Sunday, June 16, 2019
चुनावी की चकल्लस में अनदेखा जलता-झुलसता ग्राम-समाज

चुनावी की चकल्लस में अनदेखा जलता-झुलसता ग्राम-समाज

मीडियावाला.इन।

इन दिनों हम सब चुनाव के रोमांच में गाफिल है. वहीँ,भारत के ग्रामीण-समाज का एक बड़ा हिस्सा,इस डर में सो,जाग और जी रहा है कि किस क्षण,कोई आग उसके आसपास लगकर जान-माल के लिए  खतरा न बन जाय.

जिसका खेत कटा नहीं है,उसकी आँखें निरंतर डरी हुई हैं,कि कोई भी अपने ही खेत में रात के अँधेरे में 'नरवाई'न जला दे.इससे उसकी खड़ी फसल जल जायेगी.खेत यदि कट गया है,तो डर इस बात का है कि किसी और की जलाई 'नरवाई'की आग,उसके घर तक न आ जाय.

गाँवों और जंगलों में रोज हो रही आगजनी,और उससे होने वाले नुकसान की ख़बरें देखकर आपको आश्चर्य होगा.यही आश्चर्य तब और ज्यादा होगा,जब आप जानेंगे कि अपने ही समाज का एक बड़ा हिस्सा,इसके कारण कितनी असुरक्षा में हर पल जी रहा है.

वैज्ञानिक डॉ.दिलीप वागेला ने एक दो दिन पहले ही,एक खबर सार्वजनिक रूप से सबसे साझा की थी कि नवम्बर'2018 से अप्रैल'2019 के बीच मध्य प्रदेश,आग लगने की घटनाओं में देश का तीसरा राज्य रहा था.और,पिछले सात दिनों में सबसे ज्यादा आग मध्यप्रदेश में ही लगी थी.इनमें से 99 प्रतिशत आग खेतों में लगी हैं.

जंगलों की निगरानी कर रहे 'फारेस्ट सैटेलाइट सर्वे ऑफ़ इंडिया'के अनुसार अकेले इंदौर जिले में ही आग की 107 घटनाएं हुई हैं.यह प्रति वर्ष का क्रम है.

इनमें से आधी बातें आपको मालूम होंगी.अपने इलाक़े में हुए नुकसान से भी आप वाक़िफ़ ही होंगे.लेकिन,हर साल इसी कारण होने वाली जन-धन की हानि पर,कभी तो किसी जिम्मेदार ने विचार किया होगा ? समय एक,घटना एक सरीखी और नुकसान भी एक जैसा.

इस मामले में कोई जाए,तो कहाँ जाए ? समाज या व्यक्ति चाहकर भी,इस समस्या का हल अपने दम पर नहीं निकाल सकते.स्पष्ट रूप से यह 'राज्य'का जिम्मा है.फिलहाल,74 वें संविधान संशोधन के तहत यह दायित्व नगरीय संस्थाओं का है.नगरीय संस्थाओं की आर्थिक हालत और उनकी तकनीकी क्षमता के बारे में चर्चा,अपने आप में अलग से एक बड़ा विषय है.

मैं फिलहाल मध्यप्रदेश में हूँ,इसलिए यहीं के एक-दो उदाहरण ही देख लें.पिछले हफ्ते राजधानी के ऐन पड़ौस में,इटारसी में तीन हजार एकड़ में आग लगी.तो होशंगाबाद,सिवनी मालवा और हरदा-टिमरनी से फायर ब्रिगेड की गाड़ियां बुलाई गई.पता चला कि उनमें से आधी तो खराब पड़ी हैं.

इटारसी और होशंगाबाद के बीच छह गावों में सौ एकड़ की फसल में आग लगी,तो इटारसी से फायर ब्रिगेड की गाडी ही नहीं पहुंची.

यही स्थिति भोपाल और सीहोर की रही.रतलाम जिले में तो प्रशिक्षित स्टाफ या कम स्टाफ के रहते फायर ब्रिगेड की गाडी ही जल गई.अभी गए बुधवार के दिन सीमावर्ती श्योपुर कलां जिले में घंटों कोई मदद नहीं पहुंची,और खड़ी फसल पूरी जल गई.

चूँकि आगजनी की ज्यादातर घटनाएं,भोपाल के पड़ौसी जिलों से ही प्रकाश में आई थीं,इसलिए वहीँ की स्थिति भी पता की.अपनी बड़ी मंडी के लिए प्रसिद्ध खिड़किया में आग बुझाने की एक ही गाडी काम आने लायक है,उस पर छह लोग हैं,लेकिन प्रशिक्षित एक भी नहीं है.हरदा,टिमरनी,सिवनी मालवा,इटारसी,होशंगाबाद,सोहागपुर,पिपरिया और पचमढ़ी की हालत भी समान है.अपने जंगलों के लिए प्रसिद्ध पचमढ़ी में तो एक ही गाडी है,और दक्ष कर्मचारी नहीं हैं.

आप कहें कि यह हाल सिर्फ मध्य प्रदेश का होगा.नहीं,पंजाब,हरियाणा,उत्तरप्रदेश,राजस्थान व छत्तीसगढ़ सहित दक्षिण के राज्यों का भी यही हाल है और आग बुझाने के इंतज़ाम आधे-अधूरे से भी काफी कम हैं.

पूरे देश में घूम आइये,हर जगह एक गाडी के पीछे चार या छह कर्मचारी हैं.उनमें से कई अस्थायी और कई अप्रशिक्षित हैं.गाड़ियां भी दैनिक वेतन वाले हेल्पर चला रहे हैं.

चूँकि यह राष्ट्रव्यापी समस्या है,इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर एक 'स्टैंडिंग फायर एडवाइज़री कमेटी' थी,जो अब 'राष्ट्रीय आपदा प्रबंध प्राधिकरण' कहलाती है.बाढ़ और भूकंप की तरह,अब आग को भी राष्ट्रीय स्तर पर आपदा ही माना जाने लगा है.

इसीलिए इस संस्था ने वित्त आयोग के समक्ष धन आवंटन बढ़ाने का जो प्रस्ताव दिया था, उसमें बताया गया था कि देश में जरूरत के मान से लगभग 98 प्रतिशत 'फायर ब्रिगेड'कम हैं.लगभग 97 प्रतिशत कर्मचारी और अस्सी प्रतिशत गाड़ियां कम हैं.

वित्त आयोग ने इस पर भरोसा कर,धन आवंटन दुगुना कर दिया,पर स्थिति वहीँ की वहीँ है.क्योंकि,इसकी फ़ाइल चलाने और इस पर 'मीटिंग'करने या निर्णय कराने  का वक़्त अभी बाबुओं और अफसरों के पास नहीं है.

वर्ष 2008 में राष्ट्रीय स्तर पर यह तय हुआ था कि इस आपदा-प्रबंध के लिए प्रत्येक राज्य में एक 'फायर एक्ट' होगा.लेकिन,'राष्ट्रीय आपदा प्रबंध प्राधिकरण'ने कुछ दिनों पहले ही संसद को जानकारी दी थी कि अभी तक इस पर कोई खास काम नहीं हो पाया है.

अप्रैल,2019 में ही पूछने पर,मध्य प्रदेश के एक बड़े और जिम्मेदार अफसर ने बताया कि अपने यहाँ यह काम गृह विभाग को सौंपा गया था,शायद उन्होंने एक्ट का मसौदा बनाना शुरू कर दिया होगा.

वैसे मध्य प्रदेश सरकार की वेबसाइट पर आपको 33 पेज की एक 'फायर-पालिसी' मिल जायेगी.लेकिन,इसका 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा,भूमि विकास नियमों,उद्योगों और अट्टालिकाओं (चार मंजिल से ऊपर) पर ही केंद्रित है.

खेतों और गाँवों की आग,ग्रामीण क्षेत्र में अग्नि-शमन,वहां की स्थानीय संस्थाओं के बजट या उन्हें दक्ष कर्मचारी उपलब्ध कराने आदि पर इसमें कुछ नहीं दिखा.यानी,वह अभी प्राथमिकता पर नहीं है.

ये बातें हम तब कर रहे हैं,जब सारे देश में हजारों जानें आग से जा चुकी हैं.आगजनी की घटनाओं में हर साल 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है,और एक आंकड़ा यह भी है कि इससे प्रतिदिन 60 लोग मरते हैं.इनमें ज्यादातर किसान और मजदूर होते हैं.

हालांकि,नियम यह है कि आग की सूचना पर तीन से पांच मिनट में शहरी और बीस मिनट में ग्रामीण क्षेत्र में फायर ब्रिगेड को पहुंचना चाहिए.किन्तु,इन हालात में यह कैसे संभव होगा.गाँवों में 'अग्नि-आपदा'का तो एक ही मौसम( मार्च अंत से मई मध्य तक) होता है.किन्तु इसकी तैयारी,न पहले होती है और न बाद में किसी को कोई चिंता रहती है.

भोपाल से सटे औद्योगिक नगर मंडीदीप में हालात,अच्छे थोड़ी हैं.तीन चौथाई उद्योगों में अग्नि शमन की उपयुक्त या प्राथमिक व्यवस्था नहीं है.सब लोग अपने बड़े पड़ौसियों पर ही निर्भर हैं.मंडीदीप के अस्पताल में तो 'बर्न वार्ड'ही नहीं है.इससे कई गुना खराब हालत मुंबई-आगरा राजमार्ग पर स्थित औद्योगिक क्षेत्र निमरानी की है.

आपको जरूर याद होगा कि हरियाणा के डबवाली के एक स्कूल की आग में 540 बच्चे जल मरे थे.तमिलनाडु के तंजावुर के स्कूल की आग में 95 बच्चों की जानें गई थीं.दिल्ली के उपहार सिनेमा की आग में 60 लोग जले थे.खेतों,गाँवों और जंगलों की आग तो किसी गिनती में ही नहीं हैं.

सवाल सिर्फ इतना है कि हम खुद,सरकारें बनाते समय ये बातें क्यों नहीं करते.जिम्मेदारों से इनका हिसाब क्यों नहीं लेते.और हाँ,देश में सबसे बड़ा चुनाव होने को है,लेकिन,आपने किसी भी घोषणा पत्र,संकल्प पत्र,वचन पत्र या निभाए जाने वाले वादों में अग्नि शमन के लिए एक दो शब्द भी शायद ही पढ़े हों.

(संलग्न चित्र रतलाम जिले के ईसामपुर गाँव में आलोट नगर परिषद की अग्नि-शमन गाडी के धू-धू जलने का है)

 

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कमलेश पारे

साठ और सत्तर के दशकों में अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर और रायपुर शहरों में पत्रकारिता में सक्रिय रहे कमलेश पारे ने अगले दो दशक विभिन्न शासकीय उपक्रमों में जनसम्पर्क और प्रबंध के वरिष्ठ पदों पर काम किया.अगले लगभग पांच वर्ष वे समाचार पत्र प्रबंधन में शीर्ष पदों पर रहे.मध्यप्रदेश मूल के दो समाचार पत्र समूहों के राजस्थान और मुंबई संस्करणों में महाप्रबंधक व राज्य-प्रमुख की हैसियत से काम किया.

इंदौर नगर पालिक निगम में नवाचारी परियोजनाओं सहित विभिन वैश्विक संगठनों की सहायता से नगरीय प्रबंध में लगे लोगों व जनप्रतिनिधियों के क्षमता-विकास और जन-सहयोग से विकास सुनिश्चित करने हेतु विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के रूप में भी कमलेश पारे ने अपनी सेवाएं दी हैं.इसी दौरान नगरीय विकास और प्रबंध  पर केंद्रित मासिक पत्रिका 'नागरिक'का संपादन किया.सम्प्रति स्वतंत्र लेखन ...