Wednesday, September 18, 2019
कैसे होगी गफलत में भविष्य की तैयारी

कैसे होगी गफलत में भविष्य की तैयारी

मीडियावाला.इन।

सितम्बर का महीना आते ही हम पूरी शिद्दत से अपने देश की शिक्षा व्यवस्था,शिक्षकों की जिम्मेदारियों और उनके प्रति हमारे व्यवहार और दायित्वों की चर्चा करने लगते हैं .

जो बरसों से होता चला आ रहा है,वही इस दौरान होता है.लेकिन,शेष दिनों में शिक्षा,शिक्षक और स्कूलों को लेकर हमारा अपना जो व्यवहार है,वह भी हमें क़तई शोभा तो नहीं देता.

अंग्रेजी के कालजयी व्यंग्यकार जॉर्ज ऑरवेल ने एक जगह लिखा है कि-"राजनीति की भाषा,अपनी तासीर से ही कुछ ऐसी है,कि उसमें झूठ भी सच सुनाई देता है,और ठंडी हवा में भी ठोस-दृढ़ता का आभास होने लगता है."

शिक्षक दिवस पर होने वाले सारे भाषण और अपनी सबकी बातें,जॉर्ज ऑरवेल की ऊपर लिखी बात से कहाँ अलग हैं.इसके बावजूद,इन बातों का सच जानने,और इस पर बात कर लेने में आज कोई हर्ज़ भी नहीं है.

हम चाँद पर जा चुके हैं,दुनिया की सबसे तेज आगे बढ़ती हमारी अर्थव्यवस्था है,और एशिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताक़त भी हम हैं,आदि-आदि सारे दावे सच हैं.लेकिन,यह सब होते हुए भी हमारे देश के स्कूलों में,जरूरत के मान से सिर्फ आधे ही शिक्षक हैं.जो हैं,उनमें भी आधे,'कच्ची नौकरी'(एड-हॉक) वाले हैं.

स्कूलों में उपलब्ध साधनों की स्थिति तो और भी ख़राब है.और हाँ,दिव्यांग बच्चों के लिए,विशेष प्रशिक्षण प्राप्त शिक्षकों की संख्या में 75 प्रतिशत की कमी है.यह बात लोकसभा में अपने मानव संसाधन मंत्रीजी ने स्वयं स्वीकार की है.

शिक्षा के संवैधानिक मूल-अधिकार के बावजूद,सर्वशिक्षा अभियान के चलते और जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम के रहते अपने देश में लगभग 20 प्रतिशत बच्चे आज भी 'बाल-श्रमिक' हैं.यानी साढ़े तीन करोड़ बच्चे आज भी स्कूल नहीं जाते हैं.जबकि संवैधानिक अधिकार की सुनिश्चितता और दोनों बड़े राष्ट्रीय कार्यक्रमों पर,बजट से बहुत बड़ी राशि जाती है.

भारत के ग्रामीण अंचलों में,जो बच्चे स्कूल जाते भी हैं,उनमें से पहली कक्षा में भर्ती हुए आधे से ज्यादा बच्चे,आठवीं कक्षा तक नहीं पहुँच पाते हैं.

कमोबेश यही स्थिति कई दूसरे देशों में भी है.इसलिए दुनिया की या हमारी,यह चिंता आज की नहीं है.इसी से निजात पाने के लिए नई सहस्त्राब्दी में प्रवेश के साथ ही (वर्ष 2000 में) दुनिया के 155 देशों ने 'विश्व शिक्षा मंच'से एक संयुक्त घोषणापत्र (दकार  डिक्लेरेशन) जारी किया था.इसमें दुनिया के शत-प्रतिशत बच्चों को स्कूल लाने के उपायों को,लक्ष्य बनाकर पूरा करने का संकल्प था.

इस मामले में भारत की बात करें,तो तमाम प्रयासों के बावजूद,आज की स्थिति में,हम उन लक्ष्यों की प्राप्ति में दुनिया के 128 देशों में 105 वें नंबर पर हैं.

इन दुखद आंकड़ों की चर्चा कर,या इन्हें याद करवाकर,अपना किसी के भी विरोध का,या किसी को नीचा दिखाने का इरादा क़तई नहीं है.आप सबको अपने इस दुःख में शामिल करने की बस एक छोटी सी कोशिश है.क्योंकि शिक्षा ही किसी देश को भविष्य के लिए तैयार करने का सबसे जरूरी साधन है.

हमारे देश में बच्चों और युवकों की संख्या 48 करोड़ है.यानी आधी के आसपास आबादी युवा है.निर्णय की प्रक्रिया में भागीदार बनने वाले ये नए-पुराने बालिग,या बालिग़ होने को तैयार खड़े अधिकांश लोग गाँवों में रहते हैं.इनकी शिक्षा या प्रशिक्षण की हमारी तैयारी सचमुच में दयनीय है.

यह सब जानते हुए भी यदि हमने शिक्षा को इतने 'अनमने' ढंग से लिया या गफलत में ही रहे,तो साफ़ है कि भविष्य अच्छा नहीं होगा.यह सच है कि जितनी खराब हालत विद्यार्थियों की भर्ती या पढ़ाई की है,उतनी ही ख़राब हालत शिक्षकों की गुणवत्ता की भी है.

जॉर्ज ऑरवेल ने ही एक जगह कहा था कि "जैसे किसी संपत्ति का दाम और महत्त्व सिर्फ,सिर्फ और सिर्फ उसके स्थान या पते के कारण होता है,वैसे ही शिक्षा और शिक्षक की उपयोगिता और महत्व सिर्फ,सिर्फ और सिर्फ गुणवत्ता के कारण होता है".

शिक्षा की इस गुणवत्ता के पैमाने पर,हमें भरपूर निराशा हाथ लगती है.सबसे पहले तो अपने यहाँ,दस लाख शिक्षकों की सख्त जरूरत है,ऊपर से,हाल फ़िलहाल कार्यरत साढ़े छह लाख शिक्षक आवश्यक या समुचित योग्यता नहीं रखते हैं.

एक पड़ौसी राज्य में शिक्षकों की भर्ती-पूर्व परीक्षा में 95 प्रतिशत उम्मीदवार फेल हो गए थे.एक और राज्य में ऐसी ही परीक्षा में सौ में से दो ही परीक्षार्थी पास हो पाए.

ऐसी हालत में 'फेल में से भी फेल' लोगों को 'पास'करना पड़ा,क्योंकि राजनीति को भी तो यहीं रहना है.शायद आप सहमत हों कि धर्म,शिक्षा,विज्ञान,और सिद्धांत सब अपने यहाँ राजनीति के 'चाकर'की हैसियत में हैं.

यही कारण है कि जिस दिन भी टीवी वालों के पास कोई खबर नहीं होती,वे किसी भी सरकारी स्कूल में,चलती क्लास में,हमलावर की तरह अपना कैमेरा लेकर धमक जाते हैं, और वहां पढ़ा रहे गुरूजी से वन-टू-थ्री,जनवरी-फरवरी या सन्डे मंडे की स्पेलिंग पूछने लगते हैं.तब गुरूजी से ज्यादा अपनी शिक्षा व्यवस्था को शर्मिंदा होना पड़ता है.

इसलिए 'शिक्षक दिवस'पर जिम्मेदारियों और योगदान की चर्चा के साथ,शिक्षा की गुणवत्ता की बात भी जरूर होना चाहिए.

आप जरूर जानते हैं कि अपने देश में शिक्षकों के लिए बीएड,एमएड या डीएड जरुरी शैक्षणिक योग्यताएं हैं.लेकिन इन डिग्रियों या डिप्लोमा को बांटने वाली 90 प्रतिशत संस्थाएं निजी हैं,जो दुकानों की तरह चलती हैं.ये डिग्रियों और प्रमाण-पत्रों की बिक्री करती हैं. कई जगहें तो ऐसी भी हैं,जहाँ ताला लगे बरसों हो गए,पर डिग्रियों की खरीदी-बिक्री अभी भी जारी है.इन्हीं फर्जी डिग्रियों के आधार पर शिक्षकों की भर्ती करने के लिए हम अभिशप्त हैं.

यदि हमें अपने देश का भविष्य ज़रा भी दिखता है,तो इधर नज़र डालना बहुत जरूरी है.एक मजेदार तथ्य पर शायद कम लोगों की निगाह गई हो,कि जितना बजट हमारी सरकार ने कभी दिल्ली में हुए एशियन खेलों पर दिया था,उससे भी आधा बजट 'शिक्षा के मूल संवैधानिक अधिकार'की प्राप्ति हेतु दिया गया है.

जिन लोगों को भी राजकपूर साहब का एक फ़िल्मी गाना 'मेरा जूता है जापानी,सिर पर लाल टोपी रूसी और पतलून हिन्दुस्तानी'याद हो,तो वे यह भी याद करें कि फिल्मांकन में जूता,टोपी और पतलून गुणवत्ता की दृष्टि से बहुत घटिया थे.यह उस समय के घटिया औद्योगिक उत्पादन का प्रतीक था.लेकिन समय के साथ उद्योग ने 'क़्वालिटी मैनेजमेंट सिस्टम'और 'क़्वालिटी-अश्योरेंस'जैसी बातों को प्राथमिकता पर लेकर,आज श्रेष्ठतम गुणवत्ता देना शुरू कर दिया है.

सोचिये,उद्योग ने क़्वालिटी मैनेजमेंट सिस्टम और अश्युरेंस की बात क्यों की होंगी.इसलिए कि क्वालिटी,उपभोक्ता की मांग और जरूरत थी.

आप ईमानदारी से बताएं कि फीस( दाम) या बड़े शासकीय खर्च के बदले,हमारी अपनी मांग,गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की है क्या ? कितने लोगों को मालूम है कि उनका बच्चा क्या पढ़ रहा है,या उसे क्या पढ़ाया जा रहा है.

कितने जन प्रतिनिधियों ने दबाव बनाकर या प्रश्न पूछकर स्कूलों और कालेजों में शिक्षा के लिए सारे के सारे आवश्यक साधनों और पूरे शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित की है.यानी व्यापक स्तर पर समाज इसको जरूरी ही नहीं समझता,और विद्यार्थियों में नंबर और स्कोर की भूख तो है,पर ज्ञान की भूख बिलकुल नहीं है.

आज पैसे वाले ज्यादा पैसे खर्च कर,चमकदार डिग्रियां तो ले लेते हैं,पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कहाँ है.इसलिए कि उनमें भी शिक्षा की भूख नहीं है.गुणवत्ता भूख से आती है,जरूरत से आती है,बातों से नही.

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कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...