Monday, September 23, 2019
रविवारीय गपशप

रविवारीय गपशप

मीडियावाला.इन।

“अपनी धुन में रहता हूँ , मैं भी तेरे जैसा हूँ “ नासिर काज़मी की लिखी और ग़ुलाम अली के द्वारा गायी ये कर्णप्रिय ग़ज़ल  भला किसने ना सुनी होगी ! कल रात इसे सुनते हुए मुझे अपनी धुन में डूबे रहने वाले चंद दिलचस्प किरदार याद आ गए तो इस रविवार उन्ही के क़िस्से साझा करते हैं | दूसरों की बातें करने से पहले मैं बता दूँ की मैं ख़ुद भी कुछ कुछ ऐसी ही धुन में डूब कई हरकतें कर चुका हूँ मसलन बचपन में जबलपुर में हम डिसिलवा रत्नशी स्कूल में पढ़ा करते थे , हम यानी मैं और मेरा छोटा भाई ,  वो प्रायमरी सेक्शन में था और मैं सेकेण्डरी | स्कूल जाने के लिए हम दोनों के बीच साइकल एक ही थी , पर अच्छी बात ये थी की उसका समय सुबह का था और मेरा दोपहर  का , तो जैसे ही स्कूल ख़त्म होता वो घर आ जाता और मैं सायक़िल लेकर स्कूल चला जाता | एक दिन की बात है , स्कूल ख़त्म होने के बाद किसी कारणवश उसे आने में देर हो गयी और मेरा समय होने लगा | मैंने पैदल ही चलने का निश्चय किया , हालाँकि स्कूल करीब तीन किलोमीटर दूर था पर क्या करते मजबूरी थी | मैं घर से कुछ दूर चला ही था की रास्ते में वो आता हुआ मुझे मिला गया , मैंने बड़े भाई का फ़र्ज़ निभाते हुए उसे देरी के लिए डाँट पिलायी और सायक़िल लेकर चल दिया | स्कूल ख़त्म हुआ, ना जाने किस धुन में डूब मैं ये सोचते हुए की आज छोटे भाई के समय पर ना आने से मैं स्कूल पैदल ही आया हूँ घर के लिए वापस पैदल ही चल दिया | रास्ते भर “मुन्नू” की लापरवाही के लिए उसे मन ही मन कोसते हुए भुनभुनाता हुआ मैं तीन किलोमीटर पैदल चल कर घर आया | घर आने पर जब मैंने छोटे को उसकी लापरवाही के लिए फिर डाँटा तो उसने मासूमियत से कहा की भैय्या सुबह आप डाँट तो चुके हो , और रास्ते में मैंने तुम्हें सायक़िल दे तो दी थी | स्कूल में स्टेण्ड पर सायक़िल मैं छोड़ आया हूँ , यह सुन कर बाऊजी क्या हाल करेंगे , ये सोच मेरा दम फूल गया | मरता क्या न करता , फिर शाम को ही वापस पैदल तीन किलोमीटर वापस  चल कर गया और सायकिल वापस लेकर आया | पर अभी और भी दिलचस्प किरदारों का ज़िक्र बाक़ी है  | 

जी एस कालेज के दिनों की बात है ,बी काम का कोर्स था और  हिंदी का पर्चा था | उन दिनों हिंदी के पेपर में निबंध लिखने को आया करता था जिसके अच्छे खासे नम्बर हुआ करते थे | उस दिन पेपर में निबंध आया “नशाबंदी” | पेपर ख़त्म होने पर सामान्यतः बच्चे कैसा पर्चा  इसकी चर्चा करते हैं सो हम सब भी कर रहे थे तभी सामने से हमारे सहपाठी पल्लू भाई आए , हमने पूछा कैसा रहा पेपर ? बोले एकदम बढ़िया , मैंने तो सब लिख मारा की कैसे लोगों की आपातकाल में ज़बरन नसबंदी की गयी थी | मैंने कहा ये क्या कह रहे हो भाई निबंध तो नशाबंदी पर था तब जाकर पल्लू  को होश आया बोले यार मैं तो ना जाने कौन सी धुन में डूबा था , तुरंत हाथ जोड़े और ऊपर उठा कर बोले ही बजरंगबली ये पर्चा निरस्त करा दो सवा पाव लड्डू चढ़ाऊँगा | क्या पता क्या हुआ पर अगले हफ़्ते हमने लड्डू का प्रसाद खाया और उनकी दुआ क़ुबूल होने के कारण हमने फिर से परीक्षा दी | 

हमारे पुराने साथी पी सी प्रसाद सीहोर में हमारे साथ एस डी एम थे , वे भी बड़े धुनी आदमी थे जब धुन चढ़ जाए तो क्या कर दें कोई ठिकाना नहीं | दुर्भाग्य से अब उनकी केवल यादें ही हमारे साथ हैं | वे इछावर के एस डी एम थे , दौरे पर गए तो देखा कोई बदमाश सड़क के किनारे अतिक्रमण कर रहा था | उन्होंने रेस्ट हाउस में तहसीलदार को बुला कर अतिक्रमण हटाने को कहा , अगला दिन रविवार का था , किसी ने फ़ोन कर प्रसाद साहब को बताया की अतिक्रमण तो बदस्तूर जारी है | प्रसाद साहब को ग़ुस्सा आया तो उन्होंने थाने में फ़ोन लगाया , संयोग से थाने में फ़ोन एक नवजवान सब-इंस्पेक्टर ने उठाया , प्रसाद साहब ने उसे अतिक्रमण  हटाने को कहा | नवजवान अफ़सर था , मौक़े पर गया और उस बदमाश का समान ज़ब्त कर मौके पर शासकीय भूमि की पुरानी स्थिति क़ायम कर प्रसाद साहब को रिपोर्ट कर दी | प्रसाद साहब इतने प्रसन्न हुए की उन्होंने एक वायरलेस मेसेज चीफ़ सेक्रेटरी और डीजी पुलिस के लिए लिखाया , की इस तरह की घटना में  जैसी लापरवाही तहसीलदार ने की है इसके लिए उसे तत्काल पदावनत कर नायबतहसीलदार बना दिया जाए और जैसी तत्पर्ता सब-इन्सपेक्टर ने दिखाई है इसके लिए उसे पदोन्नत कर इन्सपेक्टर बना दिया  जाए | वायरलेस मेसेज इनने इछावर से तो लिखा दिया पर भला हो उस बंदे का जो ज़िला मुख्यालय से इस संदेशों को भोपाल भेजने का काम करता था , उसने ये संदेश एस पी साहब को बताया और उन्होंने कलेक्टर साहब को | नतीजतन प्रसाद साहब को अगले दिन कलेक्टर  ने बुला कर समझाया की भाई ऐसी सीधी कार्यवाही की सिफ़ारिशें वरिष्ठ अधिकारियों को नहीं की जातीं | ऐसे ही एक एस डी एम साहब थे डाबरा (ग्वालियर ) में , धुन के ऐसे की एक बार वसूली के चक्कर में मालगाड़ी ही ज़ब्त कर डाली , दिल्ली से फ़ोन आने लगे तो कलेक्टर को पता लगा उनका कारनामा ख़ैर जैसे तैसे स्थिति सम्हाली  | 

पिछले वर्ष हम मसूरी ट्रेनिंग में गए थे | एक रोज़ की बात है , ज्ञानशिला के पास सीढ़ियों पर एक काफ़ी शाप है , महेश चौधरी , नरेंद्र परमार और दूसरे साथियों को फ़ोटो खिचवाने का शौक़ हुआ और फ़ोटो खिंचने की धुन चढ़ी रवि मिश्रा जी को , फ़ोटो खिंचते देख कुछ और साथी भी आ गए | तरह तरह के पोज़ में फ़ोटो खींचते खींचते वे ऐसे मशगूल हुए की अपना लैप्टॉप का बेग वही भूल गए । रात को खाना खाने गए तो देखा परेशान रवि अपना बैग तलाश रहे हैं , हम सब भी उनका साथ देने लगे पर कोई फ़ायदा नहीं मिला , फिर किसी ने बताया की सी सी टी व्ही की रिकोर्डिंग देखो , आइडिया कामयाब रहा और बेग उठाने वाला पहचान में आ गया और दूसरे दिन शाम तक बैग बरामद हो गया ।
इसी तरह पिछले दिनों एक और मज़ेदार घटना हुई । प्रकाश जांगरे हमारे पुराने पारिवारिक मित्र हैं , इस रविवार श्रीमती जी इंदौर से भोपाल आयीं तो हमने सपरिवार फ़िल्म देखने का कार्यक्रम बनाया और ये भी तय हुआ कि फ़िल्म देखने के बाद रात्रि भोजन का कार्यक्रम अरेरा क्लब में रहेगा | डी बी मॉल में फ़िल्म देखने के बाद हम लिफ़्ट से नीचे उतरे , सामने ही टायलेट था , श्रीमती जी ने उस ओर इशारा किया और भाभीजी के साथ महिला प्रसाधन की ओर बढ़ गयीं , जांगरे साहब मोबाइल में ड्राइवर का नम्बर तलाश रहे थे की उसे गेट पे गाड़ी लगाने का कह दें | मैं तो पुरुष प्रसाधन की ओर आ गया पर जांगरे साहब भाभी जी के पीछे पीछे महिला प्रसाधन में घुसने लगे , वो तो अच्छा हुआ की आधे रास्ते में ही हमारी श्रीमती जी उन्हें फ़ोन पर  बातें करते सुन , पलट कर देखा तो उन्हें टोकते हुए कहा भाई साहब आप यहाँ कहाँ घुसे आ रहे हैं , तब जाकर मोबाइल की धुन में डूबे जांगरे साहब ने सर उठा कर देखा और झेंपते हुए बोले अरे मैं समझा हम मॉल से बाहर की ओर जा रहे हैं , फिर उसके बाद घर पहुँचने तक पूरे रास्ते हम उन्हें छेड़ते रहे।

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