Sunday, April 21, 2019
अखाड़ों में महिलाओं ने तोड़ा नागाओं का वर्चस्व, विदेशियों में भी दिखा संन्यास के प्रति आकर्षण

अखाड़ों में महिलाओं ने तोड़ा नागाओं का वर्चस्व, विदेशियों में भी दिखा संन्यास के प्रति आकर्षण

मीडियावाला.इन।इसे सांसारिक मायामोह से विरक्ति कहें या फिर ईश्वर के प्रति बढ़ता अनुराग। आधुनिकता के इस दौर में घर-परिवार का परित्याग कर महिलाओं में संन्यास लेने का चलन बढ़ा है। वह अखाड़ों में पुरुष संन्यासियों का वर्चस्व तोडऩे लगी हैं। पिछले उज्जैन कुंभ की तुलना में इस कुंभ में अधिक महिलाओं ने भक्ति,समर्पण और वैराग्य को अपना कर संन्यास ग्रहण किया है।

संगम तट पर इस दिव्य और भव्य कुंभ में अब तक 250 से अधिक महिलाएं संन्यास की दीक्षा ले चुकी हैं। इसमें पड़ोसी देश नेपाल से लेकर रूस, इटली, स्विटजरलैंड और हंगरी तक की कई विदेशी महिलाएं भी शामिल हैं। अब यह साध्वियां अपने-अपने गुरुओं के आश्रमों, मठों के अलावा परंपराओं को आगे बढ़ाने का काम करेंगी।

जूना अखाड़े में बुधवार को नेपाल की परित्यक्तता महिलाओं के अलावा परिवार से बिछड़कर बेसहारा जीवन जी रहीं कई महिलाओं ने संन्यास ले लिया। इनके साथ ही कुछ पढ़ी लिखी, आधुनिक जीवन शैली को अपनाने वाली विदेशी महिलाओं ने भी संन्यास की दीक्षा ली। इटली की टारा पिछले कई वर्षों से काशी में वेद अध्ययन कर रही हैं। उन्होंने जूना अखाड़े की 13 मढ़ी की महंत मीरा पुरी को गुरु बना लियावह पिछले एक वर्ष से महंत मीरा पुरी के लगातार संपर्क में बनी हुई थीं। उन्होंने कुंभ में अखाड़े की परंपरा के अनुसार कर्मकांड कर संन्यास ग्रहण किया। संगम की रेती पर मुंडन के बाद उनका पंच गुरु संस्कार विधि विधान से किया गया।अब वह सनातनी संस्कृति और धर्म का प्रचार करेंगी। टारा का नया नाम रम्या गिरि रखा गया है। रम्या कहती हैं कि अब वह हिंदू हैं और भारत की हो गई हैं। भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता ने उनको इस तरह प्रभावित किया कि वह गेरुआ वस्त्र धारण कर संन्यासिनी बन गईं।पिछले दिनों हंगरी की डॉक्टर अनिको ने भी इसी तरह कुंभ में आने के बाद ईश्वर के प्रति लगन लगा बैठीं। अनिको ने चकाचौंध भरी दुनिया का परित्याग कर जूना अखाड़े की महिला महामंडलेश्वर साध्वी हेमानंद गिरि से संन्यास की दीक्षा ली। अब वह हंगरी में आश्रम बनाकर सनातनी संस्कृति के लिए काम करेंगी। इसी तरह रचना, शशिप्रभा सिंह, पार्वती, सुलोचना समेत सौ से अधिक महिलाओं ने भी एक साथ गुरुओं की शरण में समर्पित हो गईं और संन्यास धारण कर लिया।पंच गुरु मिलकर बनाते हैं एक संन्यासिनी 


महिलाओं के सन्यास की प्रक्रिया में पांच गुरु शामिल होते हैं। इनमें चोटी गुरु, लंटोगी गुरु, भगवा गुरु, भभूति गुरु और कंठी गुरु के नाम शामिल हैं। 

अखिल भारतीय जूना संन्यासिनी राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत आराधना गिरि ने कहा कि अखाड़ा महिलाओं के संन्यास की परंपरा भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठतम परंपरा है। इसमें पहले वैरागी जीवन जीना पड़ता है। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वर्ष भर समर्पण और भक्ति की परीक्षा देनी पड़ती है। फिर गुरु मुहूर्त निकलवाते हैं और शिष्या बनाते हैं, लेकिन संन्यास संस्कार होता है गंगा के तट पर कुंभ में।

जूना अखाड़ा महंत मीरा पुरी ने कहा कि पहले अखाड़ों में नागा बनने और संन्यास लेने में पुरुषों का ही एकाधिकार और वर्चस्व था, लेकिन अब यह टूट रहा है। अखाड़ों में महिलाओं के लिए भी संन्यास के द्वार खुल गए हैं। महिलाएं घरेलू हिंसा, तिरस्कार, अपमानजनक बातों और उत्पीडऩ, दबाव से ऊब कर ईश्वर की शरण में भजन के साथ सद्गति के लिए आ रही हैं। इस कुंभ में महिलाओं के संन्यास लेने की परंपरा मजबूत हुई है।

news source - amar ujala

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