ?

 क्या यह बेहतर नहीं होगा कि गिरफ्तार कश्मीरी नेताओं और पाकिस्तानी नेताओं से भी कुछ प्रमुख भारतीय नागरिक बात करने के लिए भेजे जाएं, ऐसे नागरिक  जिनकी प्रतिष्ठा और प्रामाणिकता किसी सरकारी नेता से कम नहीं है ? इंदिरा गांधी, नरसिंहराव और अटलजी की सरकारें ऐसी करती रही हैं। जरुरी यह भी है कि कश्मीरी जनता की सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाए और उन पर से प्रतिबंध उठा लिए जाएं लेकिन उन्हें यह बता दिया जाए कि हिंसा और आतंक का प्रतिकार अत्यंत कठोर हो सकता है।

 

 

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

  • डॉ॰ वेद प्रताप वैदिक (जन्म: 30 दिसम्बर 1944, इंदौर, मध्य प्रदेश) भारतवर्ष के वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, पटु वक्ता एवं हिन्दी प्रेमी हैं। हिन्दी को भारत और विश्व मंच पर स्थापित करने की दिशा में सदा प्रयत्नशील रहते हैं। भाषा के सवाल पर स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी और डॉ॰ राममनोहर लोहिया की परम्परा को आगे बढ़ाने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है।
  • वैदिक जी अनेक भारतीय व विदेशी शोध-संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ रहे हैं। भारतीय विदेश नीति के चिन्तन और संचालन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय है। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने लगभग 80 देशों की यात्रायें की हैं।
  • अंग्रेजी पत्रकारिता के मुकाबले हिन्दी में बेहतर पत्रकारिता का युग आरम्भ करने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है। उन्होंने सन् 1958 से ही पत्रकारिता प्रारम्भ कर दी थी। नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक, बाद में विचार विभाग के सम्पादक भी रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। सम्प्रति भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।