Wednesday, June 19, 2019
अब तो देखें कि'कम्युनिकेशन गैप' है कहाँ 

अब तो देखें कि'कम्युनिकेशन गैप' है कहाँ 

मीडियावाला.इन।

 

अभी पिछले हफ्ते'विश्व पर्यावरण दिवस'था.उसके चार दिन पहले 'विश्व दूध दिवस'था.इसके पहले,लगे-लगे महीनों में 'विश्व पृथ्वी दिवस','विश्व पानी दिवस' और 'विश्व वन्य प्राणी दिवस'थे.

साफ़ साफ़ कहें तो ये सब वार्षिक कर्मकांड से ज्यादा कुछ नहीं रहे.प्रकृति से जुड़े ये दिन,बर्थ-डे की तरह मनाये जाने लगे हैं,व इन दिनों में अखबारों का 'पेज थ्री'थोड़ा ज्यादा रंगीन हो जाता है.

गंभीर होकर बात करें,तो पाएंगे कि इन सभी विषयों में हमारी अपनी पीढ़ी ने,इतना नुकसान किया है कि अब कुछ भी अच्छा होने,या बेहतर के लौटने की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए.

इन दिनों पड़ी गर्मी के बारे में वैज्ञानिकों ने कहा है कि विश्व के ज्ञात इतिहास में,दूसरी बार ऐसी गर्मी पड़ी है.ये लोग पृथ्वी के इतिहास की बात कर रहे हैँ.इस गर्मी के कारण किसी के लिए भी,बिलकुल अनजाने नहीं हैं.हमने पृथ्वी को इतना छेड़ा है कि अब उसे कहीं का नहीं छोड़ा.

हमारे 'विकास सूरमा'कहते हैं कि विकास करना है,तो प्रकृति की बलि तो देना ही पड़ता है.माना कि हमारे जीवन की सुख सुविधाओं और प्रगति के लिए विकास चाहिए,किन्तु पीढ़ी दर पीढ़ी,मनुष्य जीवन के लिए प्रकृति भी तो जरूरी है,बल्कि ज्यादा जरूरी है.

विकास के नाम पर हमने अपनी अगली पीढ़ी के लिए राजभवन,राजमार्ग और रेल तो बना लिए हैँ,लेकिन जीने के लिए दूषित पानी,प्रदूषित हवा,जहरीली जमीन और जहरीले खाने का इंतज़ाम पक्का कर दिया है.

यह तय है कि इस विकास से बनी पूँजी,जो हम छोड़ जाएंगे,उससे हमारे बाद की संतानें ऑक्सीजन खरीदकर सांस ले लेंगी,और हाइड्रोजन व ऑक्सीजन को रसायन शास्त्र में पढ़ाये गए अनुपात में मिलाकर कारखानों में पानी बन जाया करेगा.

स्टीफन हाकिंस ने कहा था कि 'विकास के नाम पर हम सब आत्महत्या करने जा रहे हैं',उन्होंने यह भी कहा था कि 'मौत के गड्ढे का कोना,बस आ ही गया है,और वापस जाने के सब रास्ते समाप्त हो गए हैं'.उन्होंने अपने समाज को 'सुसाइडल सोसाइटी ' भी कहा था.

यह सारा बिगाड़,अचानक या दुर्घटना वश नहीं हुआ है,हमारे पूरे संज्ञान में हो रहा है.हम उसके लाभ-हानि सब जानते हैं.इस विषय पर इतना लिखा गया है कि खर्च हुई स्याही से सात नए समुद्र बन सकते हैं,और बिना अपना भविष्य जाने,हम सब यह पढ़-पढ़ कर ऊब भी गए हैं.

इसके दूसरे पहलू पर,बैठे-ठाले पता किया,तो पाया कि अपने देश की साढ़े बयालीस करोड़ जनता अखबार पढ़ती है.इनके 32 प्रतिशत ग्रामीण और 53 प्रतिशत शहरी लोग ऐसे हैं,जो हफ्ते के सातों दिन अखबार पढ़ते हैं.

कुछ राज्यों में शत प्रतिशत घरों में टीवी और रेडियो हैं,किन्तु कुछ में कम होने के कारण इनका राष्ट्रीय प्रतिशत 66 आता है.

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की साइट पर जाएँ,तो पता चलेगा कि अपने देश में 800 से ज्यादा विश्वविद्यालय,38 हजार कॉलेज और 12 हजार से कुछ ज्यादा,विभिन्न विषयों के उच्च-शिक्षा संस्थान हैं .

पत्र-पत्रिकाओं,रेडियो-टीवी और शिक्षण संस्थाओं की फेहरिस्त सामने रखने का एक ही उद्देश्य है कि ये सब,सिर्फ अच्छी ही बातें अपने पाठकों,श्रोताओं या विद्यार्थियों को बताते होंगे.इन अच्छी बातों में वैश्विक जलवायु परिवर्तन से होने वाली हानियां,भूमण्डल की रोज बढ़ती गर्मी और वायु के साथ पानी का रोज बढ़ता प्रदूषण जरूर बताया जाता होगा.

ऊपर से,इन संकटों से हम सबको सावधान करने के लिए,सरकार के अपने विभाग भी हैं,जो जी-जान से इस काम में लगे हैं. निश्चय ही इसमें बहुत पैसा भी खर्च होता होगा.

अपने ऐतिहासिक और प्राचीन ग्रन्थ,परम्पराएं,रीति-रिवाज या किस्से कहानियां भी उन तमाम बातों से भरे पड़े हैं,जो प्रकृति व पर्यावरण-रक्षा की बात करते हैं.

इतना सब होने के बावजूद स्थितियां सुधरने के बजाय रोज बिगड़ रही हैं.बावजूद इन सबके,हमारी ही पीढ़ी है,जो विकास के नाम पर निसर्ग से सिर्फ ले ही ले रही है,उसे उसका वाजिब हिस्सा उसे लौटा नहीं रही है.

इसलिए,ज्ञान के सभी वाहकों को गंभीरता से सोचना होगा कि गलती कहाँ हो रही है. दुनिया भर में 'सम्प्रेषण'और 'संवाद'(कम्युनिकेशन) विज्ञान की तरह विकसित विषय हो चुके है.किसी को कोई शक नहीं है कि हमारा कोई भी संवाद-माध्यम गलत बात कर रहा है,फिर भी सिर्फ पर्यावरण रक्षा की बात निशाने पर क्यों नहीं पहुँच रही है.

चूँकि सूचना,संवाद,सन्देश या संचार के कई अधिकारी विद्वान अपने आसपास ही रहते हैँ,इसलिए पहला सवाल मन में यही आया कि उनकी असफलता की बात उनके द्वारा पहचानी क्यों नहीं गई,या उनके अगले अध्ययनों से यह असफलता कैसे छूट गई.उन्होंने यह महसूस क्यों नहीं किया कि कहीं न कहीं कोई गलती हो रही है.उनसे यह उम्मीद इसलिए है,क्योंकि वे भी तो समाज के बराबरी के 'स्टेकहोल्डर' हैं.उनकी अपनी जिंदगी भी तो इसी से जुड़ी है.

आप ही बताइये कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक वस्तु 'पान मसाला' या इसी तरह की कई वस्तुओं के प्रभावी विज्ञापन लिखकर और दिखाकर हमारे  ही 'कॉपी राइटर्स','विजुअलाइजर्स'या कम्यनिकेटर्स ने कमाल किया है.

उन्हीं के कारण इन वस्तुओं की बिक्री साल दर साल बढ़ी है.लेकिन,स्वच्छ पर्यावरण,हवा,पानी,पृथ्वी और आकाश के लिए लिखे गए सन्देश सफलता पूर्वक,अपने ही लोगों के गले क्यों नहीं उतरे या दिल की गहराई तक क्यों नहीं गए.

चुनाव जीतने या हारने वाले लोग भी,अपने फैलाये सच-झूठ का,इन्हीं सूचना माध्यमों से उपयोग-दुरूपयोग कर सफल हो जाते हैं.उनके लिए भी कलम,कल्पना और भाषा इन्हीं 'संवाद-श्रेष्ठों 'की लिखी रहती है.

ऐसी स्थिति में हम क्यों न मान लें कि संदेशों की असफलता या भूल,'संवाद'की मूल गंगोत्री से ही शुरू हो रही है.

सरकार,लेखक,प्राध्यापक,अध्यापक,पत्रकार,समाज व धर्म के सभी धुरंधर इसमें शामिल हैँ.

पहले यह कहा जाता था कि समाज को सही दिशा में ले जाने वाला 'नेता' होता है.लेकिन अब की राजनीति में यह होता है कि जिधर भी भीड़ जा रही हो,उसके आगे दौड़कर या कूदकर खड़ा होने वाला व्यक्ति 'नेता'हो जाता है.यानी समाज में रह रहे हर आदमी की पर्यावरण रक्षा में असफल होने में बराबरी की भागीदारी है.

इसके बावजूद,देश के सुदूर इलाक़ों में,समाज को नेतृत्व देकर,अपने प्रयासों में समाज को शामिल कर,शुद्ध हवा,पानी,स्वस्थ भूमि या पौष्टिक अन्न के साथ जीवन को बचाने के छोटे-छोटे  सैकड़ों और सफल उदाहरण हैं.

सुदूर रेगिस्तान में स्थानीय नेतृत्व और समझ के बेहतरीन उदाहरण आपको मिल जाएंगे,तो फिर ये पूरे देश में क्यों नहीं फैलते,या मिलते.

सारी दुनिया में,सभी मामलों में,सरकारें ही सबसे पहली 'पंच-बैग' होती हैँ,हर बुराई का पहला मुक्का उन्हीं पर पड़ता है.यहाँ भी यही स्थिति है.पर्यावरण सुधार के मामले में अभी भी उम्मीदों का केंद्र सरकारें ही हैं.

लेकिन विश्वास कीजिये कि खेती-बाड़ी और पर्यावरण में सुधार अब सरकारों के हाथ से पूरी तरह से निकल गए हैँ.वे कुछ नहीं कर सकतीं.लोगों को ही अब संवेदना के साथ इसे समझना होगा,इस पर चिंता करना होगा और अपने निजी हाथ में जितना भी संभव हो,उतना करना होगा.

ध्यान रखें विज्ञान इस मामले में अपने हाथ ऊँचे कर चुका है.पर्यावरण पर काम कर रहे शीर्ष वैज्ञानिक गस स्पेथ ने कहा है कि 'हम वैज्ञानिक यह समझते रहे कि पर्यावरण की सबसे बड़ी समस्याएं जैव विविधता की समाप्ति,प्राकृतिक व्यवस्था का पूरी तरह लड़खड़ाना और जलवायु परिवर्तन हैँ.हम यह भी समझते रहे कि अपने श्रेष्ठ वैज्ञानिक ज्ञान व अनुभव से हम इनसे निपट भी लेंगे.लेकिन हम गलत थे.इसके सबसे बड़े कारण मनुष्य के स्वार्थ,लालसा और एक दूसरे के प्रति संवेदनहीनता हैँ.हम वैज्ञानिकों को इनसे निपटना बिलकुल नहीं आता.

ऐसी स्थिति में दुनिया भर के 'कम्युनिकेटर्स' को ही अध्ययन कर,रास्ता बताना होगा कि 'कम्युनिकेशन गैप' क्यों व कहाँ हुई है,या हम कम्म्युनिकेटर्स (लेखक,संपादक,पत्रकार,अध्यापक,प्राध्यापक सामाजिक व धार्मिक नेता) से लोगों से बात करने में कहाँ गलती हुई है.उन्हें पूरी निष्ठुरता से अपना खुद का विश्लेषण करना ही होगा.

 

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कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...