Wednesday, July 24, 2019
बजट मेरी नजर में

बजट मेरी नजर में

मीडियावाला.इन।

बजट में कमलनाथ सरकार के चुनावपूर्व घोषित वचनपत्र के प्रति संकल्प साफ दिखता है। राइट-टु-वाटर निसंदेह एक क्रांतिकारी कदम है। नदियों के पुनर्जीवन की चिंता समय की माँग है। सरकार इस महत्वपूर्ण जनाधिकार को यथार्थ के धरातल पर कैसे उतारेगी यह देखना होगा। बजट के बाकी सभी प्रस्ताव व प्रावधान 'जो है सो है" जैसा है। एक दिन पहले जारी आर्थिक सर्वेक्षण में स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवनस्तर को लेकर गंभीर तथ्य सामने आए हैं। शिक्षा सूचकांक में हम 29 राज्यों में 23वें नंबर पर, गरीबी में 27वें नंबर पर हैं। शिशुओं की मृत्युदर व कुषोषण और माताओं में रक्ताल्पता की स्थिति गरीब अफ्रीकी देशों जैसी है। जाहिर है इसके लिए हम छह महीने की कमलनाथ सरकार को दोषी नहीं ठहरा सकते लेकिन बजट में स्वास्थ्य, शिक्षा व जीवनस्तर की उपरोक्त चुनौतियों को लेकर वैसी चिंता नहीं दिखती जैसी की अपेक्षित है। कोई नया टैक्स नहीं और न ही राजस्व अर्जित करने का कोई उपक्रम ऐसे में नौजवान वित्तमंत्री तरुण भनोत को कुछ नवाचार करने के लिए बचता ही नहीं। बजट बताता है कि कांग्रेस सरकार के कदम साफ्ट हिंदुत्व की ओर तेजी से बढ रहे हैं। अध्यात्म विभाग की स्थापना और पुजारियों के लिए अलग कोष की स्थापना के प्रावधान तथा पंचायत स्तर पर गोशालाओं की स्थापना के संकल्प यही बताते हैं। राजनीति से परे यें कदम उचित भी हैं।

तीन मेडिकल कालेजों की स्थापना के प्रस्ताव तो हैं पर जो मेडिकल कालेज पहले से ही संचालित हैं वे ही मेडिकल कौंसिल के राडार में रहते हैं। खजाने में धन है नहीं, रिक्तियों की संख्या लाखों में है। कई महकमों का प्रशासन एड्हाक पर है। प्रदेश की वित्तीय स्थिति और केंद्र में प्रतिस्पर्धी पार्टी की सरकार को देखते हुए भविष्य सुखद नहीं दिखता है। बजट में कोई जोखिम लेने, बोल्ड स्टेप उठाने से परहेज बताता है कि सरकार में बहुमत को लेकर आत्मविश्वास डावांडोल है। बजट चर्चाओं में आर्थिक सर्वेक्षण के निष्कर्षों के आधार पर सत्ताधारी दल प्रतिपक्ष को घेरकर असहज कर सकता है, पर इसकी उम्मीद कम ही दिखती है। भाजपा सरकार ने अपने बड़े नेताओं के नाम पर जन कल्याण की जिन फ्लैगशिप योजनाओं को संचालित किया था उनमें से प्रायः सभी बंद कर दी गई हैं या बंद कर दी जाएंगी। बजट चर्चा में सरकार को इसी मुद्दे पर विपक्ष घेर सकता है। कुलमिलाकर इस बजट में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे अर्थशास्त्रियों से समझने की जरूरत पड़़े।

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