Wednesday, September 18, 2019
साधना के अभिनय का वो यादगार दौर

साधना के अभिनय का वो यादगार दौर

मीडियावाला.इन।

 भारत के विभाजन से अनेक पंजाबी,सिंधी,उर्दू भाषी मुम्बई आ बसे।इनमें बहुत से फ़िल्म जगत में रोजगार तलाशने में लग गए।ऐसा ही एक परिवार था शिवदासानी परिवार।शेवाराम और लीलादेवी के बिटिया सायन की कच्चे मकानों की बस्ती से निकलकर हिंदी सिनेमा की इतनी समर्थ अभिनेत्री बनेगी,किसी ने कल्पना भी न की थी।साल 1955 में एक्स्ट्रा आर्टिस्ट से सफर शुरू कर 1991 तक एक से बेहतर एक फिल्मों का उपहार देने वाली साधना बहुत अलहदा थीं।उनको ब्रेन और ब्यूटी  का संगम माना गया।देश के अनेक कला समीक्षक साधना को विशिष्ट मानते हैं।
 

साधना के लिए इमेज परिणाम

 वरिष्ठ लेखक और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री पंकज राग ने अपनी पुस्तक धुनों की यात्रा के विभिन्न अध्यायों में संगीतकारों और गायकों का उल्लेख करते हुए अनेक बार अभिनेत्री साधना की प्रतिभा का जिक्र किया है।श्री राग का मानना है कि वो कौन थी और मेरा साया फिल्मों में  मदन मोहन के संगीत का जादू साधना के भावपूर्ण अभिनय से मिलकर ही लोकप्रियता हासिल कर सका।साधना की संवाद अदायगी भी बेमिसाल थी।शहर इलाकों की नव यौवनाओं के लिए वे आदर्श थीं।व्यक्तित्व  आधुनिक होते हुए भी सौम्य और गरिमामय था।श्री राग का मानना है कि साधना पर फिल्माए कुछ गीत तो अद्वितीय बन गए।इनमें तू जहां -जहां चलेगा...नैनों में बदरा छाए.. ओ सजना बरखा बहार आई.. अजी रूठकर अब कहाँ जाइयेगा.. नैना बरसे रिमझिम रिमझिम...शामिल हैं।

 उनीस सौ  साठ के दशक में जब हिंदी फिल्मों में साधना ने पदार्पण किया तब सुरैया, मीनाकुमारी आदि  अदाकाराओं की ख्याति चरम पर थी ।  राजश्री, वहीदा रहमान, आशा पारेख, नंदा, जैसी  साधना की समकालीन  अभिनेत्रियों के साथ-साथ साधना को दर्शकों ने बहुत प्यार दिया ।

साधना के लिए पार्श्वगायन  में लता जी को विशेष सुख मिलता रहा, खुद लता जी ने यह बात मानी, साधना के नायकों के  अनुभव भी इसी तरह के हैं । तमाम सफल फिल्मों के बावजूद उनका वक्त से पहले परदे से अलग होना किसी रचना के अधूरे रह जाने की तरह लगता है ।  

साधना शिवदासानी जो डायरेक्टर आर के नैयर के साथ विवाह के बाद साधना नैयर बनीं, हिंदी सिनेमा में ऐसी इकलौती  नायिका  रही हैं जिन्होंने चार फिल्मों में दोहरी भूमिका की , चार-पांच किस्म के फैशन  चलाए और बढ़ाए।  दोहरी भूमिकाओं में अभिनय कर उन्होंने अलग छाप छोड़ी ।

 साधना कट हेयर स्टायल ही नहीं   आँखों  में तिरछा काजल , चूड़ीदार  पायजामी  और सलवार, कानों में बड़े बाले, गरारा और शरारा । साड़ी बांधने का साधना का अंदाज भी निराला था । यही नहीं उनकी चाल और बोलती आंखें भुलाने योग्य नहीं । निर्देशक बिमल राय, साधना को कला फिल्मों का चेहरा बनाना चाहते थे ।

साधना के लिए इमेज परिणाम

एक अभिनेत्री  को याद करते हुए हमने देखा  कि उन्होंने दिखावे  की दुनिया में किस तरह खुद को तमाम प्रचार और आकर्षणों से बचाए रखा। । इन पंक्तियों के लेखक ने उनकी बॉयोग्राफी बहुत विस्तार से लिखनी चाही,जिसके लिए उनसे उनके जीवन के प्रसंगों,घटनाओं और अनछुई बातें शेयर करने का अनुरोध किया पर साधना को यह बात रास नहीं आई, वे नहीं चाहती थीं खुद को चर्चा में बनाए रखना।  मैंने साधना पर लिखे  आलेखों का संकलन तैयार कर लिया था।यह बायोग्राफी की तरह है जिसे साधना ने पसंद किया। एकाकी जीवन जीने के उनके अंदाज को क्या कहा जाए । उन्होंने  गरिमामय तरीके से खुद को तिलस्मी  और चमकदार दुनिया से अलग किया । प्रशंसकों के मन में उनकी युवा अवस्था  की छवि बनी रहे, यह साधना की दिली भावना रही  । इनामों और  उसकी की राजनीति से दूर, संतोषी, फिल्मी महफिलों से दूर साधना  गाहे - बगाहे फकत ऑटर्स क्लब जाती रहीं।  कभी दिलीपकुमार जी भी इस क्लब के प्रमुख रहे हैं।यहां सदस्य भी सीमित ही  होते हैं । मेरी साधना से प्रथम भेंट यहीं हुई ।जहां एक ओर अनेक कलाकार अपनी मातृभाषा और अपने समुदाय से जुड़े रहते हैं, साधना यहां भी सबसे अलग हैं । ये बात और है उनकी पहली फिल्म अबाणा  एक सिंधी फिल्म थी जिसमें वे नायिका शीला रमानी की छोटी बहन के किरदार में आईं । कुल जमा इकतीस फिल्मों का मामला है साधना का  फिल्म निर्माण में महिलाओं की भूमिका की चर्चा होती है तो साधना  गीता मेरा  नाम (1974) की वजह से याद की जाती हैं । अभिनय के चौथे और आखिरी दशक में वे 1997-98 तक साधना शो के नाम से टीवी  पर फिल्मी नगमों की खास अंदाज  के कारण देखी गईं । इसके बाद  उन्होंने स्क्रीन से दूर रहने का पक्का इरादा कर लिया । सांताक्रुज के रामकृष्ण  मार्ग स्थित घर में उन्हें तन्हाइयां उस तरह नहीं सताती  थीं कि जिंदगी मुश्किल हो  जाए । दरअसल  सिने जगत किसी शख्स को जितना मजबूत बना देता है वैसा हौसला व्यापार, नौकरी या अन्य किसी भी क्षेत्र में दुर्लभ होता है।  साधना अभिनीत फिल्मों के निर्देशक, नायक, गायक , गीतकार, संगीतकार जिस तेजी से  अवार्ड हासिल करते रहे, साधना इस संस्‍कृति से दूर ही रही। वे पुरस्कारों के लिए कोई लॉबिंग  भी नहीं करतीं,पुरस्कार न मिलने पर अफसोस भी नहीं करती थीं ।

एक समय जमाना उनका इस कदर दीवाना था कि पर्स में भैया लोग ही नहीं, अंकल और ताऊ लोग भी साधना की वही माथे पर तरतीब से जमे बालों वाली मोहक मुस्कान युक्त तस्वीर रखते थे ।

राजेश खन्ना सुपर स्टार बने तो साधना भी लगभग एक दशक किसी सुपर  अदाकारा का दर्जा पाकर ही कामयाब हुईं । तरह -तरह की सेहत से जुड़ी तकलीफों ने रास्ते भी खूब रोके पर क्या मजाल कि अदाकारा की कोशिशें बंद हों, संघर्ष का लंबा सिलसिला है ।

 अभिनेत्री साधना की रचनात्मक यात्रा को मुल्क के बंटवारे ने भी नहीं तोड़ा,  उन्हें आई आई फ्लू  की तकलीफ ने भी नहीं तोड़ा। न थॉयरायड की तकलीफ ने, पिता-माता  और इकलौती बहन की असमय मौत  ने भी नहीं उनको मजबूत रखा।यही नहीं और पति आरके नैयर के अवसान के बाद भी  साहस से उस परिस्तिथि को फेस किया। यही नहीं जमीन के सौदागरों के दबाव के आगे भी यह अदाकारा अकेली लड़ी । जिंदगी ने इतने इम्तहान ले लिये हैं कि कोई और बड़ा इम्तहान बचा ही नहीं उनके लिए । अपनी जिंदगी की मिली - जुली यादें और चंद सहेलियां जीने का सहारा बनी हुई   हैं । यह बात हर वो शख्स जानता है जो जरा भी सिनेमा से जुड़ा है कि साधना की समकालीन ही नहीं जूनियर अभिनेत्रियों  ने भी फिल्म - फेयर,  पद्मम श्री, पदम भूषण  लेते हुए  लालसा  किस तरह उजागर की , अवार्ड्स को  लेकर कितने झगड़े और झंझट भी होते रहे हैं लेकिन साधना जैसी वरिष्ठ, विशिष्ट और अभिनय के आयाम स्थापित करने वाली अभिनेत्री  गरिमामय जीवन जीना चाहती है । न कोई महत्वकांक्षा न धन-दौलत की  चाह । ऐसा निर्मोही जीवन क्या सिनेकर्मियों के लिए प्रेरक नहीं ?  सस्ती पापुलर्टी  की खातिर नए-नए हथकंडे अपनाने वाले काश बुजुर्ग कलाकारों से साठ-सत्तर की आयु के बाद शांत, संयमित जिंदगी का यह गुर सीख लें । साधना ने मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास पर आधारित फिल्म गबन के अलावा परख में कलात्मक भावाभिव्यक्तियां प्रस्तुत कीं । वंदना और प्रेमपत्र में भी उनके अभिनय का अलग अंदाज था । गुरुदत्त के साथ पिकनिक साधना की अनरिलीज्ड फिल्म है । कमर्शियल आधार पर बहुत कामयाब मानी गई उनकी कुछ फिल्मों में वक्त, मेरा साया, लव इन शिमला, राजकुमार, असली-नकली, हम दोनों, वो कौन थी, मेरे महबूब  शामिल हैं । जिन अभिनेताओं के साथ सर्वाधिक  फिल्में आई उनमें सुनील दत्त, मनोज कुमार, देवानंद, राजेंद्र कुमार( चार -चार बार) शामिल हैं । जॉय मुखर्जी, बलराज साहनी, संजय खान , राजकुमार के साथ दो-दो बार और धर्मेन्द्र , राजेश खन्ना , अनिल धवन, शशिकपूर, किशोर कुमार, बसंत चौधरी, परीक्षित साहनी के साथ साधना ने एक-एक फिल्‍म बतौर नायिका की । वैसे तो साधना ने हिंदी  सिनेमा के ख्यात अभिनेताओं पृथ्वीराज कपूर, संजीव कुमार, विश्वजीत, अशोक कुमार के साथ भी सिलवर स्क्रीन शेयर की।साधना का फिल्म वक्त और वो कौन थी के लिए फिल्म फेयर नामीनेशन हुआ । साधना ने सर्वाधिक  लता मंगेशकर के गाए गीतों पर होंठ हिलाए । लगभग  सौ गीत साधना पर फिल्माए गए हैं । जो अधिक कर्णप्रिय  हैं उनमें -अभी न जाओ छोड़कर,,,, (हम दोनों) तू जहां-जहां चलेगा,,,, ( मेरा साया ) आ जा आई बहार,,,, (राजकुमार) नैना बरसे रिमझिम रिमझिम,,,, (वो कौन थी ) जरुरत है जरुरत है,,,, (मनमौजी) मेरे महबूब तुझे  मेरी मोहब्बत  की कसम,,,(मेरे महबूब) तेरा मेरा प्यार अमर,,,, (असली नकली ) हमने तुझको प्यार किया है इतना,,,, (दूल्हा दुल्हन) शुमार हैं ।   

दिलकश गीतों की बात करें तो हमें ओ सजना बरखा बहार आई (परख) में वर्षा के सौंदर्य की ऊंचाइयां साधना के अभिनय की ऊंचाइयों से मिलकर अलग दुनिया में ले जाती हैं । यही बात लग जा गले कि फिर ये हंसी रात हो ने हो.... (वो कौन थी )  के लिए  भी लागू होती है । एक  विशेष गीत जिसमें 22 बार दिल शब्द आया,वो साधना पर फिल्माया गया है, ये दिल दीवाना है,दिल तो दीवाना है...साधना के अभिनय से यादगार हो गया।

(लेखक अशोक मनवानी हिंदी सिनेमा के सौ बरस  होने पर साल 2012 में   प्रकाशित  अभिनेत्री साधना जी बायोग्राफी  *सुहिणी साधना* के लेखक हैं। )

 

 

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अशोक मनवानी

22 अक्टूबर 1964 को सागर में जन्म। समाज शास्त्र में एम.ए., एमफिल, योग में डिप्लोमा एवं पत्रकारिता जनसंचार में उपाधि। सिंधी के युवा साहित्यकार के तौर पर ख्याति। सिंधी में आधा दर्जन कथा-संग्रह, सात नाटक तथा हिन्दी में दो कथा-संग्रह प्रकाशित। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य एवं आलेखों का प्रकाशन। अभिनय एवं समाज सेवा के कार्यों में रुचि। नाट¬-संग्रह "रक्त दोष' पुरस्कृत। विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित। सम्प्रति - मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क विभाग में उप संचालक।