Monday, July 22, 2019
मुनाफे की आग जैसी हवस और उसमें झुलसता अपना दूध

मुनाफे की आग जैसी हवस और उसमें झुलसता अपना दूध

मीडियावाला.इन।

 

यूं ही याद आया,कि अगले महीने की पहली तारीख को 'विश्व दूध दिवस' है.भारत की सबसे बड़ी अदालत ने,पिछले तीन-चार सालों में अपने यहाँ बिकने वाले दूध और दूध से बने पदार्थों की बिक्री को लेकर अत्यधिक और लगातार चिंता व्यक्त की है.

सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने तो यहाँ तक कहा है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 272 और 273 (खाने-पीने की चीजों में मिलावट रोकने का कानून) में परिवर्तन कर आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक के प्रावधान कर देने चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच से,तब के एक न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन ने कहा था कि निजी तौर पर,मिलावट की जानकारी मिलते ही उन्होंने दूध,चाय,कॉफी या दूध से बने पदार्थ खाने-पीने छोड़ दिए हैं.उसी बेंच में उनके साथ बैठे न्यायमूर्ति विक्रमजीतसिंह ने कहा था कि मिलावटी दूध पीकर 'कानून के दांत भी गिर गए हैं'.

अभी उन धाराओं के तहत अधिक से अधिक छः महीने का कारावास या एक हजार रुपये का अर्थ दंड दिया जा सकता है.

तब के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टी एस ठाकुर,जस्टिस भानुमति और जस्टिस यू यू ललित के सामने भी इसी तरह के कुछ प्रकरण अलग अलग आये थे.मुख्य न्यायाधीश के सामने आये एक मामले में तो,भारत में खाद्य अपमिश्रण रोकने के लिए बनी सर्वोच्च संस्था 'फ़ूड सेफ्टी एंड स्टैण्डर्ड अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया ने ही स्वीकार किया था कि भारत में दूध या दूध से बनी चीज़ों में 70 प्रतिशत तक मिलावट होती है.

सरकार के विज्ञान और तकनीकी मंत्रालय ने किसी दूसरे फोरम पर माना था कि दूध और उससे बनी चीज़ों में मिलावट का यह प्रतिशत 90 भी हो सकता है.

इन सभी मामलों में स्पष्ट रूप से,यह भी माना गया था कि मिलावटी दूध या उससे बनी चीजों के खाने-पीने से मानव अंगों को स्थाई किस्म की बीमारियां या क्षति हो सकती है.

ऐसा नहीं है कि हमारे इस आचरण से,सिर्फ अपनी सबसे बड़ी अदालत ही चिंतित रही है.विश्व स्वास्थ्य संगठन भी,हमारी सरकार को समय समय पर चेता चुका है.उन्होंने भी उन्हीं बीमारियों का ज़िक़र किया है,जो जान लेकर ही जाती हैं.

अपने देश की सारी अदालतों और जांच एजेंसियों के सामने यह सिद्ध हो चुका है कि कमाई बढ़ाने के लिए या मुनाफे की अंधी हवस में,दूध में पानी के अलावा यूरिया,कास्टिक सोडा,कपड़े धोने का पाउडर,स्टार्च,फार्मलीन,पशु-चर्बी और रिफाइंड तेल विभिन्न तरक़ीबों से मिलाये जाते हैं.

दूध में मिलावट के कारण,हम भारतीय ही दुनिया में बदनाम हैं,ऐसी बात बिलकुल नहीं है.दस ग्यारह साल पहले दूध में मिलावट को लेकर,एक बहुत बड़ा घोटाला चीन में भी हुआ था.चूँकि चीन का व्यापार दुनिया के कोने-कोने में फैला है,इसलिए सारी दुनिया में उसके कारण सनसनी फ़ैल गई थी.उनके यहाँ बर्तन बनाने,प्लास्टिक और टाइल्स बनाने के काम आने वाला तत्व 'मेलामाइन' दूध में मिलाया गया था.

'मेलामाइन'एक अजैव पदार्थ है.इसमें 60 प्रतिशत या इससे भी ज्यादा नाइट्रोजन होने के कारण,पहली नज़र में,दूध में मिलावट पकड़ने के,उपलब्ध वैज्ञानिक तरीकों से भी,यह एकदम पकड़ में नहीं आता है.इसकी मिलावट के बाद भी दूध बाक़ायदा प्रोटीन वाला और मलाईयुक्त ही दिखता है.

यह तो तब पता चला जब तीन लाख बच्चे एक साथ बीमार पड़े,और कई नवजात शिशुओं की मौत भी हो गई.दूध तो छोड़िये,अधिक प्रोटीन के नाम पर,पशु-पक्षी आहार तक में मेलामाइन मिला दिया गया.लेकिन,पकड़ में आते ही,या दुष्परिणामों के दिखते ही पूरा विश्व समाज सचेत हो गया था.इसके बाद दुनिया भर में इस पर प्रतिबन्ध लगे और कई लोगों को कड़ी सजाएं भी दी गईं.

लेकिन,आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे देश की 'फ़ूड सेफ्टी एंड स्टैण्डर्ड अथॉरिटी'ने अभी भी एक किलो दूध में एक मिलीग्राम,शिशु आहार में 0 .15 मिलीग्राम और कुछ अन्य खाद्य पदार्थों में तो एक किलो पीछे 2 .5 मिलीग्राम तक की,इसकी स्वीकृत-सीमा जारी रखी है.इस पर देश में,न कोई सवाल उठा,और न किसी ने कुछ कहा.

सामान्यतः उस दूध को भी हानिकारक ही माना जाता है,जो प्लास्टिक और पॉलिथीन खाने वाले पशुओं से निकलता है.सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी चिंता जताई थी. उस सुनवाई में एक प्रदेश के वकील ने कहा था कि एक बार जो गाय-भैंस पॉलिथीन खाने लगे,फिर उसे अच्छा चारा भी दें,तो वह उसे नहीं खाती या नहीं खा सकती.

माना कि डेयरी उद्योग के अपने संकट हैं.सारी दुनिया में दूध पाउडर के दाम,उसकी लागत से आधे तक हो गए हैं.इसका यह मतलब थोड़ी है कि घाटे की भरपाई के नाम पर जहर ही बेचा जाय.इसी कारण दूध में लाभ की लालसा,अब हवस से भी आगे निकल चुकी है.

मजबूरी तो यह भी है कि दूध सहित अन्य खाद्य पदार्थों की मिलावट पकड़ने के लिए किसी भी राज्य में,चाहे वह कितना ही बड़ा या छोटा क्यों न हो,तीस या चालीस फ़ूड इन्स्पेक्टर ही होते हैं. 

दूध हो या किराना,इन व्यापारों के आकार के अनुपात में सरकारी अमला हमेशा बहुत छोटा ही होता है.इन्हें मिली प्रयोगशालाओं और मिले काम को आप देख लें,तो आपको अपने ही देश पर दया आ जायेगी.

दूध के जानकार तीन शब्द उपयोग करते हैं -कृत्रिम दूध,जो रासायनिक चीज़ों सहित पशु चर्बी (इसमें गाय और सूअर की चर्बी शामिल है) से बनाया जाता है.दूसरा जैविक दूध,जो निकाला तो गाय और भैंस से ही है,लेकिन उन्हें हारमोन और एंटीबायोटिक के इंजेक्शन देकर दूध की मात्रा बढ़ाई जाती है.

 

डाक्टरों ने पाया है कि जिन बच्चों को यह 'हार्मोन'वाला दूध पिलाया जाता है,उनमें बहुत कम उम्र में ही दाढ़ी-मूँछ या कन्याओं में 'अर्ली प्यूबर्टी'(प्रकृति द्वारा निर्धारित उम्र के पहले ही मासिक धर्म इत्यादि) आ जाते हैं.

और तीसरा है प्राकृतिक दूध.यह चारा या भूसा खाकर दूध देने वाली गायों या भैंसों से मिलता है.बात मानिये अपने यहाँ प्राकृतिक दूध का,उतना संकट नहीं है कि हमें शेष अविवेकपूर्ण बदमाशियां झेलते रहना पड़े.

हर संकट के समय में,कुछ कुछ सूर्य किरणें जरूर रहती हैं.दूध के क्षेत्र में काम कर रही राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय सहकारी,सरकारी या कारपोरेट संस्थाओं,भले ही उसमें से कुछ बीमार हों,ने शुद्धता के मामले में देश को कभी निराश नहीं किया है.

नए चलन के अनुसार,बेंगलुरु के पास या अन्य दक्षिणी राज्यों में,कुछ युवक बड़ी-बड़ी नौकरियां और भारी-भारी पैकेजेस छोड़कर प्राकृतिक दूध उत्पादन में आ लगे हैं.इनके स्टार्ट-अप्स को समाज से भी खूब शाबाशी मिली है.ऐसे एक दो नहीं,कई हैं.उन्हें और उनकी सफलता को देखकर सारे भारत में शुद्ध दूध के व्यापार का रुझान काफी बढ़ा है.उनकी ग्राहक संख्या और उनका 'टर्नओवर'आपको आश्चर्य में डाल देगा.

 

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कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...