Sunday, May 19, 2019
बोलती गुड़िया क्या मुख्य भूमिका में आएगी?

बोलती गुड़िया क्या मुख्य भूमिका में आएगी?

मीडियावाला.इन।

अरे इंदिरा गाँधी की पोती आई है...बिलकुल इंदिरा जी जैसा बोलती है...साड़ी उनकी ही तरह पहनती है...बिलकुल उनकी कॉपी है...कितना अच्छा बोला ना...प्रिंयका गांधी...रोड शो में यहां से वहां तक हर जगह भीड़, हर जगह उनकी एक झलक पाने का उन्माद...यदि भीड़ ही आकलन है तो बहुत सफल रहा प्रियंका गांधी का इंदौर में रोड शो...लेकिन आम लोगों को सुना, उनके चेहरो को पढ़ा और गुना जाए तो वे बोलती गुड़िया से बहुत कुछ चाहते हैं...

राजनीति के शुरुआती दौर में इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहा जाता था लेकिन जब वे बोली तो खूब बोली इतना बोली की बुद्ध मुस्कुरा उठे। उनके विपरीत इंदिरा की पोती हमेशा बोली जब राजीव गांधी की निर्ममता से हत्या कर दी गई तो माँ को ढांढस बंधाया फिर कभी भी राजनीति में सक्रीय भूमिका नहीं निभाई...पर्दे के पीछे ही रही...कभी माँ सोनिया तो कभी भाई राहुल के पीछे, कभी उन्हें गिरने ना दिया। इस बार वे सामने आईं लेकिन वोट राहुल के नाम पर मांगे....जबकि रोडशो में शामिल हर आंख सिर्फ प्रियंका को निहार रही थी...हर कान सिर्फ उन्हें ही सुन रहे थे...उनका आगाज ही नहीं बोलने और भाषण देने का अंदाज भी इंदिरा की ही तरह था। वे रटा-रटाया भाषण नहीं बोल रही थी...लोगों को कनेक्ट कर रही थीं....जुमलों का जवाब जुमलो और चुटकुलों से दे रही थीं...उन्होंने चुनावी मैनीफेस्टो भी बिलुकल आम भाषा में समझाया...राहुल की भाषा और भाषण में सुधार हुआ है लेकिन वे आज भी डायस का भाषण देते हैं...आम लोगों के मन और आत्मा को नहीं छूते। कनेक्ट नहीं कर पाते वहीं प्रियंका अपनी दादी की तरह लोगों के मन को पढ़कर बोलने में माहिर हैं...संवाद स्थापित कर लेती हैं।

इंदौर में अपने रोड-शो में वे अपने भाषण में मोदी के अतिप्रचार को यह कहकर टाल जाती हैंः- आपने टीवी पर पीएम के भाषण देखे होंगे...बोर हो गए क्या...फिर पीएम को विश्व का सबसे बड़ा अर्थशास्त्री कहती हैं जो नोटबंदी औऱ जीएसटी लेकर आए...फिर उन्हें रक्षा मंत्री के पद से नवाज देती हैं और बिना राफेल का नाम लिए आम लोगों के मन में राफेल से सबंधित सारे सवाल जिंदा कर दिए...5 साल की सरकार ने सोचा क्लाउडी है मौसम, नहीं आऊंगा राडार में...लेकिन जनता जसब जानती हैं। फिर चुटकुले में समझा देती हैं, प्रधानसेवक नए रंगरूट हैं वे सवाल नेहरू-गांधी पर उठा रहे हैं, जिन्होंने सालों देश का नेतृत्व किया है। वो फिर एक चुटकुला सुनाते हुए कहती हैंः वे रेस में हारे हुए उस बच्चे की तरह हैं, जो रेस के अंतिम दौर में गिर जाता है और अपनी असफलता का कारण दूसरे बच्चों ने गिरा दिया, यह कहता है। कहकहे के बीच प्रिंयका ने मोदी को हल्ला करने वाला, अपनी हार का दोष दूसरों पर मढ़ने वाला बच्चा बता दिया। कह दिया...अभी तो बच्चा है, राजनीति में कच्चा है। फिर दोहरा दिया, आम जनता में बड़ा विवेक है और उन्हें बचपन से जनता के विवेक का स्वागत करना सिखाया गया है, जाते-जाते वे अपने विनम्रता का परिचय दे गईं जब मधुरता से उन्होंने कह दिया ट्रेफिक रुका आपको कष्ट हुआ होगा...माफ कीजिएगा....

लेकिन कुछ और भी है जो इस रोड शो में मेरे सामने आया... इंदौर के रोड शो में भी जैसे ही वे अपने भाषण के अंतिम चरण में आती हैं...राहुल गाँधी की राजनीतिक रूप की तारीफ करती हैं तो आम भीड़ के चेहरे पर भाव बदलने लगते हैं। प्रियंका राहुल को वोट देने की इल्तजा करती हैं...तो भीड़ में से कुछ की फुसफुसाहट सुनाई देती है...यह कब सब संभालेंगी...आखिर यह इंदिरा गाँधी की पोती हैं। राहुल पर विदेशी होने का ठप्पा लगाने वाले विरोधी भी प्रियंका की मौजूदगी को झुठला नहीं पाते...

तो ये थी प्रियंका गाँधी...इंदिरा गाँधी की पोती...नहीं कुछ और भी है उनके पास...जो उन्हें इंदिरा से जुदा करता है और पिता राजीव के बेहद करीब। वे भी अपने पिता की तरह राजनीति में अपनी इच्छा से आना नहीं चाहती लेकिन वक्त लगातार उन्हें पुकारता जा रहा है। जिस ब्लू लाइन को लेकर उन्हें बार-बार घेरा जाता है...वंशवादिता का आरोप लगाया जाता है, वही ब्लू लाइन उन्हें राजनीति के घेरे में खींचती जा रही है। राजीव...संजय और इंदिरा के नहीं रहने पर आए...प्रियंका आखरी कोशिश कर रही हैं...राजनीति को छूकर निकल जाने की। मुझे 1999 की प्रियंका याद आ रही हैं...जब वे चुनाव अभियान के दौरान यह कहती हैं...मेरे दिमाग में यह बात बिलकुल स्पष्ट है, राजनीति शक्तिशाली नहीं है, बल्कि जनता अधिक महत्वपूर्ण है औऱ मैं उनकी सेवा राजनीति से बाहर रहकर भी कर सकती हूं...तब से अब तक वे कई साक्षात्कारों में स्पष्ट रूप से कह चुकी थीं...मैं राजनीति में जाने की इच्छुक नहीं हूं...तब से अब तक कांग्रेस की स्थिति भी बहुत बदल चुकी है...उनकी ना-ना थोड़ी-थोड़ी हाँ-हाँ में बदल रही है...अब वे कांग्रेस कमेटी की राष्ट्रीय महासचिव हैं....एक ऐसी महिला है जो आधुनिक सदी की है...जींस-साड़ी-सूट सबमें बेहद सहज...बच्चों के स्कूल के कार्यक्रम के गेम्स में भाग लेने से लेकर रोडशो के मिनी ट्रक में सबमें सहज...प्रियंका एक बोलती गुड़िया है...जिन्हें सक्रीय राजनीति में देखने की इच्छा है।

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श्रुति अग्रवाल

कई बार जीवन में ऐसे पल आते हैं जो सदियों तक किस्से के रूप में याद रहते हैं... उन्हीं किस्सों की किस्सागोई में गुम श्रुति अग्रवाल पत्रकारिता का चिरपरिचित चेहरा है। वे लम्बे समय तक राजस्थान पत्रिका और सहारा समय में पत्रकार रही है।

ट्वेल्व पाइंट ब्लॉग संचालित करते हुए श्रुति ने कई अनछुए पहलुओं पर कलम चलायी है।