Monday, August 26, 2019
भारत: कायम है सलमान का जादू

भारत: कायम है सलमान का जादू

मीडियावाला.इन।

सलमान की फ़िल्मों के बारे में लिखते हुए मैं थोड़ा पूर्वागृही हो ही जाता हूँ | भद्रलोक के आभामंडल से आने वाले नायकों से इतर सलमान की छवि आम आदमी के बीच से उठने वाले नायक की है , जो उसकी फ़िल्मों के माध्यम से दर्शकों के दिलों में पैठी है | भारत और देश प्रेम का फ़ार्मुला मनोज कुमार ने ऐसा अपनाया था की एक समय इंडस्ट्री के लोग उन्हें भारत कुमार ही कहने लगे थे | बहरहाल सलमान की फ़िल्म भी इन्ही सब फ़ार्मूलों से भरी है , ये बात दूसरी है की कहानी का ओरिज़िनल प्लॉट कोरिया की एक फ़िल्म से लिया जाकर उसका भारतीयकरण कर दिया गया है |
फ़िल्म की कहानी देश के विभाजन से शुरू होती है जहाँ एक बालक भारत ( सलमान ) अपने स्टेशन मास्टर पिता ( जैकी श्राफ )के साथ मीरपुर पाकिस्तान में रह रहा है | विभाजन के बाद एक ही देश के लोगों में दो देशों के हो जाने की मची अफ़रातफ़री के बीच भारत आते वक़्त भारत का पिता और उसकी छोटी बहन वहीं छूट जाते हैं | भारत से उसका पिता वादा लेता है की वो दिल्ली जाके अपनी बुआ के पास जाएगा और परिवार में सबका ख़याल रखेगा | भारत अपने वादे से बँधा अपनी बुआ के किराना स्टोर में आ जाता है और फिर प्रवासन के साथ जुड़ी मुसीबतों से दो चार होते हुए जीवन की गाड़ी अपने परिवार का पालन करते हुए इस आशा में चलाता रहता है की एक दिन उसका पिता उसके पास आएगा | उम्र के सत्तर पड़ाव पूरा करने के समय में एक दुविधा फिर आती है और वो है दुकानों को तोड़ कर माल बनाने की योजना | बाक़ी के दुकानदार इस ऑफ़र के लिए तैय्यार हैं पर भारत सशंकित है की यदि दुकान ही ना रही तो उसका पिता उसे कहाँ ढूँढेगा | इस उहापोह के बीच परिस्थितियाँ और उसके अंतर्मन में छिपा पिता ही उसे ये राह दिखाता है की उसने अपने कर्तव्य का भलीभाँति पालन किया है , इसलिए अब इस पाश से मुक्त हो वो जीवन चक्र को स्वाभाविक गति से बहने दे |
फ़िल्म की कहानी कई कालखंडों में बटी है , विभाजन की त्रासदी , बेरोज़गारी की समस्या , वर्ल्ड कप की पहली जीत आदि आदि इत्यादि | और इन सब को ऐसे एक साथ घुसाने में कहानी लम्बी और भटक़ाऊ लगने लगती है | एक दूसरे सिरे को भी ठीक से पिरोया नहीं गया है | कुछ दृश्य अनावश्यक हैं , कुछ रोमांच बेवजह हैं , और कुछ प्रसंग अतार्किक हैं पर इन सबके बावजूद सलमान अपने पूरे जादू से हर वक़्त फ़िल्म में आपको लुभाते रहते हैं | कैटरीना और सलमान की जोड़ी फ़िल्म में ख़ूब जमी है | सुनील ग्रोवर ने विलायती के रूप में अपना किरदार ग़ज़ब निभाया है | सलमान ने जब कपिल शर्मा को उसके शो को पुनः शुरू करने में मदद की तो ये ख़याल मेरे मन में आया था की सुनील को क्यूँ उसमें स्थान नहि दिया पर इस फ़िल्म के हर द्रश्य में वो सलमान के साथ बराबर से हैं , जैसे कभी जानी वाकर दिलीप कुमार के साथ रहा करते थे | इस तरह दोनों ही बातें हुईं जो बड़ी ज़िम्मेदारी देकर सलमान ने कपिल से बड़ा रुतबा सुनील ग्रोवर को दिया वैसा ही प्रतिसाद सुनील ने अपने अभिनय क्षमता का प्रदर्शन कर फ़िल्म में दिया |
फ़िल्म के कुछ दृश्य ऐसे रचे हैं जो सीधे हृदय को स्पर्श करते हैं , जैसे भारत पाकिस्तान में विभाजन के बिछड़े लोगों को टी वी के माध्यम से मिलाने के नज़ारे या पाकिस्तान से आने वाली मुसाफ़िरों की लाशों से भारी ट्रेन के दृश्य | कुछ कमियाँ हैं तो कुछ हृदयस्पर्शी संवाद , कुछ गुदगुदाने वाले सटीक व्यंग्य हैं तो कुछ झिलाऊ फटीचर मज़ाक़ पर कुल मिलाकर मसाला खिचड़ी है जिसका आनंद लिया जा सकता है |

 

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आनंद कुमार शर्मा

आनन्द शर्मा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं, वर्तमान में आयुक्त अनुसूचित जाति विकास मध्य प्रदेश शासन के पद पर पदस्थ और कविता, फ़िल्म समीक्षा, यात्रा वृतांत आदि अनेक विधाओं में फ़ेसबुकीय लेखन| विशेष तौर पर मीडिया वाला के लिए ताज़ा फ़िल्म समीक्षा