Monday, September 23, 2019
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए....

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए....

मीडियावाला.इन।

रमजान का माह कितना मुकद्दस होता है...बचपन में अपने करीबियों के साथ जिया है इसे इसलिए कहती हूं "सबकी मीठी ईद में कड़वाहट घोलने का हक एक क्रूर हैवान को कैसे दिया जा सकता है।"अलीगढ़ में ढ़ाई साल की बच्ची....आप और हम अब कब तक शर्मिंदा होते रहेंगे। यदि हम अपने बच्चों के लिए जन्नत नहीं बना सकते तो कम से कम उन्हें जहन्नुम का उपहार देना बंद करें। आप कह सकते हैं, दोषी के कृत्य में आपका-मेरा-हमारा क्या दोष....मेरी बात को एकबार- दो बार नहीं बार-बार सोचिएगा, आपको सब सच ही लगेगा।

"घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए...."

निदा फ़ाज़ली साहब आप अपने अहसास लिख रहे थे लेकिन हमारा समाज कहा समझने वाला था, वो तो बच्चों के लिए क्रूरता लिख रहा था...समाज के ताने-बाने में फैले लोग कहीं ना कहीं दुबे-छिपे मन से इस क्रूरता का समर्थन कर रहे थे। यही क्रूरता तो देखी थी हमने कठुआ कांड में....यही किसी बच्ची को भाभी कहने में देखी थी...यही अलीगढ़ के मामले में देख रही हूं। अलग-अलग तरीके के जहर दिमाग की नसों में भरने का काम जारी है लेकिन यह जहर तो काफी सदियों पहले से भरा जा रहा है...ये सोचभर के कलेजा कांप जाता है कि किसी माँ की मन्नतों से मांगी बच्ची को इतनी दुर्दांत तरीके से मौत की नींद सुला दिया जाए। उसके अंग-भंग करके उसे एसिड़ में नहला दिया जाता है हम चिल्लाकर चुप रह जाते हैं....क्या सिर्फ रोने-सिसकने-चिल्लाने-गुर्राने-कैंडल जलाने से हम अपने आस-पास की कुंठित होती दुनिया को संभाल लेंगे। निठारी कांड सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा था...हम सभी सुन और देख रहे थे। उस समय महसूस हो रहा था आंखों से कोई देखने की और कानों से सुनने की क्षमता छीन ले...इतने बच्चों की इतनी दुर्दांत हत्या। मान लेते हैं सुरेंद्र कोहली नामक नरपिशाच नेक्रोफीलिया जैसे मानसिक रोग से पीढ़ित था लेकिन समाज के अलग-अलग हिस्सों से निकल रहे इन नरपिशाचों को क्या कहें। कठुआ से लेकर अलीगढ़ तक लंबी फेहरिस्त बन चुकी है। पिछले कुछ सालों के अखबार उठाकर देख लीजिए या फिर नेट पर सर्च ही कर लीजिए...अखबारों को उठाने वाले हाथ कांप जाएंगें क्योंकि हर दूसरे दिन हमारे देश के किसी हिस्से में ऐसी घटनाएं हो रही हैं...लगातार हो रही हैं...उनकी बर्बरता का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है...बस बढ़ता ही जा रहा है।

दिलो-दिमाग में आज भी मेरे शहर इंदौर की एक मासूम बच्ची शिवानी के दीवार पर उकेरे हुए शब्द छपे हैं। उसे चाचा ने गोद लिया था। छोटी सी 6 साल की बच्ची ने दीवार पर उकेरा था...मुझे मत मारो...मुझे दुखता है...मुझे भूख लगी है...पानी पीना है...मुझे यहां से निकालो....उसकी मौत के बाद पड़ोसियों ने बोला था, हमें शक था ये लोग काफी दिनों से शिवानी के साथ जुल्म कर रहे हैं.......शक था...पता था...आप चुप थे...ये शब्द कानों में सीसा घोल रहा था। शिवानी के हत्यारों को पहले फांसी फिर माफी के बाद उम्र कैद की सजा मिली...कुछ समय ना बीता था फिर एक शिवानी को उम्र उससे कम थी...4 साल...तीन शराबी ऑटो में बैठाकर ले गए...ब्रूटल रेप-मर्डर....फिर कुछ समय बाद एक बच्ची को सिर्फ 4 माह ...मेरे ही शहर में फिर ब्रूटल रेप और मर्डर...आखरी दो केसों में फांसी पर लटकाए जाने की सजा मिली है। पहले में भी थी जिसे चाल-चलन और माफी के बाद उम्र कैद में बदला गया। निठारी हत्याकांड में भी फांसी की सजा ही हुई है, निर्भया में भी...बस नाबालिग बच गया। क्यों गिना रही हूं ये सब??? क्योंकि इतनी फांसियों के बाद भी समाज में कुछ नहीं बदला। हम नहीं बदले...कुठाएं नहीं बदली। रोमन काल-यूरोपियन एरा-भारत में युद्धो का समय...इसे तो कहा ही 'रेप-पिलिज-प्लंडर' का समय था। बर्बर युग...महिला या बच्ची मिले तो रेप कर दो...पिलिज मतलब सब बर्बाद कर दो जिसमें छोटे-छोटे बच्चों की बर्बर हत्याएं भी शामिल थी...प्लंडर मतलब सब लूट कर ले जाओ। हम उस युग के दरवाजे पर वापस दस्तक तो नहीं दे रहे हैं...किसी से बदला लेना हो तो बस...उसके घर की औऱत या बच्चों को टारगेट करो...सॉफ्ट कार्नर...

वैसे एक बात याद रखिए हमारा ही नहीं दुनिया का पूरा समाज बच्चों के लिए शायद क्रूर ही रहा है। आज तक सोचती हूं किसी बाप को नाजायज नहीं कहा जाता लेकिन औलाद पर यह समाज नाजायज का तमगा लगाने से बाज नहीं आता...क्यों? सड़क पर भीख मांगते बच्चों को देखते हुए भी शासन-प्रशासन-समाजसेवी-पेज थ्री सोशलाइट्स सभी चुप क्यों हो जाते हैं....क्यों नहीं सोचते हर शहर में हजार बच्चे ही तो दिखते होंगे रोड़ के सिग्नल में क्या समाज इतना लचर है कि उनकी जिम्मेदारी नहीं उठा सकता। पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर एनोरेक्सिया सी पीढ़ित नोआ पोथोवेन की मृत्यु चर्चा में हैं। भोजन छोड़ दिया था एक टीनएजर ने...उसने अपने "डीप सीडेड पेन" पर किताब भी लिखी थी...अवार्ड्स मिले थे लेकिन वो चाइल्ड एब्यूसमेंट को भुला ना पाई वो दर्द सालता रहा। मैं नहीं लिख पाई क्योंकि नोआ का देश देखा है मैंने...नीदरलैंड...साईकिलिंग वालों का ही नहीं बल्कि यूरोप का स्वर्ग लगा था मुझे। स्विजरलैंड से कहीं ज्यादा सुंदर...वहां के लोगों की नहरों को यात्रामार्ग बनाने की कला ने मोहित किया था...इसलिए लिख ना पाई क्योंकि नोआ तुम्हारे साथ तो तुम्हारा पूरा देश था...वो माँ-पिता थे जो तुम्हारी इच्छा की इज्जत करते थे। जिन्होंने तुम्हें तिल-तिल कर घुटते-मरते देखने से अच्छा अलविदा कहना समझा। मेरे यहां स्थिति बेहद उलट है बच्चा...तुम किताब लिख अपना दुख बया करती हो, मेरे यहां एक 6 साल की बच्ची दीवारों पर उकेरती है लेकिन उसकी चीख पड़ोसी भी सुन नहीं पाते, या सुनकर अनसुना कर देते हैं। मेरे यहां अलीगढ़ में बच्ची की नृशंस हत्या का दूसरा आरोपी अपनी ही बेटी का रेपिस्ट निकलता है...जो जमानत पर छूटा था। नोआ ....मिलना जन्नत में अलीगढ़ की ढ़ाई साल की बच्ची से...रोना उससे गले लगकर...शायद तुम बच्चों के लिए हमने यह दुनिया बनाई ही नहीं....

माफी बहुत छोटा शब्द है...इसलिए नहीं बोलूंगीं...नहीं लिख पाऊंगीं...

ज़ाहिद और अनाम..( नाम नहीं लिख रही तुम गलीच का क्योंकि तुम्हारा नाम लिखते ही तुम्हारी नाबालिग बच्ची का नाम सब जान जाएंगें जिसका तुमने रेप किया था) जितने तुम उस ढ़ाई साल की बच्ची के गुनाहगार हो उतने ही जन्नतनशीं मेरे अब्दुलचाचा के भी....ये तुम लोग ही हो जिनके कारण शक की दुनिया जवां हुई है। याद रखना दोजख में तुम्हें उस बच्ची के साथ-साथ हम जैसे हर एक का भरोसा तोड़ने की सजा भुगतनी होगी...काश गर्म तेल में तले जाओ तुम लोग...गर्म सरिए से निकाल ली जाएं तुम्हारी आंखें...फांसी के बाद जब तुम खुदा के सामने पहुंचों तो वो भी तुम्हें ना बख्शे)

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श्रुति अग्रवाल

कई बार जीवन में ऐसे पल आते हैं जो सदियों तक किस्से के रूप में याद रहते हैं... उन्हीं किस्सों की किस्सागोई में गुम श्रुति अग्रवाल पत्रकारिता का चिरपरिचित चेहरा है। वे लम्बे समय तक राजस्थान पत्रिका और सहारा समय में पत्रकार रही है।

ट्वेल्व पाइंट ब्लॉग संचालित करते हुए श्रुति ने कई अनछुए पहलुओं पर कलम चलायी है।