Wednesday, November 14, 2018
धर्म की लीला राम

धर्म की लीला राम

मीडियावाला.इन।  मंच सजा हुआ है, दरबार चल रहा है। धर्म राज की स्थापना के लिए हर नित नए कौतुक किए जा रहे हैं। राजा को रंग से बड़ा लगाव है, इसलिए सबसे पहले हर जगह के रंग बदले गए। कुर्सी-टेबल पर बिछाए जाने वाले कपड़े से लेकर दीवारों तक पर भगवा पोत दिया गया है। प्रजा कतार्थ महसूस कर रही है। राजा की लंबी उम्र की कामना करती है कि देखिए आते ही सदियों की बेडिय़ां काट दी गई हैं। राम का राज भले नहीं आ पाया, लेकिन उनका रंग हर जगह छा गया है।

फिर राजा को लगता हैै कि आमिष भोजन से ही लोगों के आचार-विचार में गंदगी आती है। जैसा खाए अन्न वैसा होए मन। यदि मन को शुद्ध करना है तो अन्न का शुद्धिकरण जरूरी है। राजा नए नियम लागू करते हैं। खटाखट की दुकानों पर ताले पड़ जाते हैं। भगवा रंग से चकाचौंध जनता खुश होती है। यही होना चाहिए टुंडे के कबाब राम राज में भी टुंडे न हो पाएं तो क्या मतलब है।

फिर राजा राम राज की दिशा में एक और कदम बढ़ाते हैं। महसूस करते हैं कि स्त्री यदि नियमों की देहरी पार करती है तो रावण हरण कर लेता है। इसलिए वे यूनिवर्सिटी में छात्राओं की आवाजाही पर पाबंदियां लगाते हैं। बगीचों में बैठने वालों पर कानून का डंडा चलाते हैं। छेड़छाड़ करने वालों को रावण तो मानते हैं, लेकिन उन्हें उकसाने का जुर्म छात्राओं के सिर आता है, अग्निपरीक्षा का बोझ डाल दिया जाता है। छात्राएं मुंडन कराती हैं, लेकिन जनता सोचती है कि अनुशासन बनाए रखने के लिए नकेल तो कसना होगी। और किसी को भी खूंटे से बांधेंगे तो वह रंभाएगी तो सही।

गोधन की सुरक्षा के बगैर राज का राज कैसे आ सकता है सो राजा गो संवर्धकों को अधिकार देते हैं। वे सडक़ों पर खड़े होकर गाडिय़ां जांचते हैं। गोधन मिलने पर उन्हें मौके पर ही सजा देते हैं। किसी को पीट-पीटकर तारीख-पेशी के बगैर ही अंजाम तक पहुंचा देते हैं। लोग रोते-बिलखते रह जाते हैं, परिवार की चिंता करते हैं, लेकिन जनता जानती है कि कुर्बानियों के बगैर राम राज कैसे आएगा। वह तालियां बजाती हैं, सीटियां मारती हैं, दुआएं देती हैं।

फिर राजा को लगता है कि लोग जिन्हें आदर्श मानते हैं, उन्हीं के जैसा सोचते और करते हैं। इसलिए पीढिय़ों के सामने सही चेहरा होना चाहिए। यूनिवर्सिटी में बरसों से लगे चित्र पर महाभारत कराते हैं। तस्वीर के जरिये भारत विभाजन की कड़वी यादों पर नमक-मिर्च मलते हैं। आमने-सामने की नारेबाजी धर्म युद्ध के आसार बनाती है। जनता फिर खुश होती है, देश आगे बढ़ रहा है। राम राज आकार ले रहा है। राम के राज भी विधर्मियों की मौज और पूछ-परख होगी तो धरती का नाश नहीं हो जाएगा।

तभी पुल की एक स्लैब गिर जाती है। बहुत सारे लोग दबकर मर जाते हैं। गिनती में कोई नहीं फंसता, क्योंकि सोचते हैं रामजी का प्रकोप है। कोई गलती हुई होगी, इससे ही आपदा आई है। लेकिन राम राज में कौन गलती कर सकता है। किसकी इतनी हिमाकत है। बोले कौन? बोल भी दे तो जयकारों में सुने कौन? ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की जिंदगियां खत्म हो जाती है। कोई जवाब नहीं देता। इसको-उसको फंसा कर विधर्मियों की साजिश करार दी जाती है। जनता के तेवर और उग्र हो जाते हैं, देखो इन कलमुंहों से राम राज बर्दाश्त नहीं हो रहा। जापानी बुखार से और बच्चों की मौत हो जाती है। अस्पताल में आग लग जाती है। क्या नई बात है, पहली बार तो हुई नहीं जो राम राज पर लांछन लगाया जाए।

इन सबके बीच सिंहासन दृढ़ है। गायों को चारा खिलाते हैं, पूजा-पाठ करते हैं। धर्म की ध्वजा लहराते हैं। और शहर वैसे ही कसमसाते रहते हैं। संकरी गलियों में ठुकते-ठुकाते रहते हैं। गंदगी के बीच जीते हैं, सांस लेते हैं और वहीं दम तोड़ देते हैं। लेकिन वे हर हाल में अनुशासन चाहते हैं। कनपटियों पर बंदूक चाहते हैं। आवाज उठाई, इनकार किया, आनाकानी की तो गोली मार देते हैं। जिस्म से आर-पार होती हर गोली दीवारों के ताजा रंग को और गाढ़ा करती है। कफन के रंगों को चटकदार करती है।

हकीकत यही है कि उत्सव की हर रोशनी अंधेरों पर कफन डालकर खड़ी होती है। लोग तालियां बजाते रह जाते हैं और उसके भीतर कितनी सच्चाइयां हलाक कर दी जाती है। उम्मीदों की चासनी जितनी मीठी होती है, हकीकत का नीम उतना कड़वा होता है, लेकिन जब हर आंख पर चश्मे चढ़ा दिए गए हों तो फिर उजाड़ वन में हरियाली का उत्सव मनाने से कौन रोक सकता है। सवालों की कोई अहमियत नहीं, कोई हैसियत नहीं।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि वह ताकत देता है, लेकिन उसे तब तक तमाशा देखना होता है, जब तक कि वह खुद तमाशा न बन जाए। लीला चल रही है, ऐसे ही आगे बढ़ रही है। लोग बस ताली नहीं बजाते बीच सभा से उठ जाते हैं।

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अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.