Monday, September 23, 2019
साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश द्वारा संचालित त्विषि पाठक मंच की समीक्षा गोष्ठी  सफलता पूर्वक संपन्न हुई

साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश द्वारा संचालित त्विषि पाठक मंच की समीक्षा गोष्ठी  सफलता पूर्वक संपन्न हुई

मीडियावाला.इन।साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश द्वारा संचालित त्विषि पाठक मंच की समीक्षा गोष्ठी  सफलता पूर्वक संपन्न हुई ! इस गोष्ठी में माह जुलाई की पुस्तक 'आंजनेय' और ‘जंगल में दर्पण’ पुस्तक पर विस्तार से चर्चा और समीक्षा हुईं ! इस गोष्ठी में अमिता त्रिवेदी, मृदुल त्यागी, राजकुमारी चौकसे, सरिता बघेल, डॉ. कुंकुम गुप्ता, डॉ. कांति शुक्ल ‘उर्मि’, शीला श्रीवास्तव, शेफालिका श्रीवास्तव, सुमन ओबेरॉय, नीना सिंह सोलंकी, सुनीता प्रकाश, महिमा श्रीवास्तव, दीप्ति विश्वास , मधुलिका सक्सेना, सुनीता यादव तथा अनीता सक्सेना ने पुस्तकों की समीक्षा की तथा चर्चा की ! समस्त लेखिकाओं ने अपने-अपने विचार रखे ! सुरम्य बगीचे में बैठ कर सभी ने हरी-भरी प्रकृति के सानिध्य का आनंद भी लिया ! 
जंगल में दर्पण की समीक्षा करते हुए मृदुल त्यागी ने कहा कि पुस्तक की सभी कहानियां एक भिन्न विषय पर हैं ! ज़हर बुझे तीर बस्तर के जंगलों में रहने वाले ऐसे लोगों की कथा है जिन्होनें विकास के नाम पर अभी तक कुछ भी नहीं देखा है ! अमिता त्रिवेदी ने कहा कि इन कहानियों के मूल से ज़्यादा इनके बिम्ब प्रभावी है और कही कही तो कहानी से ज़्यादा बड़े , की पढ़ने वाला उलझ जाए । बात चाहे कहानी 'प्रथम पुरुष' की हो या 'टेबिल' की हो कहती एक ही बात है कि संस्कृति , संवेदनाओं के बीच रह गए अबूझ ,अदम्य, आदिम सभ्यता के वे रेशे जो आज भी अनजाने , अनचाहे सर उठा लेते है और हमे सोचने पर मजबूर करते है कि क्या हम वाकई सभ्य, सुसंस्कृत और विकसित है। अनीता सक्सेना ने कहा कि तरुण भटनागर जी की कहानियां चकित करती हैं ! बस्तर के जंगलों की आँखों देखी दास्ताँ व्यक्त करती तीन कहानियां ‘’ज़हर बुझे तीर, जंगल में दर्पण और प्रथम पुरुष’’ कहीं से भी कहानी नहीं लगतीं , हकीकत लगती हैं ! हकीकत जो बस्तर के जंगलों का इतिहास बताती हैं , उनका वर्तमान बताती हैं ! यदि देखा जाये तो इस पुस्तक में सिर्फ बस्तर की ही कहानियां रहतीं तो बहुत अच्छा था

 

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