Thursday, May 23, 2019
मसूद जी और नेहरू

मसूद जी और नेहरू

मीडियावाला.इन।

एक आदमी है नाम है मसूद अजहर। पेशे से आतंकी हैं। वे भले ही देश के लिए जी का जंजाल बने हुए हैं, लेकिन उन्हें आतंकी नहीं कहा जा सकता, चाहे तो जी जरूर कह सकते हैं। मसूद जी। एक बार पुलवामा में शहीद सीआरपीएफ के परिजन से भी पूछ सकते हैं, कैसा लगता है यह मसूद जी। क्या दुर्भाग्य है कि सवा सौ करोड़ का देश यह सहने का मजबूर है, क्योंकि हमारा पड़ोसी चाइना है और हमारा देश नेता चलाते हैं। 

और नेता भी कौन से, जिनके लिए राजनीति शतरंज की बिसात है, जिस पर हम हिंदुस्तानियों की हैसियत पैदल से ज्यादा नहीं है। भीड़ हैं, जिसे जब चाहे तब आगे कर दिया जाता है। और आप, हमारी आड़ में सत्ता और रसूख का खेल खेलते हैं। क्या कर रहे हैं, राहुल गांधी ने तंज किया इन्हीं मसूद अजहर जी को 1999 में अटल जी की सरकार ले गई थी कंधार। ऐसी नौबत क्यों आई थी, यह सब जाहिर करने की आवश्यकता नहीं थी। क्योंकि विमान अपहरण याद दिलाते तो विकल्प भी सामने रखते होते और सियासत को इसकी आदत नहीं। वह गड़े मुर्दों का भी उतना ही जिस्म खोदकर निकालते हैं, जितना उनके काम का होता है। 

जवाब में रविशंकर प्रसाद ने मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि युरेका यानी नेहरू की विफलताओं का एक और अध्याय खोल दिया। कह दिया कि यूएन की सुरक्षा परिषद की सीट हमें मिल रही थी और नेहरू जी ने उसे चीन को सौंप दिया। गोया, फैसला उन्हीं के हाथ में था कि वे खुद रखें या इन्हें दे दें। तीर चलाना था, चला दिया अब नेहरू और अटल जी के बीच में जंग खड़ी हो गई है। देश के लिए कौन ज्यादा घातक साबित हुआ। इस जंग के बीच सुरक्षा परिषद में चाइना द्वारा लगातार तीसरी बार लगाए गए अड़ंगे का सवाल दफन हो गया। सियासत की यही खासियत है कि जब मुंह छुपाने को कहीं जगह नहीं मिलती है तो वह एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल देती है। 

उसी में असली सवाल गुम हो जाता है। किसी ने इस पर बहस करने की जहमत नहीं उठाई कि अब क्या कर सकते हैं, क्या किया जाना चाहिए। इतना वक्त नेताओं के पास कहां होता है, उन्हें और भी तो आरोप लगाने होते हैं या पुराने आरोपों की काट ढूंढना होती है। कांग्रेस को इसी बहाने मोदी को कमजोर कहने का मौका मिल गया। विदेश यात्राओं की फिजूलखर्ची याद दिलाने का बहाना मिल गया। मोदी-मोदी के नारों और गलबहियों के साथ हुई जिनपिंग की यात्राओं की हकीकत उजागर करने का मौका मिल गया। जवाब में इन्हें वही जी की आड़ मिली, राष्ट्रीय मसलों पर राजनीति के लांछन लगाने का मौका मिला और अंत में नेहरू तो है ही। 

सुरक्षा परिषद में 15 देश मसूद को आतंकी घोषित करना चाहते थे, लेकिन चाइना फिर भी दगा दे गया। उसे पाकिस्तान में बन रहे अपने इकोनॉमिक कॉरिडोर की चिंता थी, 2022 तक वहां बसने वाले 5 लाख चीनी नागरिकों की चिंता थी। उसके प्रांत में कभी आतंक की वजह रहे उईगर मुस्लमानों की फिक्र भी थी। इस्लामिक संगठनों में पाकिस्तान द्वारा उसे दिए जा रहे सहयोग और समर्थन भी याद रहे, लेकिन यह याद नहीं रहा कि वह अपने कितने उत्पाद भारत में खपाता है। कई बाजारों पर उसका कब्जा है। 

मसूद को सुरक्षा देकर वह अपने इतने हित साध रहा है, लेकिन भारत को नाराज करके उसका कोई अहित नहीं होगा, इस आश्वस्ती की वजह हमारी लिजलिजी राजनीति के अलावा क्या हो सकती है। उसे पता है कि जब भी ऐसा मौका आएगा, भारतीय नेता एक-दूसरे की ही टांग खींचते रह जाएंगे। न कोई नीति बदलेगी और न ही कोई कड़ा फैसला लिया जा सकेगा। वे हमारे मोबाइल पर गाने ही सुनते रह जाएंगे और वह पाकिस्तान मदद कर हमें अपनी ही परेशानियों में उलझाए रखने में भी सफल हो जाएगा। ज्यादा बात करेंगे तो दलाई लामा का सवाल खड़ा कर देगा। 

कह ही रहा है पहले दिन से कि आतंकवाद के खिलाफ दोहरे मापदंड नहीं होने चाहिए। जबकि खुद के ग्लोबल टाइम्स में उसने पुलवामा हमले की खबर ब्रीफ में निपटाई है। सिर्फ सूचना भर दी थी। हमले की निंदा करने वाला भी वह आखिरी देश था। मियां मसूद ने हमारे रसूख की धज्जिया नहीं उड़ा दी है क्या। अब थाली में चांद देखते रह गए और चाइना पूरी दुनिया के विरोध के बाद भी पाकिस्तान-पाकिस्तान कर गया। नेताओं को कुछ कहने की इच्छा नहीं है, कहें भी कैसे कि अब तो सुधार जाओ। 
 

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अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.